सालो पहले मैं सपरिवार दिल्ली गयी थी वहां लाल किला में घूमने के क्रम में गाइड ने मीना बाज़ार नामक जगह का परिचय देते हुए कहा कि इस जगह पर मुग़ल बेगमें खरीदारी किया करती थी और वहां पुरुषों का प्रवेश निषेध था। पता नहीं इस बात में कितनी सच्चाई है लेकिन जब मैं मन में अपने गाँव की टुकली वाली के बारे में सोचती हूँ तो मेरे दिमाग में ये बात आती है कि बाज़ार की दूरी और पर्दा प्रथा के कारण ही इनका प्रादुर्भाव हुआ होगा। आज से चालीस पचास साल पहले हमारे गाँव में औरतो की सीमा रसोई और आँगन तक ही सीमित थी। प्राय सभी गांवों में सभी घरों के पिछवारे से एक रास्ता औरतो के आवागमन के लिए होता था. मुझे उस समय पैदल के रास्तो में माँ चाची लोगो का पर्दा (जिसे हमारे यहाँ ओहार कहते थे )लगा कर टायरगाड़ी या रिक्शा पर जाना बड़ा मज़ेदार लगता था, हम बच्चे कभी ओहार में छिप जाते और अगले ही पल सर बाहर कर लेते। आज तक मैंने जो भी बाते साझा की वो मात्र मेरे दिमाग की कोरी उपज थी। लेकिन श्री गिरिंद्रजी के सुझाव पर मैंने टुकली वाली (मनिहारिन) के विषय में और ज्यादा जानकारी पाने की कोशिश की। इस बारे में मैंने जिससे पूछा एक पल के लिए वो अपने बीते दिनों की याद में खो गया । उनकी की टोकरी में क्या होता था उसके जवाब में लगभग सभी का एक ही जवाब था क्या नहीं होता था ?क्रीम, पाउडर, कंघी, रंगीन फीते , सिन्दूर आलता से लेकर साबुन तेल और न जाने क्या क्या। हिमालय और अफगान स्नो की ब्रांडिंग जबरदस्त थी। चूड़ी के बारे में कई विविधतायें थी जैसे उपनयन की लहठी, शादी की लहठी, दुरागमन की लहठी इत्यादि इन चीज़ो में उनका एकाधिकार था मतलब ये चीज़े आपको मात्र उन्ही के पास मिलती थी। प्लास्टिक की लाल हरी चूड़ियों का लोभ आज भी मुझे उल्लासित कर देता है। बाद के में उनके टोकरी में कई और सामान जुड़ गए।जैसे सेफ्टीपिन, प्लास्टिक के डिब्बे ,महिलाओ के अन्तर्वस्त्र आदि . एक बात गौर करने की थी इनका इलाका अर्थात इनके गाँव आपस में बांटे होते थे और इनका ये खानदानी पेशा हुआ करता था। अपने प्रतियोगी के प्रति कभी भी ये गद्दारी नहीं करती अर्थात किसी के क्षेत्र में कोई दूसरी नहीं बेचने नहीं आती थी फिर चाहे लोगो को उनके लिए कितना भी इंतज़ार करना पड़े . अपनी दादी को मैंने उन्हें बार बार बुलावा भेजते हुए देखा है। यादाश्त इतनी तेज की किसकी बेटी का क्या नाम है कौन सी बहु कब आएगी और अगले लगन में किसकी शादी है ये तो उगली पर गिनती करने वाली बात है। मार्केटिंग इतनी अच्छी की हम शहर के लोग शहर के दुकानों को भूल जाए। बाद में चाहे उनके नकली पायल को उतार फेंके लेकिन उस वक़्त तो वो सोने से भी बेशकीमती लगता था। किसी भी शुभ कार्य में उनकी बुलाहट होती और मात्र एक आध घंटे में पूरी घर की औरतो और बच्चियों का हाथ लाल गुलाबी चूड़ियों से भर जाता। किस बहु को केवल लाल ही चूड़ियों की चाहत है कौन सी बहु बिना सुनहली चूड़ियों की मजबूत किलाबंदी के बिना चूड़ियों को नहीं पहनती , ये तो उनके लिए बाएं हाथ का खेल था। इन के साथ एक काम में ये बड़ी दक्ष्य होती थी वो थी शादी विवाह के बारे में इनकी रिपोर्टिंग और लोगो का इनके प्रति विश्वास । चूँकि हमारे यहाँ की शादियों का दायरा सीमित था और इनका प्रवेश घर के अंदर तक था तो ये किसी भी लडके लडकियाँ और गृह विशेष से पूर्ण परिचित होती थी। कभी बैठ कर सोचती हूँ तो एक पूरे बांह और पेट तक ढकी कुरता नुमा ब्लाउज पहने नीचे घाघरा और एक मैले सूती कपड़े से सर ढके एक औरत गले में चांदी की हसली पहने पान खा कर सर पर एक टोकरी लेकर आँगन में घुस रही है ,उसके पीछे अपने खेल को आधा छोड़ कर दौडते बच्चों में अपने आप को भी देखती हूँ जो अपनी पूरी ताकत से माँ को आवाज़ दे रही है "माँ टुकली वाली एलौ "
Thursday, 7 July 2016
Sunday, 3 July 2016
पटना तो पटना है इसका जवाब नहीं
जिस दिन मैंने मुंबई के बारे में कुछ लिखा बस उसी दिन से मैं दो शहरों के बारे में सोच के अपराधबोध से भर उठती हूँ। पहली रांची ,जो कि मेरी जन्मस्थली है और दूसरी पटना जो की मेरी कर्मभूमि है। बच्चे को अपनी माँ को हर हाल में ही पसंद होती है इसलिए रांची तो मुझे हर हाल में अच्छी ही लगती है तो अब पटना की बारी आती है। बचपन में मैंने मुंबई के बारे में दो बाते सुनी थी। पहली की वहां बेहद भीड़ होती है और दूसरी वहां कभी रात नहीं होती। जब मैं माँ पापा के साथ छुटपन में पटना आती तो पटना में इन दोनों ही चीज़ो को पाती तो दिनों तक मन में ये सोचती कि मुंबई भी कुछ ऐसा ही होगा।
पटना के बारे में जब मैं पढ़ रही थी तो मुझे एक बात पता चली कि लंदन के पास एक पटना गाँव है जो हमारे पटना से बहुत छोटा है। हमारा पटना जो कभी अजीमाबाद ,कभी कुसुमपुर और पाटलिपुत्र होते हुए पटना पर आ कर ठहरा वो सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से बेहद समृद्ध है। चूंकि हमारे बहुत से रिश्तेदार यहाँ बहुत ही पहले से रहते थे तो यहाँ की काफी बाते मुझे ज्ञात है।वो सत्तर का दशक था जब दशहरे और दिवाली के बीच शायद ही कोई ऐसा क्लासिकल और फिल्मी गायक होगा जिसने अपनी एक शाम पटनावासिओ के नाम न की हो। बात अगर कॉलेज की हो पटना कॉलेज, पटना साइंस कॉलेज, पटना विमेंस कॉलेज का शायद ऐसा असर था कि लोग इस जगह की तुलना कभी ऑक्सफ़ोर्ड से करते थे। एक बात यहाँ की ख़ास है कि कृषिप्रधान क्षेत्र होने के कारण यहाँ के गाँव काफी समृद्ध थे। यहाँ के वो ढिबरी वाले रिक्शे मुझे बचपन में बड़े आकर्षित करते थे।
आज का पटना कई तरह से बदल चूका है। बदलाव तो प्रकृति का नियम है इसलिए बदलना तो निश्चित है और हमें हर हाल में इससे स्वीकारना ही होगा, कभी मैं यहाँ रात के दो तीन बजे भी ट्रेन से उतर कर बिना किसी भय के घर आ चुकी हूँ अब यहाँ की रोड निरापद नहीं हैं इसलिए रात के नौ बजे ही सशंकित हो उठती हूँ। राजनीति यहाँ की आबोहवा में इतनी पैठ बना चुकी है कि हर चौक चौराहे पर हरेक शख्स इतने विश्वास के साथ बाते करता है कि कोई बाहरी शायद यह सोच सकता है कि इसकी मुख्यमंत्री के साथ रोज़ की मुलाकात है। शायद इसका कारण यहाँ का लम्बा राजनैतिक इतिहास रहा हो।दूसरी बात जो मुझे सबसे अधिक चोटिल करती है वो यहाँ की जातिगत भावना। बचपन से जिस दिन तक मैंने रांची में पढ़ाई की मैंने कभी इस बात को ध्यान भी नहीं दिया कि मेरी कौन सी सहपाठी किस उपजाति से है /इस नाम पर हमें मात्र इतना मालूम था कि भारत में चार धर्म के लोग हैं। लेकिन यहाँ नेताओं के स्वार्थ पूर्ण नीति के कारण एक हिन्दूजाति ही कितनी उपजाति में बंटा है वो बेहिसाब है।
मेरे ससुराल का परिवार काफी बड़ा है.पहले तो प्राय सभी पटना ही रहते थे। अब नौकरी पढाई के कारण जो भी शहर से बाहर गए है छुट्टियों में कही दूसरी जगह घूमने के बजाय पटना ही आना चाहते हैं क्योंकि उनके अनुसार पटना तो पटना है फिर वजह चाहे यहाँ की छठ पूजा हो, चन्द्रकला मिठाई हो या पटनिया परवल।
Saturday, 2 July 2016
सम्बन्ध या अनुबंध
वो ३० जून की सुबह थी सामने वाले पड़ोसी से आमना सामना हुआ तो जितनी गर्मजोशी से उसने पूछा क्या हाल है ? मेरी आँखे नम हो उठी हाँ बस ठीक ही है। मेरे एक मामा नहीं रहे। अरे,अरे कैसे मामा थे ? मैंने कहा बस बहुत ही नज़दीकी। मतलब कैसी रिश्तेदारी थी? मन रो उठा क्या खून का रिश्ता ही हमारे लिए सब कुछ है? कितने ही ऐसे रक्त संबधी जिन्हे हमने कभी देखा भी नहीं है और हम पहचानते भी नहीं. क्यों ऐसा होता है कि हम अपने मन की वेदना किसी भी ख़ास रिश्तेदार के पास खोल नहीं पाते और उस दोस्त को अपना हर दुःख कह देते है जो कभी कभी हमारी बिरादरी का भी नहीं होता. स्वर्गीय धीरेंद्रनाथ झा हमारे अत्यन्त ही स्नेही मामा थे जिन्हे हमने हमेशा अपना मामा ही समझा। बचपन की एक तस्वीर जब मामा बंगलोर से ट्रांसफर हो कर रांची आए थे और एक शाम हमारे घर आए थे साथ में मामी और मेरे और दीदी की हमउम्र दो बेटियां...माँ के कहने पर हमने प्रणाम किया और जाकर चुपचाप बैठ गयी। हँसते हुए मामा ने पास बुलाया सुनो तुम लोगो को डोसा इडली पसंद है। हाँ बहुत, तुम्हारी मामी बनाती है। मेरी आँखे विस्मय से फैल गयी. आज से तीस पैतीस साल पहले डोसा इडली घर पर बनाना इतना आसान नहीं था। ये आज की बात नहीं है कि झट या तो मिक्सी में घोल तैयार किया और नॉन स्टिक तवा पर डोसा बना लिया। अब तो घोल भी हर तीसरे दूकान में उपलब्ध है।जहां तक मुझे याद है हमारी रिश्तेदारी उसी दिन से शुरू हो गयी। उसके बाद तो हमने कितने दशहरे के मेले को एक साथ घूमा और कितनी ही होलियाँ साथ मनाया। बीच बीच में ट्रांसफर के कारण वो बाहर भी रहे लेकिन वो सम्बन्ध की डोर बनी रही। परिस्थिति कुछ ऐसी बनी कि शादी के बाद के किसी रिश्ते में मामा मेरे ससुर के चाचा थे अर्थात मैं उनके पोते की स्त्री थी । लेकिन यहां अनुबंध ने संबंध को जीत लिया और अपने देहांत होने तक मामा,हमारे आत्मीय बने रहे।
अपने उच्च पद के बावजूद मामा के अत्यंत विनोदी और सरल स्वभाव ने उन्हें सबका प्रिय बनाया था। मेरी शादी के बाद जब भी मिलते कोई बात होती मुझे कहते कर दूं ,तुम्हारी सास से शिकायत ?
Thursday, 23 June 2016
बचपन
हमारे बचपन में रांची से गाँव तक का सफर काफी रोमांचक लगता था। स्टेट ट्रांसपोर्ट की धुँआ छोडती बसें किसी राजधानी ट्रेन से काम नहीं थी। काठ पर ठोकी रक्सीनवाली सीटों पर तीनो भाई बहन तीन तीन घाटियों वाले रास्ते को बहुत ही आनंद से बिताते थे।चूँकि रास्ता रांची से दरभंगा का होता था तो आते जाते एकाध मानसिक रोगी तो होते ही थे। उम्र काम थी इसलिए हम उनकी बेतुकी बातो से खूब मज़ा लेते थे। उस समय के बच्चों के लिए गर्मी और जाड़ों की छुट्टियों में केवल नानीघर और दादीघर जाना ही किसी शिमला ,कश्मीर और नैनीताल से काम नहीं था. गांव पहुँचने पर हम माँ की फटकार से बच जाते थे। मेरे लिए गाव का एक बड़ा आकर्षण टुकली वाली (मनिहारिन) हुआ करती थी। उसकी छोटी सी टोकरी मेरे लिए अल्लादीन के चिराग से बढ़कर था। आँगन में उसके पहुंचते ही हम सभी बच्चे उसे घेर कर खड़े हो जाते। माँ की डॉट सुनते ही पलभर को दूर होते और फिर दुबारा हाज़िर। भाइयो को डाँट मिलती कि तुम लोग क्या चूड़ी पहनोगे ?लेकिन उसके lakme की जगह lookme या pounds का पाउडर हमें किसी भी शहर की नामी दूकान से ज्यादा प्रिय महसूस होता। क्या नहीं होता था उसकी टोकरी में ? एक दूसरा आकर्षण हमारे लिए गर्मी के मौसम में जोरदार हवा का चलना था।हवा चली नहीं कि लालपीसिया (बुआ ) के नेतृत्व में सभी दौड़े आम चुनने को। माँ या चाची तो बाहर आ नहीं सकती थी उनकी दुनिया बस आँगन तक ही थी। किसी को एक, किसी को दो ,कोई बस दौड़ ही लगाता रहता। कैसी दुनिया थी, कैसे हम सब थे. वो गाँव की बातें वो हमारे गांव का झरिया दुकान जो बचपन से बड़े होने तक वैसा ही रहा वो आटो वाली नागफ़नी बिस्कुट ..................
Friday, 10 June 2016
EMI
The Never Never Nest यही नाम था उस कहानी का जो मैंने अपने इंटरमीडिएट में पढ़ा था। ये कहानी थी एक ऐसे नवविवाहित जोड़े के बारे में जो अपनी हर सामान को क़िस्त पर खरीदता है यहाँ तक की बच्चे की डिलीवरी की फीस भी। ऐसे में डॉक्टर उनके बच्चे को तब तक के लिए रख लेती है जब तक फीस कीआखिरी क़िस्त चूक न जाए। हर बात में विदेशी समाज हमसे आगे है फिर चाहे वो अच्छी बात हो या बुरी। जिस EMI ने बहुत तेजी से हमारे यहाँ प्रवेश पाया हैवहां वो आज से पच्चीस तीस साल पहले हीअपनी जयह बना ली थी। मैं इस EMI को गलत या सही साबित करने की योगयता तो नहीं रखती लेकिन इतना जरूर कह सकती हूँ कि जिस उधार को हमारे बुजुर्गो ने जानलेवा बताया था वही आज के EMI नाम से आसानी से हमारे यहाँ अपनी जगह बना ली है। हमारे बुजुर्ग ये कहते थे की पाँव उतनी ही फैलाए जितनी चादर हो लेकिन अब ये सोचना है की पाँव को फैलाते जाओ चादर खुदही वहां तक आ जाएगी। आज की पीढ़ी गाड़ी मकान जैसी चीज़ो के लिए लम्बा इंतज़ार नहीं कर सकती और करे भी क्यों जब एक से एक लुभावने प्रस्ताव बैंक के साथ कई कंपनियों के मद्धम से उनके दरवाज़े पैर मात्र एक हाँ के इंतज़ार में खड़े है।
महाभारत के एक सर्ग में जब यक्ष युधिष्ठिर से पूछता है की कौन सा मनुष्य सुखी है तो युधिष्ठिर कहते जो मनुष्य उधार से मुक्त है वही असली सुखी है। आज के दौर में शायद वो दोनों ही असमंजस में पड़ जाते कि किसे सुखी माना जाए। मेरे स्वर्गीय दादाजी जिनके देहांत को करीब एकतालीस साल हो गए उनकी मृत्यु अचानक अपनी नौकरी के लिए जाते हुए ट्रेन में हो गयी थी, अत्यन्त अल्पायु में हुए मौत के बावजूद न उनका कोई उधार बाकी था और न किसी तरह की देनदारी। उलटे कुछ लोग उनसे लिए एडवांस लिए पैसे वापस करने को ही आ गए। नहीं जानती कि मैं ही पीछे हूँ या हमारी पीढ़ी या हमारी ही बहुत आगे निकल गयी है।
महाभारत के एक सर्ग में जब यक्ष युधिष्ठिर से पूछता है की कौन सा मनुष्य सुखी है तो युधिष्ठिर कहते जो मनुष्य उधार से मुक्त है वही असली सुखी है। आज के दौर में शायद वो दोनों ही असमंजस में पड़ जाते कि किसे सुखी माना जाए। मेरे स्वर्गीय दादाजी जिनके देहांत को करीब एकतालीस साल हो गए उनकी मृत्यु अचानक अपनी नौकरी के लिए जाते हुए ट्रेन में हो गयी थी, अत्यन्त अल्पायु में हुए मौत के बावजूद न उनका कोई उधार बाकी था और न किसी तरह की देनदारी। उलटे कुछ लोग उनसे लिए एडवांस लिए पैसे वापस करने को ही आ गए। नहीं जानती कि मैं ही पीछे हूँ या हमारी पीढ़ी या हमारी ही बहुत आगे निकल गयी है।
Monday, 6 June 2016
नौकरी
प्राचीन काल में हमारा समाज चार श्रेणियों में था। ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र।और जैसा की सर्वविदित है उनके कार्य भी बांटे हुए थे। समय बदला सभी, सभी कामों को करने लगे। फलस्वरूप पढ़ाई न किसी की बपौत्ती रहीऔर न ऐसा कि मात्र क्षत्रिय ही सेना में जाएंगे। लेकिन इन चीज़ो के साथ एक जबरदस्त भावना ने समाज में जन्म ले लिया कि सभी लोग नौकरी को ही प्राथमिकता देने लगे वो भी सरकारी। चूंकि मैं एक छोटे शहर में रहती हूँ तो यहाँ इस तरह की भावना और अधिक है. और तो और आप चाहे कितने भी उच्चे पद है अगर नौकरी सरकारी नहीं है, आपकी काबिलियत बेकार है। मेरा जनमानस से ये प्रश्न आखिर सरकारी नौकरी क्यों? अगर आप काबिल है तो आपके लिए ये भावना क्या मतलब रखती है? कही इसके पीछे कामचोरी की भावना तो नहीं। मेरा आशय किसी को आहत करना नहीं है। इस तरह की प्रवृति मैंने कभी एक गुजराती या मारवाड़ी समाज में नहीं देखी ये प्रवृति मात्र अपने यहाँ की ही है। एक दूसरी समस्या है कि मैं यह मानती हूँ हममेँ से कोई भी अगरअपने कार्य में योग्य है तो उसे तारीफे काबिल माने।आप सोच कर देखे कि अगर हमारे समाज में सिर्फ नौकरीपेशा ही बच जाए तो सामाजिक रूप कैसा होगा।अगर किसी की डिग्री में हमेशा नंबर एक का तगमा नहीं है और वो आगे चलकर जिस कार्य को कर रहा है उसमें योग्य है तो उससे क्या कहेंगे? हमारे यहाँ हज़ारो की संख्या में लोग बेकार है क्योंकि यहाँ सोचना यह है कि अगर मैंने इस काम किया तो लोग क्या कहेंगे। जब हमारे समाज में अंग्रेज़ो से पहले लघु और कुटीर उद्योग चलाए जाते थे तो शायद लोग काफी सुखी थे। आज अगर चोरी लूट पाट और कई सामाजिक अपराध बढ़ रहे है तो उसके ज़िम्मेदार हम खुद तो नहीं है। बस एक बार सोच कर देखें।
Wednesday, 1 June 2016
तोल मोल
घर तो थोड़ा गली कूची का हीअच्छा होता है। यही सोच कर हमने फ्लैट तो बिलकुल मेन रोड का न ले कर एक गली में लिया. लेकिन पाँव पसारती हुए शहरी आबादी ने इससे कमोबेश मुख्य सड़क का ही रूप दे दिया. रोज की दिनचर्या में अमूमन एक जैसी कबाड़ी वाले की बेसुरी आवाज़, सब्जी और फलवाले की आवाज़ से मेरे कान प्राय: अभ्यस्त हो गए है। उसके साथ एक और चीज़ को मैं सालो से देखती और सुनती आई हूँ। वो है इन कबाड़ी वाले फलवाले और इसी तरह किसी तरह जीविकोपार्जन करने वालो के साथ लोगों की तोल मोल करने की आदत।हो सकता है कि ये काम कभी मैंने भी किया हो। पता नहीं हम लोगो की ये आदत सी बन गई है कि हम मरे को ही मारते है।जिस मोची या सब्जी वाले की दिनभर की आमदनी ही १००- २०० से अधिक नहीं है उसके १० या २० से हमारा क्या बन जाएगा? आपने कभी किसी को मॉल या ब्रांडेड शो रूम में बारगेन करते देखा है। बिलकुल नहीं बल्कि कई बार हम उन दुकानों पैर २ -४ रु छोड़ कर ही निकल जाते है क्योंकि वो हमारी इज़्ज़त को नीचे दिखाने के बराबर होता है। जिस १०० रु को हम होटल में टिप्स के तौर पर दे देते है वही पैसा एक मज़दूर के पास से निकलवा कर हममें एक किला फतह करने जैसी भावना आ जाती है। मेरी समझ में ये नहीं आता है वही पैसा बारे शोरूम या रेस्तरॉ में जा कर कैसे अपने महत्व को खो देता है और फिर किसी गरीब के हाथ आते ही हमारे लिए जीवन मरण का प्रश्न बन जाता है.अपने इस तरह के बर्ताव से हम समाज में मेहनत करने वाले एक तबके को कही बुराइयों की ओर तो नहीं धकेल रहे हैं?
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