Saturday, 15 May 2021

12मई की शाम सोनी ने msg दिया  पिंकी ,पापा चले गए। पापा मतलब  मेरे जन्म से बहुत पहले से ही हमारे परिवार के साथ जुड़े हुए  हमारे स्नेहिल मिश्रा चाचा (Dr S. P. Mishra) । सिस्टर शिवानी कहती हैं हमारी जीवन में कुछ हस्तियां ऐसी होती है जिसके साथ कोई रक्त  संबंध न रहने पर भी वो किसी अपने से अधिक प्रिय लगता है बस कुछ इसी तरह की डोर उस घर से बंधी हुई थी । वैसे तो हमारा पूरा परिवार ही उस परिवार के बहुत करीब था लेकिन मेरी तो सुबह शाम और हर छुट्टी ही वही बीतती थी शायद इसका कारण मेरा और सोनी (चाचाजी की बेटी) का हमउम्र होना हो ।  याद आता है बिल्कुल बचपन की धुंधली यादें जब चाचाजी हमें छोटी छोटी पहेलियों और अत्यंत मनोरंजक कहानियां सुनाते थे उसके बाद जैसे जैसे  उम्र बढ़ी चाचाजी के साथ "उसने कहा था","हार की जीत" जैसी ज्ञानवर्धक  कहानियों को सुनना याद है वहीं जाड़े  गर्मी की छुट्टियों में  बैठकर  Greetings बनाने और बहुत सी  बातें जो आज के बच्चों को मूल्य के हिसाब से  भले ही तुच्छ प्रतीत हो लेकिन अब  स्कूलों में समर कैंप में कुछ इस तरह की भी  activity करवाने की बात  सुनने में आती  हैं जो हमने चाचाजी के कारण वर्षों पहले कर ली थी ।शायद ही बचपन की कोई ऐसी समस्या रही हो जिसका समाधान उनके पास नहीं  रहा हो । समय के साथ साथ दोनों परिवार बरियातू वाले मुहल्ले को छोड़कर एक साथ खरीदे गए हरमू वाले नए मकानों  में आ गए ।इसी बीच बहुत सी अच्छी बुरी बातें दोनों परिवार में हुई पर दोनों  साथ मे बने रहे । दीदी की शादी और मेरी शादी दोनों में वे हमारे गाँव गए ।किसी भी संस्कृति को समझना उनकी आदत थी ।हर उम्र के लोगों से बात करना उन्हें प्रिय था और लोग भी उनसे बातें करने को  उत्सुक रहते थे फिर चाहे वो किसी भी उम्र के हो ।   दीदी की शादी में उन्होंने हर एक बात को समझना चाहा फिर चाहे वो  केले के तने से बनाए जाने वाले पत्तल  जो  सिर्फ मिथिला के बारातियों को खिलाने के लिए व्यवहार में लाया जाता है जैसी छोटी सी बात ही क्यों न हो। किसी एक  बाराती के द्वारा 150 रसगुल्ले खाए जाने वाली घटना से इतने चकित हुए कि उन्होंने बाकायदा उस आदमी का साक्षात्कार ले डाला । उस विवाह से संबंधित एक घटना  जिसकी चर्चा अकसर मिलने पर चाचाजी किया करते थे ।बात ऐसी है कि हमारे मिथिला के कुछेक गांव ऐसे है जिनका नाम कोई भी  मैथिल सुबह सुबह नहीं लिया करते हैं या तो उसका नाम खाने  पीने  के बाद लिया जाए अथवा उनके बदले छद्म नामों से काम चलाए जाते हैं ।परिस्थिति कुछ ऐसी थी कि दीदी की ससुराल सुबह नहीं लिए जाने वाले गाँवो में एक था इस बात ने चाचाजी को बेहद हँसाया कि गाँव के नाम सुबह लेने भर से दिनभर  खाना नसीब नहीं होता !बाद में वो अकसर मुझसे पूछते कि तुम्हारे ससुराल के साथ कोई ऐसी बात तो नहीं । 
शादी होने के बाद पहली डिलीवरी और सर पर hons की परीक्षा ।ऐसे में statistic की कठिनता को चाचाजी ने  इतने सरल ढंग से पढ़ा दिया कि सारे problemsही  खत्म हो गए ।
सितंबर95 , जब पापा को पहला heart attack आया मेरी बड़ी बेटी सिर्फ तीन महीने की थी उसे लेकर जब रांची पहुंची तो पापा  हॉस्पिटल में और मैं साधिकार  चाची के घर । ऐसे समय में मैंने कभी उनकी किसी भी परेशानी को नहीं समझा और अधिकार के साथ उनके पास जाती रही।ये अधिकार हमारे बच्चों के लिए वैसा ही  रहा।  बाद के वर्षों में चाचाजी भी कुछ अस्वस्थ रहने लगे लेकिन फिर भी उन्हें किसी भी मुश्किल की घड़ी में अविचल पापा के साथ खड़ा पाया । 2.5साल पहले जब  पापा की गंभीर रूप से बीमार पड़ गए तो मैं उन्हें पटना लाने रात की बस से रांची गई उस अहले सुबह की घटना मुझे आज भी भावविह्वल कर देती है ।  चार बजे की सुबह जबकि  ठीक से पौ भी नहीं फटा था मेरे बस से उतरने से पहले चाचाजी ऑटो लेकर खड़े थे। उसके बाद भी  कभी पापा की तबीयत थोड़ी सी नासाज़ हुई जब भी माँ पूछती बच्चों को खबर कर दूँ क्या ? पापा कहते नहीं वैसी कोई बात नहीं बस मिश्राजी  को फोन कर दो और हम तीनों भाई बहन  आश्वस्त ।पापा को डॉक्टर से दिखलाने जब पटना लाई  हर दिन दूरी के बावजूद अभिवावक के रूप में  चाचाजी को अपने साथ पाया । समय का खेल ,पापा और चाचाजी ने  साथ साथ लंबे समय तक morning walk करते हुए अपनी पारी समाप्त कर ली ।जब जब जाड़े और गर्मियों की छुट्टियों आती है चाहे बेटियां स्कूल से निकल गई हो और उन छुट्टियों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़े  लेकिन कहीं मन में आता है रांची जाऊँगी ,एक दिन मिश्रा चाचा के घर जाना होगा वहां शायद चाची से कहकरअरसा और धुसका(दोनो ही छोटानागपुर के डिस) खाऊँगी
 लेकिन धीरे धीरे  रांची हमारे हाथों  से दूर होता चला जा रहा है  या यूँ कहूं कि "बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए 😢😢

Tuesday, 11 May 2021

कोरोना की दूसरी लहर अपने प्रचंड रूप में आ चुकी है ।  आपदा के साथ साथ आए दिन ऑक्सीजन, दवाओं और इंजेक्शन की कालाबाजारी और जमाखोरी की बात सुनती देखती हूँ खैर इन्हें किस  नेता का संरक्षण प्राप्त है या इनकेपीछे कौन सी राजनीतिक पार्टी काम कर रही है ये जानने में मेरी न कोई  दिलचस्पी है और न मैं राजनीति को समझती हूं ।लेकिन इन बातों से परे मैं अपने आस पास बहुत से ऐसी बातें हैं जिसका कारण मात्र लोगों की लालच और स्वार्थपरता है । कोरोना काल में ऑनलाइन क्लासेज और WFH को वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में शुरू की गई। जिसे विद्यार्थियों और ऑफिस के कर्मचारियों के द्वारा खुले दिल से अपनाया गया । धीरे धीरे कोरोना की अवधि बढ़ती गई और इसके साथ ही बढ़ती गई ऑफिस और स्कूल  प्रबंधन के द्वारा अपने मातहतों से अधिक से अधिक काम लेने की प्रवृत्ति ।मैं अन्य शहरों के बारे में नहीं जानती लेकिन मेरे शहर में विगत एक साल से प्राइवेट स्कूल शिक्षकों के वेतन में मनमानी कटौती की जा रही है ।इसके अलावा तो कई स्कूलों ने 50+ के शिक्षकों को एकाध महीने के वेतन के साथ निकाल भी  दिया ।मजे की बात यह है इसमें राजधानी के प्रतिष्ठित कहे जाने वाले प्राय सभी स्कूल शामिल हैं । शिक्षकों के कार्य के घंटों में किसी संडे का प्रावधान नहीं है ।  गौरतलब है कि कोरोना के घटते मामले के बीच इन शिक्षकों ने एक ही दिन में ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों की जिम्मेदारी भी निभाई थी । अब जरा स्कूल प्रबंधन की ओर गौर किया जाए । किसी भी स्कूल  ने इस अवधि में फीस न लेने का कोई प्रावधान नहीं रखा है ।इसके साथ अव्वल  तो राजधानी के छोटे से छोटे स्कूल भी ठोस आर्थिक आधार पर टिके हुए हैं ।  कोरोना काल में बहुत से स्कूलों ने guard ,चपरासियों और सफ़ाई कर्मचारियों की संख्या में  बेहद जरूरी को ही  कायम रखा है ।इसके साथ ही बिजली,साफ सफ़ाई पर होने वाले खर्च वर्तमान में पहले के मुकाबले  नगण्य है ।  ऐसे में जहां सभी स्कूल दोनों ही तरफ से कमा रहे हैं वहीं शिक्षक बेरोजगारी के लंबी कतार के कारण लगी हुई नौकरी किसी भी हालत में छोड़ना नहीं चाहते हैं और किए जाने वाले किसी भी मनमानी को भुगत रहे हैं और नौकरी बचा पाने  के कारण किसी भी तरह से आवाज़ नहीं उठा पा रहे हैं । पिछले एक साल से इस महामारी ने वैसे ही पढ़ाई का खिलवाड़ बना दिया है जिसके साथ  विद्यालयों की इस गलत तरीके के कारण निश्चय ही शिक्षकों की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा।जिसका परिणाम बच्चों पर पड़ेगा। संभवत  इस संबंध में मेरी निर्भीकता का कारण मेरा किसी भी तरह से स्कूल से जुड़ाव न होना है । मैं जानती हूं मेरे इस प्रकार से लिखने का कोई लाभ नहीं ।लेकिन मैं फिर भी  लोगों से अनुरोध करती हूं कि आपदा में अवसर न ढूढ़ें । कोरोना काल में होने वाले मौत के बावजूद भी लोगों की गलत तरीके से धन संग्रह की प्रवृत्ति खत्म नहीं होती ।गीतकार शैलेंद्र के बोल"तुम्हारे महल चौबारे यहीं रह जाएंगे सारे ,अकड़ किस बात की है प्यारे "😢😢।

Monday, 10 May 2021

कोरोना की दूसरी लहर अपने प्रचंड रूप में आ चुकी है ।  आपदा के साथ साथ आए दिन ऑक्सीजन, दवाओं और इंजेक्शन की कालाबाजारी और जमाखोरी की बात सुनती देखती हूँ खैर इन्हें कौन से नेता का संरक्षण प्राप्त है या इनके पीछे कौन सी राजनीतिक पार्टी काम कर रही है ये जानने में मेरी न कोई  दिलचस्पी है और न मैं राजनीति को समझती हूं ।लेकिन इन बातों से परे मैं अपने आस पास बहुत से लोगों को परेशान देखती हूं जिसका जन्म मात्र लोगों के लालच और स्वार्थ के कारण  ही हुआ है। इस तरह की आपदा के कारण ऑफिसों से लेकर स्कूल कॉलेजों में ऑनलाइन वर्क और ऑनलाइन क्लासेज की परंपरा शुरू हुई । यहां मैं  प्राइवेट स्कूलों से जुड़ी बातों की ओर  सबका ध्यान दिलाना चाहती हूं।इस संबंध में अन्य शहरों या कस्बों के बारे में मैं नहीं कह सकती अलR

लेकिन पटना के तमाम प्राइवेट स्कूलों में विगत एक साल से शिक्षकों के सैलरी को कोविड के नाम  कटौती की जा रही है ।यहां हैरानी की बात यह है कि राजधानी के तमाम प्रतिष्ठित स्कूल भी इनसे अछूते नहीं है । अगर शिक्षकों की काम के घंटों की ओर एक नजर डाली जाए तो अन्य ऑफिसों के WFH की तरह इसकी कोई सीमा नहीं, ध्यान देने की बात यह है कि पिछले साल कुछ समय के लिए स्कूल खुलने पर ये शिक्षक ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों सेवा दे रहे थे । अब ध्यान दिया जाए स्कूल प्रशासन की ओर । अव्वल तो शायद ही कोई 

Friday, 7 May 2021

 कहते हैं मुसीबत आती है तो अपने साथ अपने रिश्तेदारों को लाती है ।कुछ समय पहले छोटी बेटी के कोरोना की तयशुदा अवधि को पार करने पर राहत की थोड़ी सांस ही ले पाई थी कि कल सवेरे सवेरे पतिदेव पैर की मोच के कारण सूजे हुए पैर के साथ बैठ गए ।कल का दिन घर के कामों के साथ साथ हल्दी चूना ,प्याज के सेक और क्रेप बैंडेज बांधते हुए बीता इसके अलावा जिस जिस ने फोन पर जैसी सलाह दी उसका अक्षरसः पालन किया ,लेकिन नतीजा जस का तस ।रात में माँ ने फोन कर बताया कि ठंडे और गर्म पानी से सेको वो भी किया लेकिन सासुमां के वॉकर पर लगड़ाते हुए पैर की स्थिति वैसी ही रही और इतनी तकलीफ के बाद भी कोविड के बढ़े हुए रूप के कारण दिनभर  हॉस्पिटल जाने की हिम्मत नहीं हुई  लेकिन आज सुबह हम दोनों ने करो या मरो के सिद्धांत पर LNJP हॉस्पिटल राजबंशी नगर जाने का फैसला किया जो कि बिहार सरकार के द्वारा हड्डी अस्पताल के रूप में विकसित किया गया है। वहां जाने से पहले हम काफी डरे हुए थे क्योंकि वहां कोविड की जांच और वैक्सीनेशन भी किया जा रहा है लेकिन वहां से आने के बाद वहां की व्यवस्था और बरते जाने वाले ऐतिहात को 10 में 10 नहीं तो 9 नम्बर जरूर दिया जाना चाहिए। जहां जांच वैक्सीनेशन को अस्पताल से बिल्कुल अलग रखा गया है वही डॉक्टर से लेकर गार्ड ,नर्स और हर एक स्टाफ मास्क और जरूरी social distancing का पालन करते हुए दिखे । कोरोना की इस विभीषिका को हॉस्पिटल जैसी जगह पर बरती जानी वाली ऐसी सावधानी के द्वारा  निश्चित रूप से मात देंगे ।तो हम सब को सोचना पॉजिटिव है और  रिपोर्ट नेगेटिव लाना है।
सबसे बड़ी बात कि पैर में जोर से मोच ही   आई है शुक्र है भगवान का पैर सलामत है ।

Thursday, 15 April 2021

याद आती है शादी के बाद की मिथिला के बसिया पाबनि की सुबह ।सुबह उठकर आँगन में निकली ही थी कि दादी माँ ने  मिट्टी के लोटे नुमा बर्तन से पानी अपने हाथ की अंजुलि में भरकर मेरे माथे पर डाला और दूसरे हाथ से पंखा झल दिया । अचानक तन और मन दोनों ही शीतल हो उठे। पल के लिए मैं समझ ही नहीं पाई कि ये क्या हो रहा है फिर बगल में खड़े पतिदेव की देखा देखी दादीमाँ को प्रणाम किया और उनसे "खूब जुरायल रहूँ "का  आशीर्वाद भी पाया ।उसके बाद मैंने जाना कि न सिर्फ हम मनुष्य  बल्कि आज के दिन चूल्हे से लेकर घर के कोने और पेड़ पौधों को भी जुराया जाता है ।शादी से पहले माँ को अपने से छोटों को जुरायल रहने का आशीर्वाद देते तो सुना था लेकिन उस दिन की सुबह  प्रत्यक्ष रूप से जुड़ाना देख लिया।परंपरा चलती रही और दादीमाँ के हाथों जुरायल रहूँ का आशीर्वाद पाती रही ।मैं अपने आप को गौरवान्वित महसूस करती हूं कि मैं अपनी दादीमाँ (ददिया सास) की लाड़ली बहू थी तो बाद के वर्षों में वो हमेशा मुझे कहती कि जैसे तुमने हमसब को जुराया है भगवान तुम्हें जुराए रखेगा । समय बीतता गया दादीमाँ स्वर्गवासी हुई और उनकी जगह माँ(सास) हर साल जुड़ाने का आशीर्वाद ठंडे पानी और पंखे के साथ करती रही । इस साल सासु माँ के बाद का पहला साल रहा जब किसी ने माथे पर ठंडे पानी के साथ आशीर्वाद नहीं दिया ।किसी को किसी भी तरह  जुड़ाना कितना भावनात्मक होता है वो बाद के वर्षों में समझ गई ।याद आता है "फ़िल्म तीसरी कसम" का वो डायलॉग मन समझती है न आप बस उसी तर्ज पर जुड़ाना समझते है न आप !

Saturday, 6 March 2021

पिछले दो ढाई साल हमारी जिंदगी के उथल पुथल वाले साल कहे जा सकते हैं ।कारण ढाई साल पहले पापा का देहांत और सात माह पहले सासु माँ का निधन ।जहां पापा के जाने से ऐसा लगा कि रांची नामक स्थान हमारे हाथों से धीरे धीरे फिसलती जा रही  है वही हर जाड़े गर्मी की छुट्टियों से पहले  सुबह आने वाली फोन की घंटी ने भी  बंद  कर दिया। वहीं सासु माँ के निधन  ने मुझे अचानक एक बड़ी जिम्मेदारी का अहसास करा दिया और मात्र चंद महीनों में काफी दुनियादारी सीखा दी। हालांकि माता पिता के जाने की कमी  से बेटे बेटी काफी व्यथित होते हैं लेकिन इस बारे में मेरी ये व्यक्तिगत  धारणा है कि पति या पत्नी के जाने से एक उम्र के बाद धीरे धीरे  बाल बच्चे अपनी दुनिया में मग्न हो जाते हैं और मात्र पति या पत्नी, जिसने अपने साथी को खोया है, ही प्रभावित होता है। संयुक्त परिवार के विघटित होने , शिक्षा के प्रसार और रोज़गार के कारण कमोबेश हर दूसरे परिवार में शुरू के बीस पचीस वर्ष के बाद घर में सिर्फ पति पत्नी ही बच जाते हैं जबकि पहले के समय में मात्र बेटी ही विवाह के बाद माता पिता से दूर होती थी और परिवार का आकार बड़ा होने के बेटों के नौकरी के कारण बाहर जाने के बाद भी एकाध भाई माता पिता के साथ बना ही। रहता था । ये तो सर्वविदित है कि संयुक्त परिवार के विघटित होने का खामियाजा बच्चों और बूढों को ही भुगतना पड़ता है । अब सवाल आता है वैसे बुजुर्गों का जो अपने उम्र के चौथेपन में अपने साथी को खो बैठते हैं और  अकेले नहीं रहने की हालत में अपने बच्चों के पास रहने जाते हैं । यहां मैं उन बुजुर्गों को सौभाग्यशाली कहूंगी जो अपने साथी का साथ छूटने के बावजूद  अपनी  ही  बिताई जगह में अपने बच्चों के साथ रहते हैं ।यहां बच्चों की ये लाचारी है कि वो अपनी नौकरी के कारण अपने माता पिता वाली जगह पर कुछ ही दिन रह सकते हैं । स्वास्थ्य, सुरक्षा आदि कारणों से माता या अकेले पिता को अकेला नहीं छोड़ सकते हैं ।यहां हम सभी इस बात पर ही एकमत हो जाते हैं कि किसी भी वरिष्ठ को अकेला नहीं रहना चाहिए लेकिन इस जगह पर उन बुजुर्गों की स्थिति अपने जड़ से अलग किए गए पेड़ के सामान हो जाती है जो इस उम्र में अपने साथी को खोने के बाद उस जगह की यादों   से भी दूर हो जाते हैं । अपने ही बच्चों के साथ रहने के बाद भी उन्हें लगातार अपने बिताए समय और समाज की कमी महसूस होती हैं । 
इस परिस्थिति की अगर समीक्षा की जाए तो हर परिवार में कोई न कोई ऐसा सदस्य जिसे उस बुजुर्ग के आर्थिक सहायता की जरूरत हो मेरी जानकारी में कुछ लोगों ने इस प्रकार से बीच के रास्ते को अपनाया है लेकिन इसमें  बहुधा आपसी सामंजस्य की कमी से समस्या होती है। दूसरी ओर अगर हम गाँव के विषय मे सोच सकते हैं अगर कोई भी गाँव स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं से सम्पन्न हो तो वहां घरेलू सहायकों के साथ कई बुजुर्ग अपने जैसे लोगों के साथ रह सकते हैं ।अंत में  एक ऐसी जगह के बारे में कहना चाहूंगी जिसके बारे में आज लोग जाना तो दूर  सुनना तक पसंद नहीं करते हैं ।वृद्धाश्रम ,आज भले ही हम इसके संबंध में मात्र गलत धारणा पाले हुए हैं लेकिन हमारी  पीढ़ी के लोगों को इस अनछुए विषय में सोचना होगा ।अगर हम अन्य बातों में पश्चिम देशों का अनुकरण करेंगे तो हम इन विषयों पर भी सोचना होगा क्योंकि ये आने वाले समय की मांग है ।हालांकि कुछेक फिल्मों और किताबों में इसके अच्छे स्वरूप को भी दिखाया गया है लेकिन अब भी इसके बारे में ऐसी धारणा है कि सिर्फ बच्चों के दुर्दशा के कारण लोग यहां जाते हैं।  मात्र फिल्मों और समाज में फैले  नकारात्मक विचारों के कारण हम इसे दरकिनार नहीं कर सकते हैं ऐसी संस्थाएं ,निःसंतान  दंपत्तियों के साथ साथ  आने पीढ़ी के वैसे बुजुर्ग जिनके बच्चे रोज़गार के कारण उनसे दूर हैं  उनके लिए एक वैकल्पिक व्यवस्था बन सकती है ।

Wednesday, 18 November 2020

 बात शुरू होती है आज से लगभग 28 साल पहले की ।जब मेरी शादी हुई थी । शादी के सिलसिले में हम रांची से पटना  छठ पूजा के खरना के दिन पहुंचे थे । उस दिन  पूरी पटना दुल्हन की तरह सजी थी ।  शादी के बाद  जाना कि दादीमाँ(ददिया सास)   छठ करती थी और उस छठ में  हमारा  पूरा परिवार इकट्ठा होता था ।साल भर में परिवार में कोई भी नया सदस्य आता था दादीमाँ उस सदस्य के लिए छठ का एक कोनिया कर देती थी ।फिर चाहे वो कोई नवजात शिशु हो या बहू इस तरह से बढ़ते बढ़ते कोनिया की संख्या 60 तक पहुंच गई थी चूंकि उस समय हम पापाजी (ससुर) को मिले R block के विस्तृत कंपाउंड वाले सरकारी क्वार्टर में रहते थे तो बाद के वर्षों में गंगा घाट के बजाय अपने कंपाउंड में ही पोखर बना कर छठ करने पर भी कोई दिक्कत  महसूस नहीं होती थी ।दादीमाँ के साथ साथ बाद में सासुमां  ने भी छठ शुरू कर दिया और बढ़ती उम्र के कारण दादीमाँ ने छठ का व्रत छोड़ दिया इस बीच एक उल्लेखनीय बात यह हुई  कि पापाजी के रिटायरमेंट के कारण सरकारी मकान खाली कर हम अपने अपार्टमेंट में आ गए । शुरुआती वर्षों में R Block के विशाल क्वार्टर के मुकाबले अपार्टमेंट की छोटी सी जगह में छठ जैसे पर्व का समावेश पवित्रता से होना हमें काफी मुश्किल लगता था लेकिन अपने स्वभाव के अनुसार जल्दी ही सासुमां ने छोटी जगह को अपने लायक बना लिया और पूरे उत्साह के साथ हर साल छठ होने लगा ।छठ हमारे लिए एक पर्व ही नहीं बल्कि सालाना होने वाला फैमिली फंक्शन था ।सच कहा जाए तो उन दिनों हमें न तो दशहरा खास उत्साहित करता था न ही दीवाली ।साल भर हम छठ की राह देखते और उन चार पाँच दिनों में बनाए जाने वाले बिना प्याज लहसुन के व्यजंनों की सूची बनाते ।यहां एक बात उल्लेखनीय है कि इस अवसर पर हर वर्ष सासुमां की ओर से मुझे और मेरी ननद को एक जैसी साड़ी मिलती ।याद आता है  सासुमां से  मिलने वाली साड़ी के कारण  किसी एक साल बच्चों ने मिलकर अपनी कपड़ों के लिए काफी हंगामा किया था ।  पहले अर्ग की रात परिवार के बच्चे  बड़ो के द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम होता था जिस तरह हम छठ में पहनने वाली साड़ियों की तैयारी करते ठीक उसी तरह  बच्चों के द्वारा गीत और नाच की तैयारी होती वैसे इसे बच्चों तक सीमित करना गलत होगा क्योंकि इस शाम के कार्यक्रम में कई बार हमारे दादाजी से लेकर बुआजी तक  भी शामिल होती थी मिला जुला  कर वो पूरी रात जागते हुए ही  बीतती थी ।बाद में धीरे धीरे बच्चे पढ़ाई के क्रम में बाहर  गए  और पीढ़ियों के हस्तांतरण के साथ हम अपार्टमेंट में आ गए ।बचपन से छठ के व्रत के प्रति एक भय था कि इस व्रत में कोई गलती नहीं होनी चाहिए लेकिन सासुमां के छठ के साथ हम इस पर्व की वर्जनाओं के इतने आदी हो गए कि मेरी छोटी बेटी जो घर की सबसे छोटी सदस्या है वो भी इसके एक एक नियमों को जानने लगी । इस व्रत के बारे में सासुमाँ का ये कहना बिल्कुल सही था कि इस  व्रत करना किसी अकेले के वश की बात नहीं इसमें पूरे परिवार का सहयोग होता है चूंकि ये व्रत पटना के प्राय हर घर में होता है तो आप इस बात को मान कर चले कि इस चार दिन आपकी सहायता के लिए  बाई से लेकर स्वीपर ,दूधवाला ,धोबी कोई भी   मौजूद नहीं होगा ।पूजा के बहुत से कामों के साथ उन सहायकों के हिस्से का काम भी खुद आप को ही करना होगा। पर लोगों का व्रत के प्रति श्रद्धा कहें कि हर एक  सदस्य अपने काम को पूरी खुशी और श्रद्धा के साथ करता है । धीरे धीरे बच्चों के बाहर जाने के साथ साथ सासुमां का स्वास्थ्य ने  उन्हें व्रत छोड़ने के लिए लाचार कर दिया और तीन साल पहले उन्होंने छठ परमेश्वरी को प्रणाम कर लिया ।आज खरना है अगल बगल के घरों से छठ के गानों की आवाज आ रही है अचानक ऐसा लगता है कि अरे 1बज गए अभी तक अमुक काम बाकी है ,शाम की पूजा के लिए देर हो रही  है....