Tuesday, 2 September 2025




   पुस्तक समीक्षा # 31#
  लेखक # श्री रणविजय #
  पब्लिकेशन #हिंद युग्म #
  पृष्ठ संख्या #206#
  मूल्य         #299#

चीनी मिट्टी रणविजय जी के द्वारा लिखी एक यात्रा वृतांत है। चीन के विषय में यात्रा वृतांत काफी कम देखने में आता है शायद उसका कारण वहां की कम्युनिस्ट सरकार और सोशल मीडिया से वहां लगी रोक हो । हमारे जनसामान्य में किसी भी विदेश की  यात्रा के लिए काफी चाहत देखी जाती है  लेकिन इस विदेश में चीन की यात्रा शायद ही शामिल हो । 
इस किताब की समीक्षा लिखने में मुझे काफी दिन लग गए , जब मैंने इसे पहली बार पढ़कर लिखना शुरू किया तो मुझे ऐसा लगा कि इसमें लिखे प्राय: सभी ही  नामों को मैं भूल गई नतीजन इसके बारे में लिखने के लिए मैंने इसे दुबारा से पढ़ा।
    श्री रणविजय जी जो पेशे से  इंजीनियर हैं और रेलवे के शीर्षस्थ पद पर हैं ये उनकी पांचवी किताब है,उन्हें अक्टूबर 2019 में पांच दिन के सरकारी दौरे पर चीन के हुनान प्रांत के जुझावो शहर में भेजा गया । ये जगह कोरोना का केंद्र वुहान से थोड़ी सी दूरी पर था और इस यात्रा के कुछ ही महीनों के बाद कोरोना का तांडव शुरू हुआ था।चीन एक ऐसा रहस्यमय देश, जिसकी सटीक उपमा लेखक ने सीप में बंद एक मोती से दी है ।
   एक ऐसा देश जिसका GDP 1978 तक हमारे देश के समकक्ष था ,अब 15ट्रिलियन डॉलर के साथ दूसरे नंबर पर पहुंच गया है,एक ऐसा देश जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं होती है जहां सोशल मीडिया के नाम पर Wrechat ही है अर्थात वो पूरी दुनिया से कटा हुआ हैं जिन्होंने बायडू के नाम से अपना google बना रखा है,फिर भी ये देश विश्व की फैक्ट्री कहलाता है ।जो अपने आप में इतना दमखम रखता है कि तमाम विरोध के बावजूद अमेरिका को अपने टॉयलेट पेपर तक के लिए चीन पर ही निर्भर रहना पड़ता है। रेलवे के पूरे विश्व के बिजनेस का सत्तर प्रतिशत चीन का है ,जो काम हमारे यहां घंटों में होता है कुशलता से वो मिनटों में हो जाता है।इतनी सारी उपलब्धियों के बीच खड़ा चीन लेखक के मन में गहरी छाप छोड़ने को पर्याप्त था ।
किसी जमाने में भले ही तीर्थयात्री और मेहमान के रूप में आए फाहियन और ह्वेनसांग ने हमारे देश के इतिहास पर काफी कुछ लिखा है जो हमारे लिए बेशकीमती है । अगर वर्तमान में  राजनीतिक स्थिति के कारण भारत और चीन दुश्मन नहीं है तो दोस्त भी नहीं है लेकिन जब रणविजय जी ने इस मामले में वहां के लोगों से कुछ जानना चाहा तो इस विषय में उन्हें बिल्कुल ही तटस्थ पाया।
ये किताब जहां आपको चीन के दर्शनीय जगहों की सैर बखूबी करवाती है वहीं भोजन संबंधी कठिनाइयों को बताते हुए अच्छी जानकारी भी  देती है।  जहां इस किताब के कुछ ऐसे प्रसंग ऐसे हैं जिन्हें पढ़कर आपको वहां के भोजन के प्रति वितृष्णा हो जाएगी वहीं इस में कुछ हास्य प्रसंग भी हैं उदहारण के लिए चीनी भोजन को देखकर लेखक का यह सोचना कि किसको किस चीज के साथ मिलाकर खाया जाए ! शारीरिक बनावट के हिसाब से भी वे इतने फिट हैं कि चीनी बाप बेटे या मां बेटी में कोई भी अंतर नहीं होता है ये अंतर आप बस काफी नजदीक से ही जान सकते हैं।
 पूरी किताब में कुछ ऐसी बातें हैं जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगी कि शायद इन्हीं कारणों से चीन आज इस ऊंचाई पर  पहुंच चुका है। पूरे चीन में एक ही भाषा मंदारिन,और लिपि का प्रयोग,बड़ी आबादी के बाद भी सरकार का ऐसा नियंत्रण, एक व्यक्ति को एक ही घर रखने का सरकारी फैसला जो एक अवधि की लीज पर हो । सड़क की क्षमता के अनुसार गाड़ी की बिक्री और ध्यान देने वाली सबसे बड़ी बात कि धर्म के नाम पर कोई विवाद नहीं।
पुस्तक में वर्णित बुलेट ट्रेन की यात्रा,चीन की विशाल दीवार को देखना, टेंपल ऑफ हेवन को देखना सही मायने में बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है।
रेटिंग के अनुसार इस पुस्तक को निश्चित तौर पर दस में नौ देना कहीं से भी गलत नहीं होगा। शुरू से अंत तक ये आपको अपने सम्मोहन में बांधे रखती है। चीन से लेखक की एक स्वस्थ ईर्ष्या मसलन उनकी उन्नत तकनीक को देखकर ,हाय हुसैन ! हम क्यों न हुए ! सॉफ्टवेयर में अब भी चीन पीछे है क्योंकि उसे अंग्रेजों की अंग्रेजी जो नहीं आती , सड़कों पर चीनियों के भी  नियम उल्लंघन पर मन ही मन प्रसन्न होना !! इस प्रकार की घटनाएं और पंक्तियां पुस्तक में स्वाभाविकता बनाए रखती है।
इन सब के बावजूद इस किताब को पढ़ते हुए मैं मन ही मन कई बार सिहर उठी कि कभी अगर वहां गई तो ,दूसरे क्षण मन ने जवाब दिया कि रणविजय जी ने लिखा है कि वहां भी अच्छी और सुंदर दुनिया बसी हुई है और हमारे सोच के मुताबिक वहां के लोग न तो बर्बर है न ही हिंसक। 

Wednesday, 2 April 2025

कुछ बातें,कुछ यादें,कुछ सवाल आपके हाथों में जा रही हैं। ये किताब है मेरी उन यादों की जिसमें मैं कभी अपनी दीदी को महसूस करती हूं और कभी भइया के साथ बालपन के झगड़े को ।वे छोटी बड़ी बातें जो आज तक मैंने सुनी हैं और हैं कुछ सवाल जो निरंतर मेरे मन में आती हैं।
ये कोई गूढ़ साहित्य नहीं है और न ही कोई ऐतिहासिक तथ्यों से भरी हुई लेखनी है।कुछ यादें जैसे ननिहाल की यात्रा जो सबके बाल्यावस्था का सुनहला पन्ना होता है।वो ससुराल की बातें, त्योहारों की गहमा गहमी और भी बहुत कुछ । इस पुस्तक में मैंने अन्य पुस्तकों की तरह किसी पोस्ट में कोई शीर्षक नहीं डाला है। इसके पीछे मेरी मंशा, शीर्षक का निर्णय पाठकों के हाथों में ही  हो ।
किशोरावस्था से मां के उपन्यासों को चोरी छिपे पढ़ते हुए मैंने हुए मैंने कई लेखक लेखिकाओं को जाना । विवाहोपरांत बच्चियों को पढ़ाने के क्रम में पढ़ने पढ़ाने की आदत बनी रही और इसी में लेखन की आदत ने भी जन्म लिया जिसके लिए रफ कॉपी का काम किया fb ने ।
इस दिशा में मुझे प्रोत्साहन देने का श्रेय मेरे चाचा ( श्री नागेश चंद्र मिश्र) को जाता है।यहां मैं ईमानदारी से स्वीकार करती हूं कि अपने सभी fb पोस्ट्स के लिए मैंने उनके कमेंट्स की प्रतीक्षा आतुरता से की है।
बचपन से मेरी आदर्श रही साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजी गई मेरी बुआ सुप्रसिद्ध लेखिका श्रीमती नीरजा रेनू ।जिनके जैसा बनने की इच्छा सदैव मेरे मन में रही है।
मेरे सभी लेखों के पहले श्रोता हैं मेरे पति श्री अशोक झा, जिन्होंने मुझ नौसीखिए  को सदा झेला है ।मेरे अधकचरे लेखन की परामर्शदात्री है मेरी बड़ी बेटी वसु और छोटी मीठी ने मेरे बेतरबी से पड़े पोस्ट्स को तकनीकी रूप से संकलित किया है।
     आज अपनी पुस्तक को अपने हाथों में पाकर मैं सादर प्रणाम करती हूं सभी श्रेष्ठजनों को और सादर नमन करती हूं, दिवंगत पापा ,सासु मां और पापा जी को ।

Tuesday, 25 February 2025

 आप सभी को महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं । आज का मेरा ये पोस्ट अलग अलग तरह के दो पोस्टों पर आधारित है। 
               ये तो सर्वविदित है कि हिंदू धर्म के अनुसार सबसे सफल दाम्पत्य जोड़ी महादेव और गौरी की है।अगर थोड़ी देर के लिए तुलना की जाए तो सीता के मिथिला की बेटी और राम के मर्यादा पुरूषोतम होने के बावजूद मैथिल भी अपनी बेटियों को दामाद के रूप में राम नहीं महादेव को पाने का आशीर्वाद देते हैं । सीता और राम की जोड़ी में सदैव एक कर्तव्यबोध का अहसास होता है।लेकिन शिव और पार्वती तो किसी भी आम पति पत्नी की तरह हैं जिसमें कभी बच्चों के झगड़ों निबटाने में पार्वती को भांग पीसने में देर हो जाती है और महादेव नाराज़ हो जाते हैं तो कभी महादेव गौरी से मेले में चलने और जलेबी खाने का आग्रह करते हैं।इन सभी का जिक्र  मिथिला की नाचरी में देखने में आता है। दूसरी ओर महेश वाणी में महादेव का बखान सुनने में आता है। नचारी और महेशवाणी को अगर आप विस्तार में जानना चाहते हैं तो आप डॉ .प्रवीन झा (महेशवाणी और नचारी ) को पढ़ सकते हैं । https://praveenjha.in/maheshvani/
  दूसरी ओर शिव और पार्वती को एक आम जोड़ी मानते हुए श्री ध्रुव गुप्त जी उनके बीच होने वाले वाद विवादों की चर्चा करते हैं। आज उनके द्वारा लिखा ये मजेदार पोस्ट बरबस ही आपको हंसने पर मजबूर कर देगा । https://www.facebook.com/share/p/18LWGA6qJn/

Thursday, 9 January 2025

अगहन का महीना अमूमन सभी हिन्दू सम्प्रदायों के  शादी ब्याह से भरपूर होता है। वैसे तो शादियों में किया जाने वाले खर्च में सभी जगहों पर बेहताशा वृद्धि हुईं है लेकिन हर समाज में हर लगन में एक या दो शादियां ऐसी जरूर होती हैं जो अपने लेन देन की वजह से महीनों तक चर्चा में रहती हैं। 
     मैं मिथिला के श्रोत्रिय ब्राह्मण समुदाय से हूं। जो काफी हद तक अपने आप में सिमटा हुआ है । हर समुदाय की तरह इसमें शादी ब्याह संबंधी बहुत से नियम और कायदे हैं जो समय के साथ बदलते जा रहे हैं।
     अगर 25 से 30साल पहले हमारे यहां की शादियों की बात करें तो ये काफी परंपरागत और सादगी पूर्ण हुआ करती थी। जातिगत नियम काफी कट्टर हुआ करती थी ,शादी में पालन किए जाने वाले नियम काफी परंपरागत और खर्च के लिहाज से आम कन्या या वर के पिता के साथ समाज के लिए भी सहज हुआ करते थे । गौर करने वाली बात ये है कि परंपरा के नाम पर वधू तक का शृंगार बुजुर्ग महिलाओं के द्वारा प्राकृतिक रंगों की सहायता से किया जाता था जिसे पासाहिन कहा जाता था जो सिद्धहस्त और अनुभवी  हाथों के कारण बहुत ही खूबसूरत दिखता था। पासाहीन कई तरह के होते हैं जो किसी भी शुभ अवसर सुहागिनों के माथे पर सिंदूर, विशेष तरह की बिंदियों आदि के द्वारा की जाती है।इनकी चर्चा (पासाहिनो)  मैं अपने दूसरे पोस्ट में विस्तार से करना भी चाहूंगी क्योंकि यह एक दिलचस्प विषय है। शादी में परोसा जाने वाला भोजन शाकाहारी और बिना नमक का होता है।सभी बाराती धोती कुर्ते में रहते हैं और लड़की की मुंह दिखाई भी इतनी ही होती है कि सभी आसानी से वहन कर सकें। पहले के समय अनुसार सभी वैवाहिक कार्यक्रम परिवार और समाज के द्वारा ही  निबटाए जाते थे । चूंकि दहेज के दानव से यह सम्प्रदाय मुक्त है इसलिए लड़की को दिए गए सामानों की चर्चा तो होती थी लेकिन उतनी ही ताकि कम औकात के लोग शर्मिंदगी महसूस न करें । गौरतलब है कि दरभंगा के महाराज भी इसी समुदाय से ताल्लुक रखते थे जिनका लेन देन राजसी होता था लेकिन जन साधारण के लिए लेन देन संबंधी कोई बाध्यता नहीं थी। इसी कारणवश कई बार वैवाहिक संबंध में आर्थिक विषमता भी देखने में आती थी।सादगी और शालीनता के बावजूद विवाह आने वाले सभी मेहमानों के खाने पीने और रहने की समुचित व्यवस्था की जाती थी। प्राय घर पर बनी मिठाइयां होती थीं जो वक्त बेवक्त आने वाले मेहमानों को भी  परोसी जाती थी। शादी में आने वाले मेहमानों को आस पास के घरों में मेहमानों को ठहराया जाता था इन सभी बातों का तात्पर्य यह है कि हमारे यहां की शादियों मुख्य रूप से संस्कार प्रधान और दिखावे से परे हुआ करती थी। वर और वधु दोनों ही कम उम्र के हुआ करते थे।
     उपर्युक्त सभी बातों की चर्चा मैंने  कई बार भूतकाल में किया है इसका कारण यह है कि विगत पांच वर्षों में हमारे यहां की शादियों में काफी परिवर्तन आया है। सबसे अच्छी बात यह हुई है कि आज के समय में  प्राय वर और वधु दोनों परिपक्व हो जाते हैं और बहुधा लड़कियां भी शादी के समय आत्मनिर्भर होती हैं। आज के समय में विवाह के लिए मात्र वर की मंजूरी को ही पर्याप्त नहीं माना जाता है अब लड़कियां भी अपने विवाह के लिए  राय देती हैं। अंतर्जातीय विवाह में काफी वृद्धि हुई है और प्राय इस तरह के विवाह को परिवारिक और सामाजिक मंजूरी मिल चुकी है।
लेकिन किसी भी समाज पर समय के सकारात्मक प्रभाव के साथ साथ नकारात्मक प्रभाव पड़ना लाज़मी है। हमारे यहां के विवाह जयमाल,हल्दी या मेंहदी जैसे फंक्शन से परे होते थे जो कि अब दूसरी शादी में दिखने लगा है,शादियां भव्य और फिल्मी दुनिया से प्रभावित होने लगी हैं जो खर्च और दिखावे से ओत प्रोत से भरी हुई होती हैं। दिखावे के इस दौर में न सिर्फ वर वधु बल्कि उनके परिजनों को भी बेशकीमती उपहार दिए जा रहे हैं ।
क्या इस तरह की देनदारी पहले की शादियों में नहीं होती थी ?  जब इस बात की चर्चा मैंने अपने      
से की तो उनका सहज जवाब था बिल्कुल होती थी  क्योंकि माता पिता को सदैव ही अपने संतानों के भविष्य को हर तरह से सुखी बनाना चाहते हैं। कई बार बेटियों को विवाह के बाद आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता था ऐसे में माता पिता अनेकों प्रकार से उनकी मदद करने के आगे आते थे । उनके बच्चे अर्थात नाती नातिन का पालन पोषण ननिहाल में किया जाता था। बेटियों को समय समय पर सनेश (उपहार) भेजा जाता था ।कई बार उन्हें (बेटियों को )ससुराल में चिट्ठी पत्री के खर्च के नाम पर मासिक मदद इस तरह से की जाती थी जिससे ससुराल पक्ष की गरिमा को ठेस न पहुंचे और बेटियों को देने का उद्देश्य पूरा हो जाए और तो और बेटियों को पितृ पक्ष से जमीन दी जाती थी।
आज का दौर बदल चुका है हमारी सोच ये है कि अगर हम किसी को कुछ दे



Saturday, 26 October 2024

      यह किताब मेरी एक स्नेही सहेली को लेखक ने  उपहार स्वरूप दिया गया था जिसे उन्होंने मुझसे पढ़ने के लिए साझा किया।लेकिन कुछ निजी व्यस्तताओं के कारण मैं इसे पढ़ नहीं पा रही थी।  
      अगर ईमानदारी से कहूं तो जब इसे पढ़ने से पहले मैंने लेखक के विषय में जानने की कोशिश की तो पाया कि श्री महेश बजाज जी  रिटायर होने से पूर्व एक राष्ट्रीयकृत बैंक के उच्च पद पर  वर्षों तक आसीन रहे । ऐसा जानने के बाद मेरी इस मामले में जो धारणा बनी वो कुछ ऐसी थी कि कहां वो बैंक की शुष्क नौकरी और कहां ये साहित्य । बाद में मैंने उनके छद्म नाम "अंजुम लखनवी" जिनसे उन्होंने शायर के रूप में  काफी ख्याति पाई है और उन्हें मिले सम्मानों को भी जाना तो मेरी धारणा बिल्कुल ही बदल गई।
"परछाइयां " श्री महेश बजाज जी लघु कथाओं और निजी संस्मरणों का संग्रह है। संग्रह का पहले भाग की शुरुआत गुंटूर गूं जैसी भावना प्रधान कहानी से होती है कुल तीन कबूतरों की कहानी और प्रथम पुरुष के रूप में लिखी गई ये कहानी मर्मस्पर्शी है वैसे तो ये कहानी कबूतरों के बारे में है लेकिन ऐसा अनुभव हमारे निजी जीवन में भी कई बार होता है।
इसके बाद की कुछ कहानियां एकतरफा प्यार और विवाहोत्तर संबंधों पर लिखी गई है। 
माता पिता के प्रति संतानों की उदासीनता को प्रिंटर का रिबन, डुप्लेक्स और फातिहा में बहुत ही कम शब्दों में बहुत अच्छे से उकेरा गया है।भले ही ये विषय काफी पुराना या समाज के हर वर्ग के लिए जाना हुआ  है लेकिन यहां लेखक ने इसे इतने अनूठे तौर पर शब्दों में बांधा है कि  इन कहानियों को पढ़ते हुए कहीं कहीं आपकी आँखें भर उठेंगी। कई कहानियां मात्र एक या दो पन्नों तक ही सीमित है लेकिन ये आपके मन में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराने में सक्षम हैं। लेखक अपनी नौकरी के क्रम में अनेक स्थानों पर रहे हैं तो उन्होंने उन शहरों की इतनी अच्छी व्याख्या की है कि मेरी तरह आप भी  निश्चय ही उन शहरों के विषय में उत्सुक हो जाएंगे। मसलन भोपाल के विषय में उनका मंतव्य: खूबसूरत पार्कों और झीलों का शहर भोपाल ।इस शहर ने उर्दू की विरासत अब तक संभाली हुई हैऔर कई शायर दिए हैं। वहीं वो लखनऊ के बारे में लिखते हैं कि लखनऊ एक ऐसी जगह है,जहां के लोग चिकन का इस्तेमाल  खाने और पहनने दोनों में ही करते हैं।  उर्दू सुनना और हिन्दी के वाक्य में उर्दू भाषा के मिले हुए शब्द मुझे काफी पसंद हैं तो कुछ कहानियों में लेखक की ये शैली मुझे अच्छी लगी । उनकी कहानियों से ये ज़ाहिर होता है कि श्री बजाज उर्दू से बहुत अच्छे से वाक़िफ हैं।
किताब के दूसरे हिस्से में श्री बजाज ने अपने संस्मरण लिखे हैं जो वास्तविकता से काफी करीब हैं। खान साहब का सजीव चित्रण आपको उनके बेहद करीब ले जाती हैं।
पुणे में माधुरी से बैंक में कार्यवश मिलना और काफ़ी दिनों तक एक अच्छे दोस्त बनकर रहना निश्चय ही लेखक के लिए भविष्य में काफी सुखदायक होता अगर माधुरी की असमय मृत्यु न हुई होती जिसकी जानकारी श्री बजाज ने एक अंतराल के बाद पाई। अपने मित्रों के ऐसे विछोह से हम टूट जाते हैं जिसे श्री बजाज ने बखूबी बताया है।
इस किताब को बढ़ते हुए जब इसमें दरभंगा का जिक्र आता है तो गृहनगर होने की वजह से मेरे चेहरे पर बरबस ही मुस्कुराहट आ जाती है वैसे मैं श्री बजाज को विश्वास दिलाना चाहूंगी कि आज दरभंगा में बिजली की स्थिति में सुधार गई है और अब  लोगों को इसके लिए सफ्ताह के अंत में पटना जाने की जरूरत नहीं पड़ती है। लेकिन इस संदर्भ किए गए पटना के  शीशमहल का किस्सा मैंने भी पुराने पटनावासियों से सुना है।
 इस श्रृंखला में लिखे गए अन्य अनुभव लघु कथाओं के मुकाबले बेहतर कहे जा सकते हैं और अगर लेखक जीवन  अपने संस्मरणों को एक पुस्तक का रूप दिया जाए तो यह एक दिलचस्प किताब होगी ऐसी मेरी निजी सलाह है।

Friday, 9 August 2024

पिछले काफी दिनों से वोल्गा से गंगा को पढ़ रही हूं। अगर ईमानदारी से कहूं तो इस बीच मैंने  दूसरी दो किताबें और पढ़ डाली और अब तक पूरी नहीं पढ़ पाई,कारण है इसकी गूढ़ता और दार्शनिक भाव ।
    मानव के अस्तित्व आने से लेकर आधुनिक इतिहास तक  स्वर्गीय राहुल सांस्कृतायन की ये रचना निश्चय ही इतिहास और साहित्य के लिए अनुपम सौगात है।
नदियों के किनारे बसने वाली सभ्यता किस तरह पहले मातृसत्तात्मक रूप से शुरू हुई और धीरे धीरे स्त्रियों के पतन की ओर उन्मुख होती गई ।
   जब तक मनुष्य के मन में संग्रह करने की प्रवृति नहीं विकसित हुई थी वह लगातार भटकता रहता था।धीरे धीरे अनाज फिर तांबा, लोहा और बाद में सोना आदि को मानव आविष्कृत करता गया और लालची होता गया ।
राजा के दैवी सिद्धांत के कारण दास और दासियां जानवरों की तरह बेचे जाते थे। आज भले ही हम सनातन धर्म और हिंदू धर्म की दुहाई दे लेकिन ब्राह्मणों तक में सुरा और गोमांस खाने की परंपरा थी ।इस्लाम धर्म की उत्पति और काफी नवीन होने पर भी पूरे विश्व में सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ जबकि बौद्ध धर्म जनमानस के लिए आसान था ।हिंदू धर्म की जटिलता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि किसी भी चांडाल के लिए नगर में प्रवेश करना निषिद्ध था और अतियआवश्वक स्थिति में वे नगर में एक डंडे और एक बर्तन के साथ प्रवेश करते थे।दूर से डंडे पीटते और अपने थूक को उस बर्तन में फेंकते उनकी स्थिति कुत्ते से भी बदतर थी ।
हिंदू धर्म के कुछ अच्छे सिद्धांत भी थे , कम उम्र में होने वाली विधवाओं को एक साल से अंदर द्वि वर अर्थात देवर से ब्याह दिया जाता था । धीरे धीरे इस प्रथा का निषेध हो गया और इसके जगह सती प्रथा जैसी कुरीतियां जन्म लेने लगी ।
इसी प्रकार की रोचक बातें और ऐतिहासिक जानकारियों से संबंधित ये पुस्तक आपको तभी दिलचस्प लग सकती है जब आप इन बातों में रुचि रखते हो । हल्के फुल्के किताबों के शौकीन पाठकगण इस किताब का आनंद नहीं ले सकते हैं ये मेरी निजी सलाह है।

Thursday, 18 July 2024

     विगत कुछ दिनों से पूरा सोशल मीडिया अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट के सगाई, प्री वेडिंग और विवाह की खबरों से पटा हुआ है। विवाह का भव्य आयोजन,शामिल होने वाले बॉलीवुड सितारे और तमाम बड़ी हस्तियां लोगों को एक फैंटेसी की दुनिया में ले जाती है। 
      लेकिन इन सबके साथ साथ जितनी फोटोज या खबरें अंबानी परिवार के लोगों के कपड़ों,गहनों की बन रही है उससे कहीं अधिक मजाक अनंत अंबानी के मोटापे का बनाया जा रहा है।कोई उसे हाथी कह रहा है जबकि कोई उसे बच्चों के कार्टून सीरीज का ओस्वर्ड।तरह तरह के मीम बनाए जा रहे हैं ये सब तब किया जा रहा है जबकि पहले ही फंक्शन में अनंत अंबानी ने अपनी बीमारी और उससे होने वाली तकलीफों का खुलासा कर दिया था।
अंबानी परिवार जनमानस से ही नहीं बल्कि दर्शकों की नजर में भगवान की तरह पूजे जाने वाले नायक नायिकाओं से भी बहुत ऊपर की शख्सियत हैं उन्हें इस तरह के रिल्स या मीमस से कोई फर्क नहीं पड़ता है लेकिन इस प्रकार की हरकतें करना व्यक्ति विशेष की दूषित मानसिकता को प्रदर्शित करता है । 
किसी भी बच्चे की तकलीफ उसके माता पिता के लिए कितनी कष्टप्रद  होती है यह कहने की बात नहीं है फिर चाहे वो कितना ही दौलतमंद क्यों न हो।
   यहां बात सिर्फ अनंत अंबानी की नहीं है इस तरह से लोगों की हंसी उड़ना हमारे समाज के लिए नई बात नहीं है।
       कभी कहीं पढ़ा था कि बीमारी या मौत न दौलत देखती है न जाति, यही एक सच है जिससे ईश्वर ने इंसान को औकात दिखा दिया है वरना  अमीर कहते कि फलां गरीब था इसलिए बीमार हो गया या फलां गरीब था इसलिए मर गया 🥲🥲

Tuesday, 9 July 2024

पुस्तक समीक्षा ##16##
पुस्तक का नाम ## एक टीचर 
की डायरी 
लेखिका ##श्रीमती भावना शेखर #
पब्लिकेशन  #प्रभात पेपरबैक्स ##
नए लेखकों को पढ़ने का मेरा अब तक का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा है। मैंने अधिकांश नए लेखकों में स्थापित लेखकों के नकल करने की प्रवृति देखी है।
          इसके विपरित कल जब मैंने श्रीमती भावना शेखर जी की किताब "एक टीचर की डायरी" को पढ़ना शुरू किया तो यकीन मानिए ऐसा लगा कि मैं फिर से अपनी बेटियों के स्कूली समय में पहुंच गई हूं ।
ये एक सुखद संयोग है कि श्रीमती भावना शेखर ने राजधानी पटना के उसी नोट्रेडम स्कूल में छब्बीस सालों तक अध्यापन का कार्य किया है जिसमें मेरी दोनों बेटियां पढ़ती थी और बड़ी बेटी ने छठी और सातवीं कक्षा में उनसे शिक्षा भी पाई है। 
पुस्तक की पहले ही पन्ने पर लेखिका ने ईमानदारी से स्वीकारा है कि इस स्कूल की नौकरी उन्होंने बेटी के एडमिशन के जद्दोजहद के क्रम में शुरू किया लेकिन बाद के अध्यापन के लंबे समय में इस कार्य को इतनी शिद्दत से किया कि अपनी छात्राओं के लिए प्रेरणा स्रोत भी  बनी रही ।
इस पतली सी किताब में लिखी हुई बातें आपको आपके बच्चों के जीवन उस हिस्से में पहुंचा देंगी जिसमें न जाने वे कितने ही समस्याओं से जूझते रहते हैं। घरों में होने वाले यौन शोषण से लेकर, माता पिता के बीच होने वाले ऐसे झगड़े, जिसमें पिता का ही अन्यत्र अफेयर हो जैसी कई अन्य परेशानियां जो  किशोरवय बच्चे किसी से साझा नहीं कर पाते ऐसे समय में एक मां की तरह टीचर का होना उनके लिए वरदान के समान है ।वैसे भी अपनी बेटियों के स्कूली जीवनकाल में छात्राओं और शिक्षिकाओं के बीच की  आत्मीयता को मैंने महसूस किया है।
         पुस्तक में लिखी गई कुछ बातें यथा कभी कभी बच्चे तनाव में आकर परीक्षा में नकल करने लगते हैं उनकी इस गलती को माफ कर उन्हें मौका देना , बच्चे के आर्थिक रूप से कमजोर होने पर उनकी मदद के लिए सोचना , बुजुर्गों का भावना में बह कर बच्चियों का विचित्र नामकरण करने पर उनका  सामूहिक 
मजाक का शिकार होने से बचाना ,अभिभावकों के द्वारा किया गया दुर्व्यवहार जैसी घटनाएं आपको वास्तविकता से रूबरू कराती है।
पुस्तक के दूसरे हिस्से में लेखिका ने अपने विद्यार्थी जीवन के संस्मरण लिखे हैं जो काफी रोचक हैं।
   एक ऐसा स्कूल जहां बहुधा महानगरों और विदेशों तक से बच्चियां पिता के ट्रांसफर के बाद पढ़ने को आती हैं, जहां राजधानी के उच्च पदासीन कर्मचारियों और टॉप बिजनेस फैमिली की बेटियां पढ़ती हैं , वहां आपकी बच्चियों के गलत दिशा में बढ़ने की संभावना कई गुना बढ़ जाती हैं और फिर यह भी जरूरी नहीं कि हर बच्ची को नोट्रेडम जैसा स्कूल या  श्रीमती शेखर जैसी टीचर का संरक्षण मिल जाए ।
     कुल मिला कर मैं उन माताओं से इस पुस्तक को पढ़ने का आग्रह करती हूं जो अपने बच्चों को किसी प्रतिष्ठित स्कूल में डाल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझती हैं और कभी कभी छोटी सी गलती माता पिता की  नासमझी के कारण घातक साबित होती है।




Monday, 3 June 2024

कभी 80 के दशक में किसी प्रसिद्ध गीतकार ने एक इंटरव्यू में बताया कि हमारे कुछ सीनियर्स ने 60 से लेकर 70 तक के गीतों को हिंदी फिल्मों का स्वर्णिम युग कहा ।फिर जब हम 90 के दशक में पहुंचे तो 80 के गीतों को कर्णप्रिय और फिल्मों को बेमिसाल माना गया और फिर उस दौर के बीतने के बाद उसे अच्छा कहा गया ।ये  सिलसिला अब तक चलता जा रहा है अर्थात हम हमेशा अपने बीते हुए समय के फिल्मों और गीतों  को ही अच्छा मान रहे हैं। 
यहां बात सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं है जीवन के हर क्षेत्र में ही लोग ऐसा करते और कहते आए हैं।कहने का अर्थ  हमेशा बीते हुए दिनों को याद अफसोस करना एक आदत सी बनती जा रही है। अगर थोड़ी देर के लिए हिंदी  फिल्मों या गीतों की ही बात हो तो क्या पहले की सारी की सारी  फिल्में अच्छी थी ? क्या आज भी कई गीत कर्णप्रिय नहीं होते ! निश्चय ही उस समय भी कुछ घटिया फिल्में बना करती थी और आज भी अच्छी फिल्में आती है।
यहां अगर अपनी बात करूं तो मैं भी इस भावना से अछूती नहीं हूं जब मेरे बच्चे छोटे थे तो मैं सोचती थी कि जब ये बड़ी हो जाएंगी तो सब ठीक हो जाएगा, धीरे धीरे बेटियां पहले पढ़ाई और बाद में नौकरी के लिए कई सालों से बाहर है तो हर वक्त उनकी चिंता रहती है तो अब लगता है कि पहले ही सही था, बच्चे कम से कम पास तो थे।
अक्सर fb या सोशल मीडिया पर पहले के घरों , गांवों और पारिवारिक एकता जैसी बातों की दुहाई दी जाती हैं।पहले के मुकाबले स्कूल कॉलेजों आदि में शिक्षा के गिरते स्तर पर विवेचना की जाती है लेकिन यहां मेरा कहना है कि क्या हमने हर क्षेत्र में उन्नति नहीं किया है ! क्या दूसरे सामाजिक आडंबरों पर खर्च करने की जगह आज माता पिता अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना सही नहीं समझते !  चाहे वो लड़की क्यों न हो ! आज पहले की तुलना में औरतों की स्थिति में जो सुधार आया है कुछ साल पहले इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। कितनी ही बीमारियों पर आज  नियन्त्रण पा लिया गया है। यहां संयुक्त परिवार का टूटना समय की मांग है जिसे हम नकार नहीं सकते।  हमारी पिछली पीढ़ियों की  कई गलतियों को हम भी झेल रहे हैं ।मसलन हमारी विशाल जनसंख्या हमसे दो ऊपर  पीढ़ी की देन है ।
    तो जहां तक मैं सोचती हूं कि जो वर्तमान है वही सबसे अच्छा है ।
"हर घड़ी  बदल रही है रूप जिंदगी,
छांव है कभी ,कभी है 
धूप जिंदगी ,
हर पल यहां जी भर जियो 
जो है समां कल हो ना हो।"

Friday, 24 May 2024

कल वसु ने उपहार के तौर पर एक किताब भेजी । काफी समय  के बाद ये किताब किसी प्राइवेट कोरियर से न आकर  भारतीय डाक के speed post के जरिए मेरे पास आई थी .इस घटना ने लगभग पैंतीस चालीस साल पुरानी "हिन्द पैकेट बुक" के बेहतरीन उपन्यास और उसकी "घरेलू लाइब्रेरी योजना "की याद दिला दी।
          आज भले ही मेरी मां किताब के दो चार  पन्ने पढ़ने में ही  थक जाती है लेकिन किसी जमाने में इन्हीं किताबों और मैग्जीनस में मां की जान बसती थी।  घर में धर्मयुग , सारिका और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाएं  मासिक तौर पर ली जाती थी। साथ ही  बहुत से उपन्यास पापा अपने कॉलेज की लाइब्रेरी से मां के पढ़ने के लिए लाते थे और कई उपन्यास धारावाहिक श्रृंखला के रूप में धर्मयुग आदि में छपते थे और किस्त पूरी  होने पर सूई धागे से सिलकर किताब का रूप दिया जाता । 
 इन्हीं दिनों मां ने शायद अपने जैसी ही किसी पुस्तक प्रेमी की सलाह पर घरेलू लाइब्रेरी योजना से किताब वी पी के द्वारा मांगना शुरू किया।ये एक ऐसी मासिक योजना थी जिसके तहत चुनिंदा लेखकों की किताबें अच्छे डिस्काउंट के साथ लोगों को घर पर मुहैया कराई जाती थी।भले ही फ्लिपकार्ट या अमेजन जैसे सहायकों से किताबों का खरीदना बहुत ही आसान है लेकिन उस समय इस योजना से किताब मांगना इतना भी आसान नहीं था।पहले कंपनी के द्वारा एक पोस्टकार्ड या टिकट लगा लिफाफा दिया जाता था,साथ ही किताबों की बाकायदा लिस्ट भेजी जाती थी जिसका चयन कर किताबें खरीदने वाला  पोस्टकार्ड भेज देता  था और फिर पंद्रह बीस दिनों का लंबा  इंतजार किया जाता था । फिर पोस्टमैन किताबों की वी पी लाता जिसेआज की  C O D की तर्ज पर पैसे देकर छुड़ा लिया जाता था।  घर बंद होने की स्थिति में डाकिया मात्र कार्ड डाल कर अपनी उपस्थिति दर्ज कर जाता था । पुस्तकों को सात दिनों के अंदर निकट के पोस्ट ऑफिस में सुरक्षित रखा जाता था जिसे वहां से पैसे देकर लाया जा सकता था। किताबों के पोस्ट ऑफिस से नहीं लेने पर कंपनी को दोहरा डाक खर्च वहन करना पड़ता था जिसके बाद आपको  कंपनी के द्वारा उपालंभ से भरी चिट्ठी भेजी जाती थी और आपको इस योजना के लिए "ब्लैक लिस्टेड"कर दिया जाता था,ठीक उसी तरह अगर आप किसी नए ग्राहक को अपने द्वारा जोड़ते हैं तो आपको इनाम में अपनी पसंद की किताबें भी दी जाई जाती थी। ये सिलसिला काफी वर्षों तक चला । बाद के वर्षो में किताबों की डिलीवरी में कुछ शिकायतें आने लगी और लोगों के द्वारा चुने गए किताबों की जगह नए लेखकों की  किताबें आने लगी जो पाठकों को नागवार लगने लगी।
      यहां एक  राज़ की बात ये है इसी घरेलू लाइब्रेरी योजना के कारण घर में अच्छी किताबें आती रही और पहले चोरी छिपे और बाद में मुझे भी मां के साथ साथ उपन्यास पढ़ने की आदत लग गई जो आज मेरे अच्छे बुरे समय में मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं है।


Sunday, 3 March 2024

गत 20Feb को मशहूर रेडियो उद्घोषक अमीन सयानी जी का देहांत हो गया। संभवत उस जमाने का शायद ही कोई उनकी जादुई आवाज से अपरिचित होगा । उनके संबंध में   "The Times of India" ने बड़ी दिलचस्प बात लिखी कि भारतीय होने और अपने सगे भाई के AIR में पहले से कार्यरत होने के बाद भी इतनी जादुई और मखमली आवाज के बाद भी क्या कारण था कि उन्होंने अपना कैरियर AIR के बजाय लंका (रेडियो सिलोन) से शुरू किया तो इसका कारण यह था कि उस समय ऑल इण्डिया रेडियो की नीति थी कि इसमें मात्र परंपरागत कलाकारों और वाद्य यंत्रों को प्रमोट करने के नाम पर उन्हें ही प्रवेश दिया जाता था और तो और इस कसौटी पर हारमोनियम भी विदेशी होने के कारण खरा नहीं उतरता था तो हिंदी फिल्मी गाने तो दूर की बात थी । ऐसे में अमीन सयानीजी ने अपने कैरियर की शुरुवात रेडियो सिलोन से की जो कि हिंदी फिल्म के गानों से जुड़ा कार्यक्रम था और चंद ही वर्षों में काफी प्रसिद्ध हो गया. बाद के वर्षो में AIR ने भी अपनी नीतियों में बदलाव के साथ 1957 में विविध भारती की स्थापना हुई जिससे हिंदी फिल्मी गानों की ऑल इण्डिया रेडियो पर प्रवेश मिला । बाद में भारतीय जनता की नब्ज को पकड़ते हुए इस कार्यक्रम को फौजी भाइयों के लिए समर्पित किया गया। इन सभी बातों का सार यह है कि आम जीवन हो या टेक्नोलॉजी में परिवर्तन की गुंजाइश हमेशा ही बनी रहती है बशर्ते उसका दुरुपयोग न किया जाए। कंप्यूटर के आने से पहले एक भ्रांति यह थी इससे बेरोजगारी बढ़ जाएंगी लेकिन आज इसके बिना जिंदगी नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर मालूम होती है। विवाह हो या अंतिम संस्कार उनमें होने वाले कई रिवाज मात्र इसलिए निभाया जा रहा हैं क्योंकि ये पुरानी हैं और हमेशा से होती आई हैं। गाहे बिगाहे हम या हमसे ऊपर की आज की पीढ़ी से अपनी तुलना करते हैं लेकिन होने वाले परिवर्तन को स्वीकारना हमारे लिए कई मायनों में जरूरी है।
 अपनी पुस्तक पथ का दावा में  शरद चंद कहते हैं कि कोई भी पुरानी चीज  सिर्फ इसलिए सही नहीं हो सकती क्योंकि वो पुरानी हैं जिस तरह सत्तर साल का बूढ़ा कभी भी दस साल के बच्चे से पवित्र नहीं हो सकता है। 
तो किसी भी नई चीज या विचार को नकारने से पहले उसके गुण  दोषों पर विचार करना श्रेयस्कर है क्योंकि यूं भी पुरानी शराब अच्छी होने के बाद भी उसके बॉटल और कलेवर को नया रूप दिया जाता है।
श्री तेजकर झा द्वारा लिखित पुस्तक "Darbhanga Chronicles" पिछले कुछ दिनों से मैं पढ़ रही थी। किताबों की श्रृंखला में कुछ पुस्तकें ऐसी होती हैं जिन्हें आप अच्छी तरह से समझ ही पढ़ते हैं और इस तरह की पुस्तकें आपके लिए यादगार साबित होती हैं , श्री झा की इस किताब को मैं इसी श्रेणी में रखना चाहूंगी।
यह पुस्तक दरभंगा राज के संबंध में लिखी गई है । श्री झा ने इसे छह भागों में बांटते हुए इसके सभी पहलुओं पर फोकस किया है।
पहले भाग  इतिहास में राज दरभंगा के शासकों के उत्पति और  राज विस्तार के बारे  विस्तृत रूप से बताया गया है। खड़वा,जबलपुर और मंडला से संबंधित  इसके आदिपुरुष महामहोपाध्याय गंगाधर झा से संकर्षण ठाकुर से होते हुए महेश ठाकुर ने दरभंगी खान को परास्त कर इस राज की स्थापना हुई। जिस पर कुल अठारह राजाओं ने शासन किया ।
दूसरे भाग में गेराल्ड डेनबी जिनका नाम , मिथिलावासी डेनबी रोड के रूप में बचपन से सुनते आए हैं, के बारे में जानना काफी रोचक है ।एक ऐसा ब्रिटिश जो हमेशा के लिए अपने पूरे परिवार के साथ लंदन जाने को जहाज पर चढ़ चुका था महाराज के एक आग्रह पर लंदन यात्रा को अंतिम क्षणों में स्थागित कर दी और पूरी शिद्दत से महाराज की मित्रता और राज की ओर से मिले पद को  ईमानदारी से निभाया ।यह उसी की दूरदर्शिता का परिणाम था कि राज के हर क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति हुई ।लेकिन जब राज के खर्च को कम करने के लिए कर्मचारियों की छंटनी की बारी आई तो महाराज के विरोध के बावजूद  उसने अपने पद का त्याग किया। कम शब्दों में उसने अपनी वेदना पत्र में महाराज को लिख भेजा कि यहां के लोगों ने मेरे ब्रिटिश होने के कारण कभी मुझे वफादार नहीं माना और ब्रिटेन के लोगों ने एक देशी राजा की नौकरी के कारण मेरी इज्जत नहीं की लेकिन मैंने हमेशा ही आपसे( महाराज) से अपनी मित्रता ही निभाई।
तीसरे भाग पॉलिटिक्स में लेखक ने तत्कालीन कांग्रेस और दरभंगा राज के संबंधों के बारे में प्रकाश डाला है । इस विषय में स्वतंत्रता से पूर्व और उसके बाद की राजनीति काफी रोचक है।
गांधी जी की south Africa की यात्रा और उसके संबंध में महाराज से किया गया पत्राचार इस किताब में तारीख के साथ दर्ज किया गया है। 1934 के विनाशकारी भूकंप के बाद गांधीजी ने उस समय रामबाग के कैंप में रह रही बड़ी महारानी से सवाल किया कि वे संभवत महारानी होने के कारण आराम ही करती होगी ? महारानी ने विनम्रता से जवाब दिया कि मिथिला की स्त्रियां बचपन से ही चरखा चलाने में सिद्धहस्त होती हैं।
Democracy वाले भाग को पढ़ने से उस समय जमींदारी उन्मूलन अभियान के साथ ही उस वक्त की कई बिंदुओं पर ध्यान दिया गया है।
इस पुस्तक का अंतिम और सबसे दिलचस्प भाग है दरबार डायरी  जो कि महाराज की दो डायरियों पर आधारित है। इसमें महाराज की व्यक्तिगत बातों के साथ दिन प्रति दिन घट रही समस्याओं का बहुत ही अच्छा वर्णन है। इसे पढ़ते हुए आप किसी शीर्षस्थ व्यक्ति की तनावपूर्ण जीवन को भलीभांति अनुभव कर सकते हैं।         इस किताब को पढ़ने की सिफारिश मैं सिर्फ इसलिए नहीं करती हूं कि ये अमुक व्यक्ति या अमुक स्थान विशेष पर लिखी गई है बल्कि हमारे लिए यह एक लज्जास्पद बात है कि हम अपने ही राज्य के किसी भी राजवंश के इतिहास से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं।इसी पुस्तक के अनुसार स्वतंत्रता के समय बिहार में लगभग पचास हजार छोटी बड़ी रियासतें थी जिनमें छह प्रमुख थी लेकिन हम सभी के लिए अफसोस की बात है कि किसी भी राजवंश के बारे में सुनी सुनाई और अधकचरे ज्ञान के अलावा हम कुछ भी नहीं जानते हैं।

Saturday, 14 October 2023

 श्री तेजाकर झा द्वारा लिखित पुस्तक The Crisis of succession को पढ़ा ।आज  तक महाराजा,महारानी और साम्राज्य संबंधी बातें हमने इतिहास में ही पढ़ा है। लेकिन इस किताब के माध्यम से जाने पहचाने क्षेत्रों और उनके शासकों को  पढ़ना काफी रोचक है। जैसा कि इस किताब के नाम से ही स्पष्ट है एक भरे पूरे और प्रभुत्व संपन्न साम्राज्य में उत्तराधिकार के अंधी दौड़ में किस तरह की साजिशें रची जा सकती है और  इसका परिणाम संबंधों को किस हद तक ले जा सकता है,ये किताब इसे पेश करने में पूरी तरह सक्षम है।
 वैसे तो अपने को देवी कंकाली का सेवक मात्र मानने वाले तिरहुत /मिथिला/दरभंगा खंडावला वंशीय महाराजाओं का इस रियासत का आरंभ सन् 1573 से माना जाता है जिसे पहले मुगल बादशाह शाह आलम 2nd और बाद में बंगाल के नवाबों द्वारा घोषित किया गया। कुल अठारह राजाओं ने इस पर राज किया जिन्होंने अपनी अच्छी शिक्षा  और सुचारू रूप से चलने वाले शासन प्रबंध के द्वारा साम्राज्य की अच्छी पहचान बनाई लेकिन इस किताब में लेखक श्री झा ने महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह ,महाराज रामेश्वर सिंह और विशेष रूप से महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह जी का चरित्र चित्रण और उनकी महारानियो की जीवनी  लिखी है। साथ ही साथ  महाराजा के निकटस्थ संबंधी भी पुस्तक का  महत्वपूर्ण हिस्सा है।
 महाराज रामेश्वर सिंह जी की एक बेटी लक्ष्मी दाईजी और  दो पुत्र कामेश्वर सिंह एवम   विशेश्वर सिंह थे। लक्ष्मी दाईजी उम्र में अपने भाई कामेश्वर सिंह से पांच वर्ष बड़ी थी। भाइयों से बड़ी होने के कारण वो स्वभाव से ही काफी दबंग थी ।अपने गुणों और बड़े भाई होने के कारण कामेश्वर सिंह जी दरभंगा के महाराज बने और कालांतर में विशेश्वर सिंह को राजाबहादुर की उपाधि के साथ राजनगर सौंपा गया। 
 तत्कालीन समय के अनुरूप  सोलह वर्षीय कामेश्वर सिंह जी का ब्याह नौ वर्ष की कुलीन परिवार की छोटी सी कन्या से हुआ जो विवाह के बाद राजलक्ष्मी कहलाई ।राजलक्ष्मी बचपन से ही काफी धार्मिक प्रवृति और स्वभाव से सरल थी । शायद उनकी इसी  प्रवृति के कारण उनकी सास ,ननद और यहां तक की उनके मायके से साथ आई नौकरानी तक उनपर हावी रही जो महाराज से उनके अलगाव का कारण बनी । यहां महाराज और महारानी के बीच दूरी बढ़ाने का काम संभवत उत्तराधिकार से सबंधित एक सोची समझी रणनीति थी जिसके अनुसार महाराज के अपनी संतान नहीं होने की स्थिति में में यह अधिकार संभवत लक्ष्मी दाईजी के पुत्र कन्हैयाजी को मिलता ।लक्ष्मी दाईजी,उनकी मां और उनके पति ने अपने बेटे को इस गद्दी का अघोषित वारिस मान लिया था।
महाराज कामेश्वर सिंह और महारानी राजलक्ष्मी जी के वैमनस्य के कारण महाराज ने दूसरा विवाह किया जो विवाह के बाद कामेश्वरी प्रिया कहलाई । शिक्षित,संस्कारी और बुद्धिमती रानी अपने पहले ही  प्रसव के दौरान लक्ष्मी दाईजी की षडयंत्र का शिकार बन कर मृत्यु को प्राप्त हुई और  जिसका आरोप  बड़ी महारानी पर आया जिसके कारण क्रोधित होकर महाराज ने जिंदगी भर उनका मुंह न देखने की शपथ खा ली । इस बीच राजाबहादुर को तीन पुत्र हुए और महाराज ने उनके बड़े बेटे जीवेश्वर सिंह को बाकायदा उतराधिकारी बनाने के बारे में सोचना शुरू किया ।लेकिन  राजमाता ने महाराज को तीसरे विवाह के लिए विवश किया ।तीसरी रानी एक बड़े पंडित परिवार से आई और कामसुंदरी कहलाई । लेकिन वो भी महाराज को वारिस नहीं दे पाई। जीवेश्वर सिंह को हर तरह से एक शासक बनाने की कोशिश की गई लेकिन अंतत वो कई बुरी आदतों का शिकार होने की वजह से इससे वंचित रह गए ।उत्तराधिकार की लड़ाई अब संपत्ति की लड़ाई में बदल गई और पारिवारिक षड्यत्रो और साजिशों से तंग आकर महाराज ने लंदन में बसने का इरादा किया लेकिन उससे पहले ही संदेहास्पद मृत्यु को प्राप्त हुए ।
  दरभंगा राज, एक ऐसा राज्य जो इस क्षेत्र में अपने समय का सबसे विशाल और समृद्ध राज था । जिसकी सांस्कृतिक विरासत और प्रसिद्धि पूरे देश में दूर दूर तक फैली हुई थी। हर लिहाज से एक ऐसी  आदर्श रियासत , जो अपने आखिरी शासक की संदेहास्पद मृत्यु के मात्र 60 साल के भीतर ही क्यों छिन्न भिन्न हो गई !
इस तरह बातें संभवत किसी भी रियासत के लिए साधारण हो ।लेकिन यह किताब मात्र सुनी सुनाई बातों पर न होकर  महाराज ,महारानियो और कुमार जीवेश्वर सिंह जी के डायरियों पर आधारित है।इसके साथ साथ राज में कार्यरत कर्मचारियों के रिपोर्ट भी इसके साथ संलग्न है।
एक ऐसा राजवंश जिसके शासकों ने रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए क्षेत्र में कई उद्योगों और मिल्स की स्थापना करवाई । शिक्षा और आधुनिकीकरण को बढ़ावा देने वाले ये शासक  अपने भाई भतीजे के साथ महारानियो की शिक्षा के लिए काफी प्रयासरत थे लेकिन उस समय की परंपरागत सोच और रूढ़िवादिता उन्हें पीछे धकेलने के लिए पर्याप्त थी । नारी अशिक्षा ,बाल और बेमेल विवाह के कारण अधिकांश राजाओं के दांपत्य जीवन में सामंजस्य  का अभाव रहता था जिसके कारण विवाहोत्तर संबंध और व्यभिचार आम बाते थी । 
अगर अधिक विस्तार में इस पुस्तक की बातों को लिखा जाए तो शायद ये चर्चा काफी लंबी हो जाएगी और  नए पाठकों के लिए जिज्ञासा खत्म  हो जाएगी । महाराज की मृत्यु के बाद की स्थिति का वर्णन भी किताब में बखूबी किया गया है।लेखक श्री झा का  महारानी कामसुंदरी के नजदीकी रिश्तेदार रहते हुए भी सभी महारानियो के प्रति तटस्थता का भाव रखना उनकी लेखनी की गहराई का परिचय देता है।
इस रियासत के संबंध में गालिब का  ये शेर कहना वाजिब है
हमें तो अपनों ने लूटा , गैरों में कहां दम था।
अपनी कश्ती वहां डूबी जहां पानी कम था ।।

Thursday, 21 September 2023

पिछले दो हफ्तों से श्री विकास कुमार झा द्वारा लिखित पुस्तक "राजा मोमो और पीली बुलबुल "को पढ़ने में लगी हुई थी।देश के सबसे छोटे राज्य गोवा के विषय में इसे एक उत्कृष्ट पुस्तक के रूप में जाना जा सकता है। बचपन से लेकर इस किताब को पढ़ने तक गोवा के विषय में मेरी धारणा कुछ अलग किस्म की थी ।ज्यादातर लोग इसे नशाखोरी और हिप्पियों के अड्डे के रूप में ही जानते हैं लेकिन जब हम गोवा को किसी गोअन की दृष्टि से देखते हैं तो उसके एक अलग रूप से परिचित होते हैं।
    "मारियो मिरांडा "  गोवा के लौटोलिम गांव में रहते थे वो Times of India prakashn से बतौर कार्टूनिस्ट जुड़े हुए थे ।अपने बेटे के मनिपाल ले जाने के क्रम में लेखक का गोवा जाना हुआ और गोवा में वो  विश्व प्रसिद्ध  कार्टूनिस्ट मारिया मिरांडा के आवास पर जाकर मिले । हालंकि मिरांडा उन दिनों अपने दो दोस्तों के गुजर जाने से काफी दुखी थे लेकिन फिर भी उन्होंने श्री झा को अपना समय दिया।जब श्री मिरांडा ने जाना कि श्री झा ने कई उपन्यास लिखे हैं तो उन्होंने उनसे गोवा के विषय में लिखने को कहा उनका कहना था कि हर लिहाज से खुशगवार गोवा आज एक अलग तरह की समस्या से जूझ रहा है और वो है मोटापा । इस मोटापा के कारण उनका जीना मुश्किल है क्योंकि वे अपने दैनिक काम करने से भी लाचार हैं। महिलाओं में ये बीमारी अधिक देखी जा रही हैं लेकिन पुरुष और बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं। गौर करने वाली बात ये है कि श्री झा के मिलने के कुछ दिनों के बाद ही श्री मिरांडा का निधन हो गया।इस दौरान श्री झा का अनेकों बार गोवा जाना हुआ और श्री मिरांडा से किया गया वायदा उन्हें बार बार याद आता रहा।इसी दौरान उनकी मुलाकात एक बेकरी चलाने वाली मां बेटी से हुई । दोनों ही अत्याधिक मोटापे से ग्रस्त थी लेकिन मां कई सालों से 24घंटे  बिस्तर पर ही रहने को लाचार थी ।श्री झा को श्री मिरांडा से किया गया वायदा याद आ गया और उन्होंने उनसे उनपर लिखने की अनुमति मांगी।कुछ झिझक के बाद उन्होंने नाम बदलने की शर्त पर इसकी अनुमति मांगी। 
सैंड्रा और उनकी मम्मी मिनि पर आधारित कहानी काफी रोचक है ।इस क्रम में आप कई बार उनके दर्द से भावुक हो जाते हैं। घटनाक्रम कुछ ऐसी होती हैं कि घर के ठीक बगल में "सैंड्रा फिटनेस सेंटर" के नाम से एक जिम खुल जाता है। पूर्वाग्रह से ग्रसित सैंड्रा इसे अपना मजाक बनाना समझती है जबकि यथार्थ कुछ और ही होता है। गोवा में चार दिनों तक चलने वाला कार्निवाल फेस्टिवल में किंग मोमो जो सैंड्रा का बचपन का साथी है वो उसे एक मनचाहा प्रिंस के पाने की दुआ देता है लेकिन अपने उम्र के चालीसवे साल में पहुंची अविवाहित सैंड्रा जिंदगी के प्रति  बिल्कुल हताश है लेकिन किंग मोमो की दुआ के अनुसार उसकी बुआ के द्वारा भेजा गया एक मेहमान विटामियो उसके सपनों का राजकुमार होता है जो उसकी जिंदगी की हर परेशानी का समाधान करता है ।
इस कहानी के साथ साथ चेरिल ,नेहरू पिमेटा , विश्वसुंदरी रीता फारिया और कई और किरदारों की कहानी से भी आप रूबरू होते है। लेखक श्री झा गोवा के साथ साथ पुर्तगाल के इतिहास के अच्छे जानकार हैं ये  बात इस किताब को पढ़कर आप अच्छी तरह से समझ सकते हैं। जनसाधारण गोवा के क्रिसमस और नए साल के जश्न को ही जानता है लेकिन इसे पढ़ने के बाद ही आप गोवा के ऐसे वसंत ऋतु से वाकिफ होते हैं जिसमें कार्निवाल फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है जिसमें किंग मोमो के रूप में एक प्रतिनिधि का चुनाव किया जाता है जिसे देखने के लिए पूरी दुनिया के लोग आते हैं।छोटी सी पीली बुलबुल गोवा की राजकीय पक्षी है। विगत दो हफ्तों से मैं इस किताब को पढ़ते हुए वहां की सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्र को जानते हुए गोवा के काफी करीब पहुंच गई । पुर्तगालियों ने मिट्टी और नदी के भविष्य को सोच कर ब्राजील की तरह गोवा में भी काजू की खेती शुरू करवाई वे जानना  भी काफी दिलचस्प है।काजू ,बादाम और धान के फसलों से भरपूर गोवा मेहनती किसानों से भी भरा हुआ है जो कई गांवो में हिंदु बहुसंख्यक के रुप में हैं ।जब आप इस तरह की किताब को पढ़ते हैं तो इसे एक झटके में किसी सामान्य उपन्यास की तरह नहीं पढ़ सकते हैं बल्कि इसे कोर्स की किताब की तरह समझकर पढ़ना श्रेयस्कर होता है। 
 

Tuesday, 15 August 2023

आज सुबह की सैर से लौटते हुए एक घर को टूटते हुए देखा। कई महीनों से ये घर खाली पड़ा था सुनने में आया था कि ये घर अपार्टमेंट के लिए किसी बिल्डर को दे दिया गया है।इस घर में एक प्रोफेसर साहब रहा करते थे और उनकी वाइफ बच्चों की ट्यूशन लिया करती थी संयोगवश दोनों बेटियों के पढ़ाई के सिलसिले में मैं अक्सर उनसे मिलती रहती थी तो हमारा संबंध काफी घरेलू बन गया था। सच कहूं तो एक बार में अच्छा नहीं लगा देख कर ,किसी भी घर से बहुत सी यादें जुड़ी होती है न जाने कितनी बार टीचर्स डे के मौके पर इस घर के छोटे से बरामदे ने स्टेज की भूमिका निभाई थी और इसी घर में न जाने कितनी ही बार मैडम से मैंने किशोरवय बच्चों की पढ़ाई के साथ साथ  कई अन्य मसलों पर सलाह भी ली, ये तो  एक निजी मकान है वैसे बुरा तो उस वक्त भी लगा था जब मैंने R block के सरकारी घर को तोड़ कर नई इमारतें बनते हुए देखा ।पापाजी (ससुर ) सरकारी नौकरी में थे और उन्हें R block का बड़े से कंपाउंड वाला सरकारी क्वार्टर मिला था उसी घर से परिवार की कई शादियां हुई मेरी  दोनों बेटियों  का बचपन भी  उसी घर में गुजरा । उसी तरह प्रोफेसर साहब काफी दिनों से वहां रहते थे तो जाहिर सी बात है कि बेटे और बेटी की शादी भी उन्होंने उसी घर से किया था ।समय बीतता गया उनके दोनों बच्चे अपनी अपनी जिंदगी में सेट हो गए ।बाद के वर्षों में जब भी मेरी बेटियां आती लगभग तब ही उनके साथ मैं भी उस परिवार से मिल पाती और कई बार मैडम को बढ़ती उम्र और घरेलू परिचायको की अनियमितता के कारण घर की साफ सफाई और रख रखाव के लिए परेशान देखती ।
   वहीं रांची में मेरे  पापा के जाने के बाद मां का  घरेलू सहायिकाओ के सहारे रहने के कारण हम तीनों भाई बहनों का रांची जाने का क्रम बढ़ गया है और वहां की हर यात्रा में कॉलोनी का हर तीसरा मकान तोड़ कर नया बनता दिखाई देता है। धीरे धीरे वहां की कॉलोनी के अमूमन सभी के बच्चे नौकरी और शादी  के सिलसिले में बाहर निकल गए हैंऔर बूढ़े माता पिता जो अपने पुराने लेकिन शौक से बनवाए मकान में रहते हैं ।यह स्थिति कमोवेश प्राय हर जगह पर देखी जा सकती है । इस मामले में जिनकी दूसरी पीढ़ी संयोगवश माता पिता के साथ में रहती है उनके साथ इस तरह की समस्या नहीं आती ।  
अब अगर इसी विषय को बेटे बेटियों की ओर से सोचा जाए तो उनके लिए ये समस्या काफी बड़ी है क्योंकि विवाह , परिवार और नौकरी  के कारण उन्हें माता पिता को छोड़ कर  दूर जाना ही पड़ता है और धीरे धीरे उनकी व्यस्तता बढ़ती जाती है नतीजन वो छोटी बड़ी बातों के लिए आ नहीं पाते है ,वहीं मकान को भी पुराने होने के बाद बार बार मरम्मत की ज़रूरत होती है ।इसके साथ ही कोई भी बड़ा घर बाद के वर्षों में बुजुर्गो के लिए रख रखाव के साथ साथ सुरक्षा के लिहाज से भी परेशानी का कारण बन जाता है। ऐसे में हाल के वर्षो में अपार्टमेंट बनाने वाले बिल्डरों के द्वारा लोगों के सामने एक अच्छा  विकल्प रखा गया है भले ही कुछ लोगों को खुले और बड़े से घर में रहने के बाद फ्लैट में रहना पसंद नहीं आता है लेकिन जहां तक मैं सोचती हू व्यवहारिक दृष्टिकोण से इस मसले पर सोचा जा सकता है। जहां अपार्टमेंट्स आपको आपकी जरूरत के हिसाब से कई सुविधाएं देता है  वहीं सुरक्षा के लिहाज से भी विचारणीय है। 
तो बदली हुई परिस्थितियों के साथ बदलना कई बार अच्छा फैसला होता है वैसे भी हमारे मिथिला में कहावत है "नब घर उठे पुरान घर खसे" ।
 
   

Monday, 15 May 2023

कल का दिन माताओं के नाम था । मां तो मां होती है फिर चाहे वो इंसान के रूप में हो या संसार के किसी भी प्राणी के रूप में।
पिछले कुछ दिनों से मेरी बड़ी बेटी जो बैंगलोर में नौकरी के सिलसिले में पिछले डेढ़ सालों से रह रही है बेहद खुश और व्यस्त रहती थी ।वैसे आज कल के बच्चे अपने काम में इतने तल्लीन रहते हैं कि उन्हें  मशीनी जिंदगी जीने की आदत हो जाती है। खैर,बेटी की खुशी का राज यह था कि उसके फ्लैट के बालकनी के हैंगिंग  इनडोर प्लांट में दो  बुलबुलों ने घोंसला बनाना शुरू किया था।धीरे धीरे जैसे जैसे उन पखेरुओ का गृह निर्माण का काम आगे बढ़ता गया  बेटी के साथ साथ हमारी उत्सुकता बढ़ती गई । सफ्ताहांत में दिन में कई कई बार हम वीडियो कॉल के जरिए पहले घोंसले और बाद में उन दो अंडो को देखते। स्कूली कक्षा में पढ़ी कहानी "रक्षा में हत्या" के कारण मैंउसे यथासंभव घोंसले से दूर रहने की सलाह देती । धीरे धीरे उसका घर नन्हें खेचरों की चहचहाहट से भर गया।उसकी दिनचर्या में उनकी उपस्थिति अनिवार्य हो गई और कभी नजदीक जाने पर उनकी छोटी सी मां उसे अपनी चहचहाट से दूर करने का प्रयास भी करती ।अक्सर मेरे  दोनों बच्चे मुझसे पूछते कि एक बार घोंसले से निकलने के बाद क्या फिर वो अपनी मां को पहचान पाएंगे ? और इसी तरह की कई बातें हमारे टेलीफोनिक वार्ता का हिस्सा बन चुकी थी।
इस कहानी का अंत शायद अत्यंत सुखद होता अगर परसों बहुत सुबह बेटी का जोर जोर से रोता हुआ फोन मेरे पास नहीं आता । कुछ देर रोने के बाद जब उसने बताया कि कौवे ने घोंसले में मौजूद दोनो बच्चों को मार दिया और उनकी मां उन्हें बचा नही पाई। अपनी सुबह की नींद को कोसती बेटी लगातार रोती जा रही थी ।
    शायद यही प्रकृति का नियम है जिसके अनुसार हर क्षेत्र में कमजोर ,ताकतवर के द्वारा शोषित होता है ,मेरे पास इन शब्दों में उसे दिलासा देने के अलावा दूसरा कोई वि
वैसे अगर सच कहूं तो मुझे बेटी को समझाने के लिए कहे गए अपने  ही शब्द बेहद खोखले लगते हैं  क्योंकि कमजोरों और निरीहों को दबाने की प्रवृत्ति क्या प्रकृति तक ही सीमित है ?
 

Thursday, 4 May 2023

इन दिनों मेरे पति के इंटीरियर वर्क्स के काम के सिलसिले में एक नए बढ़ई को देख रही हूं। अपने काम में निपुण उस बढ़ई की भाषा  सहज में समझ नहीं आती है जिसके कारण उसके साथी बढ़ई उसके बोलने की नकल करके उसका मजाक उड़ाया करते हैं। चूंकि अभी कुछ दिन पहले ही उसने आना शुरू किया है तो उसके और उसके परिवार से मैं अपरिचित हूं। 
जहां दिनभर वो अपना काम पूरी लगन से करता शाम के चार बजे से ही अपने औजार समेटने लगता जबकि दूसरे, सात से पहले जाने का नाम नहीं लेते ।इस विषय पर कितनी ही बार बोलने पर उसपर कोई असर नहीं होता।  कल फिर जब वो साढ़े चार के लगभग घर जाने के लिए बिल्कुल तैयार हो था तो मैंने उससे पूछा कि "आप कहीं दूसरी जगह भी काम करते हैं क्या ? 
नहीं ! सिर हिला कहा ।
फिर ?
शादी के पंद्रह साल के बाद बेटी हुई है, अभी अभी उसने बोलना शुरू किया है और शाम होते ही सो जाती है। शरमाते हुए उसने बताया।
अच्छा ! मैंने रुचि दिखाते हुए कहा।
क्या बोलती है ?
पापा ! और बिल्कुल साफ बोलती है मेरी तरह नहीं !
 छोटी सी बेटी की साफ बोली ने उसके जिंदगी भर के हीन भाव पर एक मलहम का काम किया । 
जेहन में याद आ गई फिल्म कोशिश का  वह दृश्य जब संजीव कुमार और जया भादुड़ी एक मूक वधिर माता पिता की भूमिका में थे और बच्चे के न सुनने से परेशान हो गए थे। 
फिर बेटी के  पिता का "पापा जल्दी आ जाना" की डोर पर खींचा जाना मेरे चेहरे पर मुकुराहट लाने के लिए काफ़ी था।



 

Friday, 14 April 2023

सतुआइन

आज सतुआइन है आज के दिन  हमारे मिथिला में सत्तू ,बेसन की कढ़ी,सहजन और दालपुरी आदि खाने की परंपरा है। आज जिन खाद्य पदार्थों को हम ताजे रूप खाते हैं उन्हीं को कल के बासी खाने का भी रिवाज है अर्थात् कल के दिन चूल्हे को आराम दिया जाता है जिसे आम भाषा में जुराने का नाम दिया जाता है।जिस चूल्हे ने सालभर हमें अपनी निर्विघ्न सेवा  दी उसे निर्जीव होते हुए भी जुराया जाता है। वैसे अब तो हमारी नई पीढ़ी पूरे साल ही  पिज्जा, बर्गर के रूप में बासी खाना खाती  है।
इन खाने पीने के साथ आज के दिन अपने साथ साथ अपने पूर्वजों के लिए भी  सत्तू ,घड़ा और  पंखा दान करने की परंपरा है। पिछले चार सालों में मैंने पहले अपने पापा ,फिर सासु मां और फिर ससुरजी को खो दिया। संयोगवश अंतिम दिनों में तीनों को ही परहेज के तौर पर डॉक्टर ने मात्र एक से डेढ़ लीटर पानी पीने को कहा था जिसमें दाल,दूध और चाय की मात्रा को शामिल किया जाना था । जो गर्मी क्या जाड़े में भी काफी कष्टप्रद थी ।बहुधा मैं उन्हें तयशुदा पानी से ज्यादा पीने पर टोक  दिया करती  थी। आज तीनों ही हमारे बीच नहीं है और  अब वे जहां कहीं भी होंगे उनके लिए कोई भी वर्जना नहीं होगी   ।हमारे इन्हीं पूर्वजों के लिए उनके संतानों को  इस तरह के दान का प्रावधान सुकून देता   है।कहते हैं कभी औरंगजेब के अत्याचारों से दुखी होकर पिता शाहजहां  ने हिंदू जाति का हवाला देकर कि धन्य है हिंदू धर्म जो अपने मरे पूर्वजों को भी पानी देता है और.......
"आज उंगली थाम के तेरी तुझे मैं चलना सिखाऊं,कल हाथ पकड़ना मेरा जब मैं बूढ़ा हो जाऊं "
सुदामा नहीं रहा ! पिछले लगभग सात दिनों से ये बात हमारे गली ,चौक और हर मिलने वाले के मुंह पर था और जिसने भी सुना अरे कैसे ! पिछले छह महीनों से बीमार था न । ओह बेचारा ! सभी ने एक अफ़सोस जरूर जाहिर की  लेकिन अफसोस के साथ प्राय  सभी ने कहा दोनों लड़के तो दिख ही रहे हैं लगातार प्रेस करते हुए दिख ही रहे हैं।
अरे आप भी न ! इन लोगों का क्या  ! व्यंग्य के साथ बात खत्म हो गई।
          अब बात सुदामा की ।कौन था ये सुदामा ? तो सुदामा हमारे अपार्टमेंट की गेट की बगल में कपड़ा प्रेस करने वाले का नाम था । जो लगभग पच्चीस वर्षों से कपड़ों को प्रेस करने का काम करता था । जगह मिलने की आस पर कई सालों तक हमारे अपार्टमेंट के साथ साथ बगल अगल के कई अपार्टमेंटों में गुजारिश करता रहा लेकिन जगह नहीं देने की हालत में हार कर  यहां वहां सड़क के किनारे ,पेड़ के नीचे अपनी चौकी ,चूल्हा लेकर खुशी खुशी अपनी दुकान चला रहा था। उसकी सुबह पांच बजे हो जाती जो रात के दस बजे तक चलती । न भीषण ठंड को उसने माना न ही चिलचिलाती धूप ।  कोरोना में जब रोड बिल्कुल सुनसान सुदामा की आवाज सुनाई देती ही रही  । घर से कहीं निकलते  वक्त गार्ड  चाहे गाड़ी को गेट से निकलते वक्त नहीं रहे ,सुदामा गाड़ी के दिशा निर्देश को तत्पर ।हर आने जाने वालों को टोकता सबके हाल चाल लेता ।
अब बात आती है उसके मौत पर हुए उसके बेटों की , जो मातमपुर्सी करने की जगह तीसरे दिन से ही प्रेस करने में जुटे हुए हैं। तो अलग अलग संप्रदाय में इसके अलग अलग तरीके बताए गए हैं ।हमारे मिथिला में माता पिता के मरने के बाद मासिक छाया करने का प्रावधान है और पांच वर्षों तक बरखी को श्राद्ध कर्म की तरह किया जाता है ।जो अन्यत्र कहीं सुनने में नहीं आया। इसी प्रकार कहीं कहीं पुण्यतिथि के अवसर पर शांति सभा या दरिद्र भोजन करवाने की बात भी सुनने में आती है।
      लेकिन जब सुदामा के बेटों को देखती   हूं तो यशपाल की लिखी कहानी "दुःख का अधिकार" की याद आती है जिसमें किसी के परिवार को अपने परिजन की मौत पर भी शोक मानने का अधिकार इंसान के आर्थिक और सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता है । यहां किसी जाति या संप्रदाय का होना किसी श्राद्ध कर्म को प्रभावित नहीं करता है जितना कि उसकी आर्थिक स्थिति का । याद आती है पिछले नवंबर में ससुराल के गांव  की । जहां एक बिजनेस करने वाले  के वयोवृद्ध  पिता की मृत्यु हो गई तो उसके क्रिया कर्म के लिए  स्पेशल ऑर्डर के द्वारा पूर्णिया के गुलाब बाग से  दो ढाई  मन चंदन की लकड़ियां मंगाई गई ,दस दस डीजे के साथ धूम धाम से उनका अंतिम संस्कार किया गया।लगातार दस दिनों तक पूरी बस्ती को खिलाया जाता रहा और बारहवीं के दिन इलाके के तमाम प्रतिष्ठ लोगों के साथ  बीस हजार लोगों को खिलाया गया । 
कहने का मतलब यह है कि माता पिता के मरने पर दुःखी हर व्यक्ति होता है लेकिन इस मृत्यु पर होने वाला श्राद्ध कर्म या कोई भी मृत्यु भोज मात्र एक श्रद्धांजलि है जो व्यक्ति विशेष की परिस्थिति पर निर्भर करता है । पहले भी इन विषयों पर टीका टिप्पणी की जाती रही है और भविष्य में भी होती ही रहेगी ।तो इनकी इतनी विवेचना हो कि साहिर लुधियानवी के शब्दों में कहा
"ये महलों ,ये ताज़ो ,ये तख्तों की  दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हो 
आज सतुआइन है आज के दिन  हमारे मिथिला में सत्तू ,बेसन की कढ़ी,सहजन और दालपुरी आदि खाने की परंपरा है। आज जिन खाद्य पदार्थों को हम ताजे रूप खाते हैं उन्हीं को कल के बासी खाने का भी रिवाज है अर्थात् कल के दिन चूल्हे को आराम दिया जाता है जिसे आम भाषा में जुराने का नाम दिया जाता है।जिस चूल्हे ने सालभर हमें अपनी निर्विघ्न सेवा  दी उसे निर्जीव होते हुए भी जुराया जाता है। वैसे अब तो हमारी नई पीढ़ी पूरे साल ही  पिज्जा, बर्गर के रूप में बासी खाना खाती  है।
इन खाने पीने के साथ आज के दिन अपने साथ साथ अपने पूर्वजों के लिए भी  सत्तू ,घड़ा और  पंखा दान करने की परंपरा है। पिछले चार सालों में मैंने पहले अपने पापा ,फिर सासु मां और फिर ससुरजी को खो दिया। संयोगवश अंतिम दिनों में तीनों को ही परहेज के तौर पर डॉक्टर ने मात्र एक से डेढ़ लीटर पानी पीने को कहा था जिसमें दाल,दूध और चाय की मात्रा को शामिल किया जाना था । जो गर्मी क्या जाड़े में भी काफी कष्टप्रद थी ।बहुधा मैं उन्हें तयशुदा पानी से ज्यादा पीने पर टोक  दिया करती  थी। आज तीनों ही हमारे बीच नहीं है और  अब वे जहां कहीं भी होंगे उनके लिए कोई भी वर्जना नहीं होगी   ।हमारे इन्हीं पूर्वजों के लिए उनके संतानों को  इस तरह के दान का प्रावधान सुकून देता   है।कहते हैं कभी औरंगजेब के अत्याचारों से दुखी होकर पिता शाहजहां  ने हिंदू जाति का हवाला देकर कि धन्य है हिंदू धर्म जो अपने मरे पूर्वजों को भी पानी देता है और.......
"आज उंगली थाम के तेरी तुझे मैं चलना सिखाऊं,कल हाथ पकड़ना मेरा जब मैं बूढ़ा हो जाऊं "