Friday, 21 July 2017

मेरी छोटी बेटी अभी 12th में है और  तनाव में रहती है यूं तो अब तनाव तो छुटपन से ही बच्चों की आदतों में शामिल रहता है लेकिन वर्तमान में मेरी बच्ची के तनाव का कारण उसकी होने वाली बोर्ड परीक्षा के साथ प्रतियोगी परीक्षा है ।ये बात जनसाधारण को मालूम है किंतु उसके तनावग्रस्त होने की असली वजह मेरे परिवार के लोगों के साथ साथ चंद नजदीकी लोग ही जानते है ।तो उसके तनाव का कारण उसकी बड़ी बहन का अपने कैरियर का सेट हो जाना है ।ऐसे में गाहे बिगाहे वो अपनी तुलना अपनी दीदी से कर के अपने  कैरियर के लिए अतिरिक्त संशकित हो गई है । ये दो बहनें ,हर तरह से दो तरह की हैं ।जहां मेरी बड़ी बेटी खूब घुमक्कड़ और हर उम्र के लोगों से दोस्ती कर लेती है वहीं छोटी शांत और अंतर्मुखी है ।जहां बड़ी की दोस्तों को गिनने के लिए हाथ की उंगलियां कम पड़ जाती हैं वहीं दूसरी की गिनती की दो या तीन ही सहेलियां हैं ।संजोग की बात है कि दोनों ने बारहवीं के लिए एक ही स्कूल को  चुना । ऐसे में टीचर्स से लेकर जूनियर लड़कियां तक अनायास दोनों की तुलना कर बैठती हैं चूंकि बचपन में  कमोबेश इसी स्थिति से मैं गुजर चुकी हूँ तो छोटी की हालत समझना मेरे लिए आसान है  । किन्हीं दो लोगों का एक सा होना इस दुनिया में असंभव है फिर चाहे वो एक ही जनक की संतान क्यों न हो ।हमारे परिवारो  में दो पीढ़ी के बीच अलगाव का एक मुख्य कारण दोनों पीढ़ी के बीच तुलनात्मक विश्लेषण भी है । पुरानी पीढ़ी अपने काम और अपनी जीवन शैली को अधिक दुरूह मानते हैं जबकि नए लोगों को ये बात अपील करती है किे ठीक है  पुराने ज़माने में इस्तेमाल होने वाली रोज़मर्रा की वस्तुएं की जगह पर नई चीज़े हर लिहाज से सुविधापूर्ण हैं और बहुत सी ऐसी चीज़ें भी अब सहज उपलब्ध हैं जिनके बारे में पहले सोचा भी नहीं जा सकता था लेकिन प्रतियोगिता औऱ  कितनी ही अन्य परेशानियों के कारण पहले की तुलना में जिंदगी कई गुना ज्यादा  कठिन हो गई है ।और इस प्रकार की सोच को ही शायद जेनरेशन गैप का नाम देते हैं ।तो जहां तक मैं सोचती हूँ जिंदगी में तनाव तब  भी थे अब भी हैं कुछ बातें तबआसान थीं कुछ अब आसान हैं तो गलत क्या हैं ? तुलना ... फिर चाहे वो माँ बेटी में हो ,सास बहू में हो या बच्चों के बीच में ।परमपिता परमात्मा की बनाई हर कृति अपने आप में अतुलनीय हैं ऐसा मेरा विश्वास है .

Monday, 10 July 2017

कल सावन की पहली सोमवारी थी । हमारे यहाँ मुँह अंधेरे से छोटे- छोटे बच्चे बेलपत्र ले लो कहते हुए सड़क के इस कोने से उस कोने तक कई कई चक्कर लगाते हैं और शायद 20-25 रुपए कमा लेते हैं।कल लगभग 11 बजे चौक की दुकान से लौट रही थी तो पीछे से 8-9 साल का बच्चा पूछने लगा ,आंटी बेलपत्र लीजिएगा ? मैंने कहा इस समय ?मैंने तो नाश्ता भी कर लिया ।इतनी लेट से क्यों लाते हो , 8- 9 साल होने पर भी उसकी बोली में तुतलाहट थी ,आंटी सुबह तो  इस्कूल जाते हैं न ! वाह ,मैंने कहा तो जाने से पहले आकर बेलपत्र दे दो ।चलो मैं अपना घर दिखा दूँ ।छोटा सा बच्चा मेरे पीछे पीछे ।बोला ,मैं सुबह 6 बजे से पहले आकर दे दूँगा ।मैंने कहा सुनो ,तुम संडे को देना ,उस दिन स्कूल बंद होता है ।हाँ ठीक है ।कहता हुआ लड़का चला गया ।कल से बहुत बारिश हुई और कुछ उच्च कक्षाओं को छोड़कर सभी स्कूल जिलाधिकारी के आदेश से बंद हो गए ।आज सुबह बल्कि बहुत सुबह वो बच्चा ,आंटी पूजा कर लीं?नहीं तो ,लीजिए बेलपत्र ।अरे तुम स्कूल नहीं गए, नहीं आज तो पानी के कारण स्कूल बंद हो गया न !  अरे हाँ  ! कितने पैसे ? 5 रुपये का एगारह ! मुझे ऐसा लगा कि इसे दस रुपए दे दूँ ।लेकिन फिर अपने आप को रोका ।जब वो छोटा सा बच्चा मेहनत करने को तैयार है तो उसे भीख क्यों दूँ ?  चाहे सरकार  बाल श्रम के विरूद्ध कितने ही कानून बनाए जब तक वो सबके लिए रोजगार या रोटी नहीं जुटा सकती , हर गरीब के घर के छोटे बच्चे पैसे की जुगत लगाते ही रहेंगे ।पर  इस बच्चे  के लिए दो अच्छी बात लगी ,पहला उसका स्कूल जाना और दूसरा उसका मेहनत करना।

Friday, 7 July 2017

कुछ समय पूर्व मैंने एक पोस्ट पढ़ा था कि नानी का घर तिलिस्म की तरह होता है शायद ही कोई ऐसा होगा कि जिसके चेहरे पर ननिहाल की स्मृति मुस्कान न ले आए ।ऐसी ही कुछ यादें हमारे ननिहाल से जुड़ी हैं ।मैं अपने आप को इस मामले में बहुत खुश किस्मत मानती हूँ कि मेरे माता पिता दोनों ही वैभव पूर्ण परिवार से संबंध रखते हैं ।फर्क सिर्फ इतना था कि जहाँ मेरा पितृकुल बौद्धिक रूप से अति समृद्ध था वहीं मेरी माँ  आर्थिक रूप से अति समृद्ध परिवार से थी ।मेरे नानाजी एक बड़े जमींदार थे जिनकी सम्पन्नता दूर दूर तक फैली हुई थी ।जहां तक बात छुट्टियों में ननिहाल जाने की है वो मेरे पापा को बिल्कुल ही पसंद नहीं थी ।जहाँ हमारा घर या ददिहाल अत्यंत अनुशासन प्रिय था ,हर काम नियम से बंधे हुए , सवेरे उठना ,हाथ मुँह धोकर पढ़ाई करना समय से नहाना ,हर वो चीज़ जो खाने की उसमें ना नुकुर की कोई गुंजाइश नहीं इसके विपरीत हम जब भी किसी शादी विवाह या किसी खास मौके पर कटिहार ( हमारा ननिहाल) जाते तो वहाँ के स्वछंद जीवन को खुलकर जीते ।एक बहुत बड़ी हवेली, जिसे वहाँ ड्योड़ी कहा जाता ।ड्योढ़ी के ठीक सामने बड़ी सी फुलवारी और उसके बाद एक बड़ा सा तालाब ।घर के पीछे एक बहुत बड़ा बगीचा जिसमें विभिन्न प्रकार के  फलों के पेड़ और जहाँ तक मुझे याद है ,मौसम के साग सब्जी होते थे ।जब पिछली गर्मी में नैनीताल गई तो रोड पर फालसा नाम से बिकते फल मुझे अपने ननिहाल के बाग़ के होरसा और होरफा फल की याद दे गई जिसे हमने कितनी ही दोपहर की चिलचिलाती गर्मी में मौसेरे और ममेरे भाई बहनों के साथ तोड़ा था ।हमारे ननिहाल में बहुत सी ऐसी वस्तुएं थीं जिसे हमने मात्र वहीं देखा ।एक बड़ा सा पलंग जिसके चारों ओर लकड़ी के रेलिंग लगे थे जिसे सोने के समय कब्जे की मदद से खड़ा कर दिया जाता ताकि बच्चे न गिरे ये पलंग मेरी नानी के कमरे के बगल वाले कमरे में था ।इस पलंग की  चौड़ाई और लंबाई कितनी थी ये तो नहीं मालूम लेकिन इसपर  छुट्टियों में जमा होने वाले सभी बच्चों को आराम से सुला लेने की अद्भुत क्षमता थीं ।वहां के हर एक पलंग के पंखे मच्छर दानी के अंदर ही होते थे एक बड़े डंडे की मदद से पूरी मच्छर दानी को उठाया और गिराया जाता था ।हाल के दिनों में मैंने एक पुराने बंगला पिक्चर में ऐसे ही पंखे को देखा ।वहाँ की एक अद्भुत चीज़ों में मुझे एक बहुत बड़ा मार्बल का डाईंनीग टेबल टॉप था हालांकि मैंने कभी उसपर कभी किसी को खाते नहीं देखा ।वैसे जिन दिनों को मैं याद कर रही हूं उस समय वहां मौजूद गाड़ी ,फोन और फ्रिज जैसी वस्तुओं का चलन जनसाधारण के पहुंच से दूर होती थी ।पता नहीं  वो फ्रिज की पहली छवि ,वो फ्रिज के दरवाजे से निकलने वाला ठंडा धुँआ ,दशकों बाद मेरे लिए रोमांचक है। वैसे मैंने अपनी माँ के मुँह से वहां बिजली के आने से पहले किरोसिन पर चलने वाले फ्रिज की भी चर्चा सुनी है । कटिहार एक छोटी जगह है ,तो वहां के बाज़ार और सिनेमा हॉल भी नज़दीक ही थे ।जब हम छुट्टियों में वहाँ जाते तो सभी बच्चे गाड़ी में भर कर सिनेमा जाते इस क्रम में जो कोई बच्चा सो रहा होता उसे मौसी या बड़ी दीदी किसी तरह उठा कर गाड़ी में चढ़ा देती ।आज जब किसी बच्चे को गाड़ी में कम जगह की बात पर नाक भौं चढ़ाते देखती हूँ तो अपना बचपन याद आता है क्योंकि हमारे समय के बच्चों के लिए  किसी भी  तरह गाड़ी में चढ़ना ही  काफी था ।जिस सिनेमा को हम बच्चे दिन में देखते उसी को एकाध को छोड़कर सारे बड़े रात में देखने जाते और उनके जाते ही शुरू होता ,ममेरे भाइयों के भूतों वाली किस्सों का दौर ,उन दिनों 20 पैसे वाले ताम्बे के सिक्के के द्वारा आत्माओं को बुलाने का खेल बड़ा लोकप्रिय था ।उसके बाद तो किसी की हिम्मत नहीं बाथरूम तक को जाए ।बड़े बड़े हिलते हुए  नारियल के पेड़ से लेकर बड़े से कई कमरे वाले बाथरूम तक भूतिया लगता ।मामा के घर से कुछ दूरी पर काली मंदिर है जिस पर मामा लोगों का स्वामित्व है,रोज़ उस मंदिर के पुजारी लड्डू ,बताशा और पेड़ा का प्रसाद लाते ।शनिवार और मंगलवार को बलिप्रदान वाले मांस के साथ ढेर सारी मिठाइयां  डयोड़ी पहुँचाई जाती जितने भी हम कटिहार में रहते मांस मछली और मिठाईयो की निरंतरता से ऊब जाते ।पर्व की बात की जाए तो काली पूजा अर्थात दीवाली वहां का वार्षिक पर्व ,पूरी रात काली मंदिर में भव्य पूजा होती  वैसे दुर्भाग्य से हमने कभी इस पूजा को नहीं देखा ।एक और बचपन की मधुर याद ,काली मंदिर के प्रांगण में शनिवार औऱ मंगलवार को मेला लगता जिसमें सुंदर सुंदर मिट्टी की मूर्तियां बिक्री होती ।कितनी ही बार हम उन सुंदर मूर्तियों को अपनी जोड़े हुए पैसों से खरीदते और रांची पहुंच कर मूर्तियों के भग्न रूप को देखकर खूब रोते ।आज जब उन पुरानी यादों को याद करती हूँ तो मुझे ऐसा लग रहा है कि इन यादों में मैं अकेली नहीं मेरे साथ मेरी मौसियां, दोनों मामा और सभी ममेरे ,मौसेरे भाई बहन हैं ।याद आता है एक विशाल ड्योरी ,बड़े बड़े भूकते एलसिशयन  कुत्ते ,पेंडुलम वाली टनटनाती घड़ियां ,पुराने ढंग के फर्नीचर ,पुरानी लेकिन कभी जंग नहीं लगने वाले ग्रील,अनिंद्य सुंदरी दोनों मामियां और बहुत कुछ ।अचानक मुझे रेलवे की सीटी की आवाज़ आती है तो याद आता है कि बहुत समय पहले नानाजी की बहुत सी जमीन रेलवे के द्वारा ले ली गई थीं इसलिए ठीक ड्योरी के पीछे रेल लाईन है  ।जिससे रेल गुजरने पर ऊपर की मंजिल की खिड़कियों से उसे देखना हमारे प्रिय खेल में था ...........

Sunday, 25 June 2017

आज ईद है ।सारे देश में इसकी धूम है ।इस पर्व को हमने अपने प्रतिवेशियों के साथ लगभग 9 -10 सालों तक मनाया है ।याद आती है हिना और खस में डूबा वो रुई का टुकड़ा और साथ में किए गए कई  कई इफ्तार ।वो समय था जब हम पापा को मिले यूनिवर्सिटी के फ्लैट में रहते थे ।12 परिवारों वाले उस फ्लैट की खासियत  वहां रहने वाले तीन मुस्लिम ,एक पंजाबी ,एक बंगाली परिवार औऱ शेष बिहारियों को मिलकर बने एक छोटे समाज की थी ।  परंपरा और आधुनिकता एक अद्भुत मेल । एकाध महिला को छोड़ कर प्राय सभी प्रोफ़ेसर ही थीं ।बकरीद और ईद  की सेवईयों का स्वाद आज भी नहीं भूली ।उन्हीं दिनों विश्व हिंदू परिषद द्वारा "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं "जैसा फतवा जारी किया गया।पापा शुरू से जनसंघी तो असर न सिर्फ मेरे घर पर बल्कि फ्लैट में रहनेवाले तमाम हिन्दू परिवार पर पड़ा लेकिन फिर भी  आपसी प्रेम में कोई कमी नहीं ।धर्म अपनी जगह और प्रेम अपनी जगह ।अगर हम ईद मानते तो होली के रंग से सरोबार होने से मुस्लिम परिवार भी नहीं बचते ।याद आती है उन आंटियों से सीखी गई बिरयानी और फ़िरनी के लिए दी गई घुट्टी और याद आता है मेरी दीदी की शादी के बाद एक साथ सभी  फ्लैट के बच्चों का  मिथिला की तर्ज़ पर जीजाजी को  ओझा जी कहना ।हमारे घर के पहले वाली बस्ती मुस्लिमों की थी जहां रुककर पापा रोज़ एक  मौलवी साहब की दुकान पर पान खाया करते थे ,यहाँ जितना विश्वास पापा का उन मौलवी साहब पर था उतना ही स्नेह वो पापा पर रखते  ।अन्यथा शहर में तनाव होने पर पापा को जल्दी ही घर जाने की सलाह नहीं देते ।क्या कहूं न तब लोग बुरे थे न अब लोग बुरे हैं !तब मैं ईद की दावत पर जाती थी आज मेरी बेटियां ईद मना कर आई हैं । तनाव दोनों संप्रदाय के बीच तब भी होता था  ,रामनवमी और बकरीद तब भी रांची के लिए पर्व नहीं एक चुनौती होती थी , आज भी है ।वजह एक नेता और राजनीतिक हवा जिसपर पूरी सत्ता और विपक्ष टिका है।

Thursday, 1 June 2017

गिफ्ट

बात तबकि है जब हमने अपनी नई गृहस्थी शुरू की थी ये अलग बात है कि हमने ऐसा अपनी शादी के 12 -13साल के बाद किया ।जब मेरी शादी हुई तो मेरे पति उसी शहर में नौकरी करते थे जहाँ मेरे सास ससुर रहते थे इसलिए मैं उसी गृहस्थी का हिस्सा बन गई अर्थात मुझे किसी भी सामान की कोई दिक्कत नहीं हुई और माँ के तरफ से जो भी सामान मिले वो लगभग पैक ही रहे ।इसी बीच मेरे दो बच्चे भी हो गए और फिर एक दिन राज्य के बंटवारे के कारण मेरे पति को नए राज्य का इंचार्ज बना कर भेजा गया ।जाहिर है वहाँ मुझे भी जाना था ।अब शादी के इतने साल के बाद पति के साथ अकेले रहने की खुशी क्या होती , बच्चों के एडमिशन और  घर गृहस्थी की चिंता मुझे सताने लगी ।खैर शादी के समय से पैक किए गए सामानों के साथ हम नई जगह पर पहुंचे ।धीरे धीरे हम गृहस्थी जमाने लगे ।सबसे पहला प्रश्न था बेटियों के एडमिशन का ।ऑफिस के साथ हम उसके लिए भाग दौड़ करने लगे ।चूँकि ऑफिस का नया ब्रांच शिफ्ट हुआ तो वह भी कामों की लंबी लिस्ट थी । वह जब मैंने अपने किचन के सामानों को खोला तो उसमें स्टील का एक बेलन जो देखने में बड़ा सुंदर लेकिन किसी काम नहीं और चिमटा नदारद ।सामान चूँकि काम में नहीं लाया गया तो इन चीजों पर ध्यान नहीं गया ।काम वाली बाई से चिमटा के लिए कहा तो उसने अपनी समझ से एक लोहा का चिमटा ला दिया ।वो चिमटा मुझे रोटी के लिए कम किसी बाबाजी के चिमटे जैसा लगता ।मैं रोज़ पति से बेलन और चिमटे लाने को कहती और काम के ध्यान में वो भूल जाते और रोज़ रात के खाने के समय रोटी बनाते समय हमारी लड़ाई होती ।पति देव का कहना था कि मैं ऑफिस पर ध्यान दूँ या तुम्हारी बेलन और चिमटे के पीछे घूमूँगा।मैं कहती कि नए शहर में कहाँ से क्या खोजूं ? इस बेलन और चिमटे के कारण हम शायद अब तक सबसे ज्यादा लड़ चुके थे और बात दोनों के ईगो में लग गई ।मेरा जन्म दिन था और पिछली रात हम उसी बेलन वाले मुद्दे पर खूब लड़े थे ।मैं शाम में  मुँह फूला कर बैठी थी तभी पतिदेव आए ,मैंने देखकर अनदेखा किया वैसे भी सुबह से उन्होंने बर्थडे विश भी नहीं किया था उनके हाथ में बड़ी खूबसूरती से पैक किया गिफ्ट था जिसे उन्होंने मेरी ओर बढ़ाया मैंने गुस्से से लिया और टटोल कर अंदाज़ करने लगीं कि क्या गिफ्ट है ? कुछ पता नहीं चला तो रैपिंग पेपर हटाया और खुशी से चिल्ला उठी वाह ! बड़ी सुंदर और नाजुक सी एक बेलन और वैसी सुंदर सा एक चिमटा ।और दोनों जोर से हँस पड़े ।दोनों बेटियां दौड़ कर बाहर आई कि किस बात पर हम दोनों हँस रहे हैं लेकिन बात उनके समझ से परे ।यकीन मानिए आज तक मैं उस जन्म दिन के उपहार से जितनी खुश हुई उतनी तो कभी गहनों और कपड़ों को पाकर भी नहीं हुई !

Saturday, 27 May 2017

पिछले गर्मी की छुट्टियों में रांची गयी तो सुना कि मेरी एक बचपन की सखी ने अपने पिता को खो दिया ।स्कूल से लेकर अब तक मैंने उस परिवार से बहुत स्नेह पाया तो उस व्यक्ति की मृत्यु से मैं विचलित हो गई और मैंने उसकी माँ से फोन पर बात की । आशा के बिपरीत मैंने उनकी आवाज में हम सभी के लिए अच्छा संदेश पाया ।जब मैंने उनसे कहा कि आंटी ,बाबा चले गए ।उन्होंने अपनी दर्दभरी आवाज में कहा कि हां बेटा, बाबा तो चले गए ! जाने वाले को कौन रोक सकता है लेकिन मेरी दोनों बहुएं बहुत अच्छी है और मेरा बड़ा खयाल रखती है ।मैंने कहा कि हां आंटी बेटे अगर अच्छे हो तो बहुएं अच्छी हो ही जाती है ।उन्होंने छुटते ही कहा न बेटा ,बेटे तो मेरे खुद के हैं अगर मेरी बहुएं अच्छी न हो तो मेरे बेटों को बदलने में देर नहीं लगेगीं बल्कि मैं तो आज बुजुर्गो की हालत देख कर कहती हूँ कि मेरी बहुएं बहुत अच्छी है और वैसे भी मेरी ये सोच है कि अगर कोई आपको एक गिलास पानी का भी दे तो उसकी तारीफ जरूर करें ।बाद में मैंने अपनी उस सहेली से इस बात का जिक्र किया तो उसने हंसते हुए  कहा कि जब मेरी बड़ी भाभी आयी तो मेरी नज़र में उस लड़की में कुछ वैसी बात नहीं थी लेकिन माँ के हर छोटी बात में की गई तारीफ ने उसे वर्तमान में वाकई तारीफे काबिल बना दिया । तारीफ की इस आदत ने  छोटी को भी बड़ी के बराबर ला दिया । बचपन में हमने एक कहानी पढ़ी जिसमें यह कहा गया कि देवता और मानव में क्रोध और लोभ छोड़ कर दूसरा कोई अंतर नहीं अर्थात अगर मनुष्य के अंदर क्रोध या लोभ न हो वो मनुष्य न रह कर देवता बन जाए ,फिर वह लोभ अपनी प्रशंसा पाने का ही क्यों न हो।आप एक छोटे बच्चे की तारीफ कर देखिए वो  दुबारा कितने जोश से काम में लग जाता है  ।अर्थात किसी भी मनुष्य के लिए उसके काम के लिए दी गयी शाबाशी उसके लिए विटामिन का काम करती है ।तो मेरी ओर से छोटा मुँह बड़ी बात ,अपने रिश्तों में गर्माहट लाने के लिए अपनों  के कई गए काम की तारीफ करें ,इस मामले में ये सोचना गलत है कि ये उसे करना ही चाहिए ।तो किसी टीवी के विज्ञापन की तरह तारीफ करके देखिए ,अच्छा लगता है वैसे भी हमारे बड़े तो कह कर गए हैं " वचने किम दरिद्रता " ।

Friday, 19 May 2017

नेना स बियाह तक क सफर म कोनो कोनो  लोक हमर सभक जीवन म एहेन होई  छै जेकर स्मृति हर एक डेग पर आबि जाए छै ।हमर सभक बाबा ।बहुत पैघ भेला क बाद पता चलल ज ओ पपा क  बाबू नै कका रहथिन ।बच्चा म हुनकर छवि एकटा अत्यंत अनुशासन प्रिय मनुख क लगैत रहै ।छुट्टी म जखन दरभंगा डेरा पहुँचत रहि हम सब ,सब बेर बाबा क दूर स  बरंडा पर ठार देखियन ।रिकशा रुकैत देरि जोर से हँसैत दाइ क कहथिन यै ,मुंशी जी आबि गेला ।पपा क मुंशीजी कहैत रहथिन ,किया और कहिया स पता नहीं । सब बेर बबा क बाहर म ठार देखियन त हुए ज केना बुझि जाए छेथीन बबा आबि क समय ।जहिया छोट रहि बड्ड तामस उठेत रहे बबा क अनुशासन देख क ।की सब नै करबाक छै तेकर एकटा लंबा लिस्ट लगैत रहे लेकिन आब जेखन अपने अभिभावक भेनाइ बुझल भेल बुझि गेलिये ज कत्तई कठिन छै ,बच्चा सब क सही राह पर चलेनाइ ।एखनो ज कोनो अवंड बच्चा क देखइ छियै त होइये ज एकरा बबा क गार्जियनशिप क जरूरत छै ।आइ पपा सब भाई क परिचय हुनकर सब क पद क संगे केकरो दई छिये त एकता गर्व के अनुभूति होइत अछि ।शिक्षा क मामले म बबा बहुत बेसी
सचर रहैत ।हमर पुतोहु सब मैट्रिक क लैथ स हुनकर एकटा शौक तै बियाह आ बच्चा भेला क बाद माँ इ काज केलक ।जई समय म पर्दा और सामने ने आबि क बहुत बेसी प्रचलन रहे बबा  क सब पुतोहु सामने अबैत रहथिन आ बबा सब क अपन गप कहथिन ।एकटा गप मोन परैये  दरभंगा डेरा क बाहरवाला कोठरी म ,सेनियरटी वाइज ,पहिने ककाजी  काकी माँ,तखन माँ पपा ,फेर बरका कका काकू एहिना क सब बेटा भातिज क कनियाँ संगे बियाह के बाद क फ़ोटो देवाल पर टाँगल जेकरा बबा पाहुन क सब क शिक्षा आ पद के संगे  देखबथिन ।दोसर एकटा गप याद अबैत अछि बबा क नास्ता करै क ।बबा जलखै म भूजल चूड़ा फुला कआ दही नोन आ कनिये चिन्नी मिला क खाथिन आ खाई से पहिने जते बच्चा घर म रहे सब के बजबथिन ।हम सब गोल क के बैसिये आ बबा सब क बेरा बेरी क एक एक कौर डैथ जेकर स्वाद आई तक ने बिसरल ।
बबा सब क नाम रखथिन ओ चाहे कोनो नया बच्चा रहे हुनका बिना अर्थ क नाम नै पीसीन्द रहन ।हमरा अगर कोई पिंकी कहे त बिगड़ि जायत रहैत ओ कहैत ज पिंकी कोनो नाम छियै इ त कुकुर क नाम छियै अइ स नीक अहा अपन नाम पिनाकी राखि लिये त महादेव भ जायब ।अहा क कोई रंजना कहे तखने टा बाजू ।डेरा पर सब बच्चा मैथिली बाजे तेकर हुनका बहुत इच्छा शायद हुनके कराने हम सब भाइ बहिन मैथिली बजैत छि आ अझुका समय क बिपरीत हमर सभक बच्चों सब मैथिली बजाये आ विजातीय पुतोहु सब सेहो हमर सब के घर आबि क मैथिली बजाय लगलैत ।एक बेर बबा रांची आयल रहैत ,हम सब स्कूल जायत रहि बबा भइया क कहलखिन ज आलोक आइ पता क के आयब ज अहा क स्कूल म हमर एड्मिसन भ सकैए कि नै ,आ ओए म एडमिशन ल की सब चाहि ,हमरा इ गप्प बबा सुनेंने छैत ।ओ रोज़ भइया संगे स्कूल ,ड्रेस आ स्कूल जाई क गप करैथ लेकिन बबा कहलेंन ज हम त एडमिशन ल पूरा तैयार रहि लेकिन आलोक कहलक ज बबा एकटा समस्या अछि जे अहा बूढ़ ज भ गेलौं ।बहुत दिन त बबा इ बात क चर्चा करैत हँसैत रहैत ।बबा क पूजा केनाइ याद आबए आन पूजा क संगे महादेव बना क पूजा केनाइ हमरा ले एकटा कौतुक क विषय रहे कि एहेन महादेव होइ छथिन ,नोथनी झा हुनकर पूजा क ओरियान करथिन ।अइ बेर राँची गेलौ त अपन बच्चा क डिक्शनरी म जयंती भेटल ,ओए संगे सब बेर दशमी क बाद लिफाफ म हुनकर जयंती आ आशीर्वाद पठेनाइ मोन परि गेल । हुनकर आशीर्वाद आ पहिल पन्ना पर अपन लिखल एकटा दुर्गा पोथी देलैथ ज एखनो हमरा लग अछि ।आइ जखन इ लिखै ले बैसलौ त लागल ज् फेर स दरभंगा डेरा पहुंच गेलौ ।हम सब भाइ बहिन ,दाइ बरका टा भनसा घर खूब पैघ घर सब और बहुत किछ ।