Monday, 30 May 2016
गाड़ी कैसी ? ज़िन्दगी की या हकीकत की .
Sunday, 29 May 2016
वो एक रोटी
बात तब की है जब मैं छठी क्लास में पढती थी ।उस समय घर से कूङा उगाही की कोई ऐसी व्यवस्था नही थी काम वाली बाई ही कचङे को एक निश्चित स्थान पर फेंकती थी ।लेकिन जिस दिन बाई नही आती, हम तीनो भाई बहन की इस काम के लिए पुकार होती कि कोई एक इस काम को करें ।इसी क्रम मे ने मै कूङा फेकने गई ।जैसे ही मै कूङे को फेक कर पीछे हटी एक छोटी सी बच्ची ने उस कूङे से कुछ उठा लिया ।तुरंत मेरे दिमाग मे ये बात आई कि लापरवाही वश हमने कूङे में कुछ कीमती सामान को फेंक दिया है और इस बच्ची ने उठा लिया है ।मैंने लगभग धमकाते हुए उस बच्ची के हाथ से उस छिपाई गई चीज को छीनना चाहा लेकिन वो तो एक रोटी थी ।बरसों बाद जब मैंने मुंशी प्रेमचंद की कहानी "बूढी काकी "पढी तो जूठन चुनती काकी और कूङे के ढेर से रोटी झपटती हुई बच्ची में मुझे एक अद्भुत साम्य नजर आया ।आज भी शादी विवाह और भोज के मौके पर फेंके खाद्यान्न मे मुझे उस बच्ची की दयनीय आँखे याद आ जाती है ।
पिछले पखवाड़े मे मेरी छोटी पुत्री का रिजल्ट प्रकाशित हुआ ।उसने काफी अच्छे नंबरों से दसवीं की परीक्षा पास की ।रिजल्ट से पहले ही उसने तय कर रखा था कि उसे आर्ट्स की पढ़ाई करनी है ।रिजल्ट के बधाई के साथ प्रायः सबने एक ही बात कही " साइंस लेना है ना" ।मेरे नहीं कहने पर "अच्छा फिर कामर्स "।नहीं इसे आर्ट्स लेना है ।क्यों नम्बर तो है ! बस इसका मन है ।इसी बीच उसकी एक सहेली उससे मिलने को घर आई ।उस बच्ची के बारे मे मै जानती थी कि अंग्रेजी और हिंदी दोनो ही भाषा पर इसकी जबरदस्त पकड़ है और किसी भी विषय पर कभी भी लिखना इसकी विशेषता है। हर प्रकार की कविता दोनो ही भाषा मे वो किसी भी क्षण लिख सकती है ।मेरी समझ से ये देवी सरस्वती का वरदान है।जो हरेक को नहीं मिलता ।लेकिन माँ-बाप की जिद है कि वो डाक्टर ही बने ।पूरी परीक्षा उसने तनाव मे गुजारी ।जिस दिन हिंदी की परीक्षा थी उस के एक रात पहले वो फिजिक्स पढ रही थी ।अंतिम परीक्षा के दिन उसने लगभग रोते हुए कहा कि मेरे तो साइंस और आर्ट्स दोनो अच्छे नही हुए । बावजूद इसके रिजल्ट मे उसके साइंस में लगभग 60% आए और नहीं पढने के बाद भी आर्ट्स में 96% + नंबर आए ।मैंने उसे दिलासा देते हुए कहा कि कोई बात नही डाक्टर लेखक हो सकता है ना ।शौक तो मरता नही !उस बच्ची ने कहा कि शौक तो उम्र के साथ बढती जाती है । खैर मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि वो उसके माँ-बाप की इच्छा और उसके शौक के बीच तालमेल बैठाने मे उस छोटी सी बच्ची की मदद करें ।
दो दशक पूर्व मैंने श्री कृश्न चन्दर की पुस्तक "गूंगे देवता " पढी थी ।लेखक ने अपनी कल्पना मे उस युग की व्याख्या की जबकि देवता बोलते थे और आम आदमी उनके पास जाकर अपनी समस्या रखते थे ।कहानी के अनुसार एक किसान अपने नवजात शिशु के देहांत पर भगवान् के पास गया तो उन्होंने उसे कहा कि कोई बात नही बीवी तो है ना बच्चे दुबारा भी हो सकते है ।अगली बार उसने अपनी बीवी और बच्चे दोनो को खो दिया तो भगवान् ने दूसरी कुंवारी लङकियो की ओर इशारा किया और फिर से विवाह करने को कहा ।कुछ दिन के बाद किसान ने अपने पैरो को गंवा दिया और फिर रोता हुआ किसी तरह भगवान् के पास पहुंचा फिर भगवान् ने उसे दिलाया देते हुए कहा कि क्या हुआ कि तुम्हारे पैर नही है तुम्हारे पास दो हाथ है ।अब किसान के सब्र का बांध टूट चुका था उसने भगवान् के हाथ को तोड़ दिया और कहा कि क्या हुआ कि आपके पास हाथ नही है पैर तो है ना ।बस उस दिन के बाद भगवान् पत्थर के हो गए और उन्होंने बोलना भी छोड़ दिया ।भले ही ये एक कल्पना हो लेकिन अपने इर्द-गिर्द हम कई ऐसे लोगो को देखते है जो आजीवन सच्चाई का ही साथ दिया और कभी अपने कर्तव्य से नही चूके ।बदले मे अपनी पूरी जिंदगी उन्होंने कष्ट ही पाया और एक भ्रष्टाचारी और एक बेईमान जिसके कटु वचनों से लोग त्रस्त रहे वो दिनोंदिन हर प्रकार तरक्की करते रहे ।मै नास्तिक नही हूँ लेकिन क्या यह स्थिति घोर कलयुग की ओर इंगित नही करती है और हमारे समाज मे इसी कारण वश जालसाज साधु और साध्वी का वर्चस्व बढता जा रहा है। ?
अल्मोड़ा में एक कहावत है कि" जिस दिन से एक बच्चे ने हँसने की शुरुआत की उसी दिन से उसकी माँ के बालों के झङने की शुरुआत भी हो गई "।कहने का तात्पर्य है कि बच्चे के जन्म के साथ ही माँ की चिंता आरंभ हो जाती है ।आज जब मैं दो किशोरवय पुत्रियों की जननी हूँ तो मुझे लगता है कि ये बात न सिर्फ मेरी नही बल्कि मेरे जैसी सभी माताओं की है ।कभी-कभी हम अपने आप को इस कदर लाचार पाते है कि कोई कदम उठाने से पहले कई बार हमारी स्थिति साँप छछूंदर की हो जाती है ।कई बार मुझे बेहद परेशान देखकर मेरी एक प्रतिवेशिनी मुझे दिलासा दिया करती थी कि मात्र विश्वास की डोर से ही हम बच्चे को बाँध सकते है ।मेरी वसु घूमने की बेहद शौकीन है और उस हिसाब से हमारे पटना का माहौल थोड़ा असुविधाजनक है उसकी इसी आदत से तंग आकर मैने निश्चय किया कि अब मै उसे कही निकलने ही नही दूंगी ,मेरे घर काम करने वाली बाई ने हंसकर मुझसे कहा "चार पैरो वाले बांधे जाते है दो पैरों वाले तो कभी बंध ही नही सकते "।जो बात एक अनपढ बाई ने समझ लिया वो मै माँ से मम्मी मम्मी से माॅम और अंततः ममा होने के बावजूद समझ नही पाई !
बाल स्मृति के नाम पर एक बात मुझे अच्छे से याद है कि छुटपन से मुझे कामिक्स और अन्य किताबों का बङा शौक था ।जब मै माँ पापा के साथ किसी रिश्तेदार या पापा के किसी मित्र के घर जाती और अपनी मनपसंद किसी किताब देखने के साथ ही पढने लगती तो माँ आँख दिखाती और कई बार नही मानने पर लोगों के सामने ही जोरदार डाँट भी लगाती ।उतना ही नही घर आने के बाद भी माँ की यह दलील रहती कि तुम किताब पढो और सामने वाला अपमानित होता रहे ।चूंकि उम्र कम थी इसलिए इतनी बात समझ नही पाती लेकिन माँ की लगाई आदत बनी रह गई । आज किताबो की जगह मोबाइल ने ले लिया है हममे से बहुत लोगो की ये आदत है हम सामाजिकता के लिए कहीं जाते है और वहाँ तथा कथित सोशल मीडिया पर लग जाते है और शायद यह भूल जाते है कि हम किसी के पास बैठे है और बहुत संभावना इस बात की है कि कोई अपना जरूरी काम छोड़कर आप के पास बैठा हो । आप जिस किसी घर जाते है उनकी मनोस्थिति का भान आपको
शायद उस वक़्त हो जब ये घटना खुद आपके साथ घटे । इससे बहुत अच्छा है आप उस जगह जाए ही नही ।कम से कम आपके द्वारा किसी के समय का हनन तो नही हुआ !शायद हम इस बात को भूल रहे है हमारी आने वाली पीढ़ी हर बात में हमेशा हमारी ही नकल करती है ।
ऐसा शायद ही कभी होता है कि घर से बाहर निकलने पर किसी बाइकर्स से सामना न हो जाए कभी-कभी उसका स्थान बङी गाड़ी लेती है ।अब तो यह भय भी सताने लगा है कि कोई गाड़ी या बाइक वाला किसी विधायक या मंत्री का पुत्र न हो ।अक्सर ऐसी जगहों पर सबको भुनभुनाते सुना है बाप ने गाड़ी लेकर दे दी है या माँ की शह पर कूद रहा है ।मेरी एक सहेली कहती है कि बच्चे तो गलती कर के सुनते है लेकिन माँ-बाप तो बिना गलती ही सबकी सुनते है । पर गलती तो माँ-बाप की ही है शुरू में लाङ प्यार के कारण और बाद मे लाचारीवश बच्चों की जिद पूरी करनी पड़ती है और आज के दौर की कोई माँ शायद ही मदर इंडिया बनें ।हमारे मिथिला में एक कहावत है " बच्चा कानय तअ कानय बच्चा दुआरे अपने नै कानि अर्थात चाहे बच्चा रोए पर बच्चे के कारण हम न रोए ।"