घटना लगभग पाँच छह साल पुरानी है ।एक वयोवृद्ध सज्जन (दुर्भाग्य वश अब वो हमारे बीच नहीं है) हमारे निवास स्थान पर आए ।महानगरों की तर्ज पर हमारे शहर में कुकुरमुत्ते की तरह अपार्टमेंट्स जरूर बन गए हैं लेकिन उसमें रहने के नियम क़ायदों को शायद ही कहीं अपनाया गया है ।खैर मुद्दे की बात, हमारे अपार्टमेंट में मेरे फ्लैट की स्थिति इस तरह की है जिससे बालकनी से हम नीचे गेट और वहाँ मौजूद गार्ड को बखूबी देख सकते हैं । उस दिन जब मैं शाम के समय अपनी बालकनी में खड़ी थी तो मैंने नीचे गेट पर उन वयोवृद्ध सज्जन को खड़ा पाया ।उन्होंने आते ही गार्ड से रजिस्टर्ड माँगा ।गार्ड ने रजिस्टर उन्हें दिया जिसमें उन्होंने पूरा ब्योरा दर्ज किया उसके बाद उन्होंने इंटरकॉम से अपने आने की सूचना हम तक पहुँचाने का आग्रह किया ।ये बात बहुत छोटी सी है लेकिन इसने मेरे मन में एक सवाल खड़ा किया कि किसी भी नियम को मनाना कितना जरूरी है ! मैंने आए दिन लोगों को इसी एंट्री करने को ले कर बक झक करते देखा है फलस्वरूप गार्ड ने भी रजिस्टर को किसी कोने में डाल दिया ।हम सब एक सामाजिक जीवन जीते हैं और समाज के बहुत से कहे और अनकहे बहुत से नियम होते हैं जिसे पूरा करने की समाज हमसे उम्मीद करता है ।हम अक्सर शादी विवाह या अन्य किसी पार्टी में दिए गए समय से घंटे दो घंटे देर से पहुंचते हैं क्योंकि अगर आप होस्ट के दिए गए समय से पहुंच जाए तो आपको बुलाने वाले खुद भी शायद मौजूद नहीं होंगे ।मेरी एक सखी जिन्हें कहीं भी पार्टी में समय पर पहुंचने की बुरी आदत है उन्हें जल्द ही ऐसी भनक लग गई कि किसी भी फंक्शन में उन्हें दूसरे लोगों के एक घंटे बाद का समय दिया जाता है । पिछले साल दिसंबर में किसी दैनिक अखबार ने गुलज़ार साहब को पटना बुलवाया था ।सौभाग्य से मुझे भी उन्हें सुनने का मौका मिला ।गुलज़ार साहब ने कार्यक्रम के शुरू में ही इस बात का ज़िक्र किया कि पटना मैं पहले भी आ चुका हूं और यहां की जनता को कलाकारों की काफी कद्र है लेकिन उस दिन वहां कार्यक्रम शुरू होने से लेकर खत्म होने तक लोगों का आना जाना और लगातार मना करने के बाद भी लोगों का मोबाइल के द्वारा फ़ोटो लेना बदस्तूर जारी रहा ।क़ाबिलेतारीफ ये कि गुलज़ार साहब दोनों ही बातों के लिए लोगों से ऐसा न करने की गुजारिश करते रहे ।मैं ऐसा बिल्कुल नहीं कहती कि मैं कलामर्मज्ञ हूँ पर उस प्रोग्राम में कई लोग ऐसे भी थे जो परिवार के साथ चिप्स बिस्किट आदि खाते हुए लगातार बस अपनी बात चीत कर अनायास ही वातावरण में बोझिलता
उत्पन्न कर रहे थे । यहां फिर मैं नियम मनाने की बात पर लोगों से ऐसा आग्रह करती हूं किसी भी ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम को देखने न जाए जिसमें आपकी रुचि न हो और कम से कम उन जगहों पर समय पर पहुंचने की कोशिश करें । इन दिनों हमारी सरकार ने पॉलीथीन पर बैन लगाया है लेकिन मैंने लोगों को पॉलीथीन के लिए दुकानदारों को विवश करते हुए देखा है ।लोग डोर टू डोर कूड़ा गाड़ी आने के बाद भी यत्र कुत्र कूड़ा फेंकते हैं ।लगातार पानी की कमी के बाद भी मोटे पाइपों के द्वारा गाड़ी धोना जारी है ।इन सभी बातों के लिए कोई हमें दण्डित नहीं करता लेकिन इन्हें मानना हमारी सामाजिक जिम्मेदारी है ।कोई भी नियम तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक वहां के लोग उसे मानना न चाहे ।आज कश्मीर की हालत गंभीर है पर कभी पंजाब इससे कम नहीं था । मेरे हिसाब से वहां के निवासियों का सतत प्रयास ने ही उसे आतंकवाद मुक्त किया । हम सभी अगर अपनी ओर से थोड़ा थोड़ा प्रयास करें तो कोई भी छोटी बड़ी समस्या निश्चय ही कम हो सकती है ।
Wednesday, 20 March 2019
Thursday, 7 March 2019
लगभग दस साल पहले टीवी के किसी चैनल पर एक सीरियल आता था"न आना इस देश लाडो" ।एक अजीब खूंखार सी औरत के चेहरे के साथ इस सीरियल की याद अब तक मेरे जेहन में है ।ये कहानी एक ऐसे गांव की थी जहां बेटी का जन्म लेना ही गुनाह था औऱ अगर गलती से अगर बेटी ने जन्म ले लिया तो उसे जन्म के साथ ही मार दिया जाता था एक ऐसा गाँव जहां से सिर्फ बारात निकलती थी उस गाँव में बारात जाती नहीं थी । इन सारी बातों से मिलती जुलती कई कहानियां हमने पढ़ी है जहां बेटा न होने की स्थिति में बहुविवाह आदि बुराइयां भी प्रचलित थे । मुख्य तौर पर इसके पीछे संभवत दहेज था ।इन सबके उलट सौभाग्य से मैं एक ऐसे समुदाय से सबंधित हूँ जहां अब भी विवाह में दहेज नाम के दानव ने कदम नहीं रखा है जहां किसी भी युग में बेटियों के जन्म को शाप नहीं माना जाता था ।सिर्फ अच्छे कुल शील को देख कर ही यहाँ शादियां होती रही हैं ।इन सबके बावजूद आज हमारे यहां एक बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई है वो है लड़कों के लिए कन्या के प्रस्ताव की कमी । पहले जहां दहेज नहीं होने पर भी लड़को के लिए लड़कियों की लंबी लिस्ट होती थी और बहुधा वर को विवाह के लिए हामी भरने के लिए उनके मामा, चाचा,बहिनोई आदि संबंधियों से जोर दिलाया जाता था ।अब इसके विपरीत लड़कों के लिए विवाह प्रस्ताव आना ही मुश्किल हो गया है ।जब हमारे समाज ने लड़कियों की जन्म को बुरा नहीं माना तो निश्चय ही लिंग अनुपात बिगड़ने जैसी समस्या से हम प्रभावित नहीं हुए होंगे ।ऐसा नहीं है कि विवाह प्रस्ताव की कमी जैसी समस्या से औसत वर ही ग्रसित हैं इनमें पाँच छह अंकों में कमाने वाले लड़के भी शामिल हैं । हो सकता है कि लड़कियों के द्वारा की जाने वाली अंतरजातीय विवाह और स्री शिक्षा इसका एक कारण बना है ।लेकिन हमारे यहां अंतरजातीय विवाह तो शायद लड़कियों से अधिक लड़कों ने किया है तो विवाह प्रस्ताव के लिए वधू की संख्या अधिक होनी चाहिए ? कुछ लोग ऐसी स्थिति से बचने के लिए बच्चों को खुद अपना जीवनसाथी चुनने की हिमायत करते हैं लेकिन ये तो समाधान नहीं है क्योंकि आज भी आधुनिकता के बावजूद कई लड़के लड़कियां विवाह अपने अभिवावक के द्वारा कराए जाने को उचित समझते हैं ।आज महिला दिवस के नाम पर अगर इसे समाज में महिलाओं का बढ़ता हुआ वर्चस्व मान ले तो क्या ये सही होगा ?क्या इसे हम वर पक्ष की हेकड़ी खत्म होने का लक्षण मान कर प्रसन्नता का अनुभव करें ! ऐसे तो समाज में असंतुलन की स्थिति आ जाएगी और किसी भी स्वस्थ समाज के लिए विवाह की अनिवार्यता से हम इन्कार नहीं कर सकते हैं !
Saturday, 23 February 2019
मेरे घर से कुछ दूर पर एक पार्क है जहां अकसर हमारा आना जाना रहता है फिर कारण कुछ भी हो। चाहे आलस के कारण सिर्फ कभी कभार की जाने वाली मोर्निंग वॉक हो या बेटी के कारण खरीदने जाने वाले पार्क के बाहर बिकने वाले वे गोलगप्पे हो ।वहां हमें बहुतायत से स्वास्थ्य के प्रति सजग लोगों की भीड़ दिख जाती हैं ।इन्हीं लोगों के साथ कई ऐसे लोग भी दिखाई देते हैं जो अपने साथ छोटे छोटे बच्चों को घूमाते भी रहते हैं उन लोगों की उम्र देखकर सहज ही ये अंदाज हो जाता है कि ये बच्चे उनके नाती नतनी या पोते पोती हैं ।कई बार उन्हें बच्चों की मम्मी मम्मी की लगातार रट के सामने बेबस भी देखा है । लेकिन इसके साथ ही लोगों की फब्तियां भी गाहे बिगाहे सुनाई दे देती है कि इस उम्र में बच्चों की चरवाही करना क्या जरूरी है ? लेकिन जहां तक मैं इस बात की ओर ध्यान देती हूं तो लगता है कि आज इस तरह की परिस्थिति हर उस परिवार की है या भविष्य में होने वाली है जो बेटियों को अपने कैरियर बनाने की ओर प्रेरित कर रहे हैं । अगर हम अपने और अपने आस पास के परिवार की ओर ध्यान दें कमोबेश हमारे बाद की पीढ़ी में शायद ही कोई ऐसी लड़की है जो मात्र शादी करके घर और बच्चों की देखभाल करने को मानसिक रूप से तैयार हो ।बचपन से ही उन सबने अपने कैरियर को गंभीरता से लिया है और उसके लिए कड़ी मेहनत भी की है ।आज के दौर में लड़कियों की शादी अमूमन उनके पैर पर खड़े होने के बाद ही की जाती है ।शादी के बाद जब बच्चे की बात आती है तो हर नौकरीपेशा माँ परेशान हो जाती है क्योंकि अब संयुक्त परिवार की संख्या न के बराबर रह गई है और अकसर उन जोड़ों के माता पिता भी अपनी नौकरी या अन्य किसी लाचारी के कारण अपने शहर को छोड़ना नहीं चाहते हैं ।ऐसे में बच्चों की परवरिश सही ढंग से करना एक अहम सवाल हो जाता है ।जहां तक मेरी जानकारी है मातृत्व अवकाश की अवधि किसी शिशु के पालन पोषण के लिए काफ़ी नहीं होती है ।महानगरों के विषय में मैं नहीं जानती लेकिन छोटे शहरों में अच्छे crèche की संख्या नगण्य होती है और नौकरों के भरोसे बच्चों को छोड़ना आज के दौर में बिल्कुल भी ,सुरक्षित नहीं है ।कुछ लोग बच्चों के स्कूल जाने की उम्र तक माँ के नौकरी छोड़ने की सिफारिश करते हैं लेकिन हर माँ के लिए ऐसा करना संभव नहीं क्योंकि हर नौकरी तो ऐसी नहीं होती जिसे दो तीन साल के लिए छोड़ दिया जाए, तो क्या किया जाए ?चाहे कुछ नहीं हो हम अपनी भावी पीढ़ी को इस तरह मझदार में नहीं छोड़ सकते क्योंकि हम अपने सपने को उनकी आँखों से ही देखते हैं या यूँ कहे किअपने बच्चों की आंखों में जिन सपनों को हमने दिखाया है उन्हें साकार करने में हमें उनकी मदद करनी होगी ।कई बार बेटी या बहू के सहयोग के रूप में मैंने दादी और नानी को बारी बारी से शिशु की देख रेख करते हुए भी देखा है ।तो किसी की ओर व्यंग्यात्मक लहजे से देखने के बजाय हम उस नानी या दादी की प्रशंसा करें गोकि उसने अपने बच्चों की मदद करने की कोशिश की है और शायद कल यहीं कोशिश हम भी करें ।
Friday, 25 January 2019
26/1/19
एक जमाना था जब ऐतिहासिक फिल्मों ने बॉलीवुड के परदों पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया था इनमें से कई सफल हुई और कई असफल। मेरे हिसाब से इन फिल्मों को बनाना फिल्मकारों के लिए काफी जोखिम भरा होता है गोकि न इनमें दिखाए गए किरदारों को किसी ने देखा है और न ही इनके बारे में बहुत ज्यादा मालूम होता है ।खास बात है कि इनका खर्च आम फिल्मों के मुकाबले काफी अधिक होता है और कई बार ये बनने के साथ ही विवादों में घिर जाती है ।पिछले कुछ दिनों से अखबार और सोशल मीडिया पर मणिकर्णिका नामक फ़िल्म की खूब चर्चा सुन रही हूं जो शायद रानी लक्ष्मीबाई के ऊपर बनाया गया है । हमारे स्कूली शिक्षा के समय कई ऐसी कविताएं थी जो हमें कंठस्थ थी ।अब या तो सिलेबस के उलट फेर के कारण या किसी अन्य वजहों से आज के बच्चों में ये बात नहीं देखती ।स्वर्गीय सुभद्रा कुमारी चौहान की लिखी ये लंबी कविता मेरी प्रिय कविताओं की लिस्ट में शीर्ष स्थानों में है । कई बार मैं अपनी भावी पीढ़ियों को अपने देश की वीरांगनाओं के विषय में अनभिज्ञ देखकर काफी दुखी हो जाती हूँ और यथासंभव अपनी बेटियों को ऐसी कविताओं के विषय में ऐसे में बताने का प्रयास करती हूं। कल मेरी प्रिय चाची ने मुझसे एक अनुकरणीय घटना का ज़िक्र किया ।उन्होंने बताया कि कुछ दिनों पहले एक छोटी सी बच्ची को स्कूल के लिए जाते समय अपनी माँ के साथ इसी कविता का समवेत पाठ करते हुए सुना ।इस घटना को सुनकर मुझे संतोष हुआ कि मेरे जैसी और भी सिरफिरी माताएँ हैं जो बच्चों को आज भी इस तरह की काव्य पाठ करने की ओर प्रेरित करती है ।इस घटना से मैं पुनः अपने बचपन में लौट जाती हूँ जब शायद 1981-82 का समय होगा मैं नन्ही सी लड़की अपने पूरे चचेरे फुफरे भाई बहनों के साथ दादाजी के राज दरभंगा के घर के विशाल बरांडे पर दादाजी के साथ हर शाम गर्मी या जाड़ों की हर छुट्टियों में इस तरह कविताओं को चिल्ला चिल्ला कर पढ़ा करती थी ।चूँकि बचपन की याद पूरी जिंदगी हमारे साथ चलती है तो दावे के साथ कह सकती हूं कि आज मेरे साथ निश्चय ही जवान हुए बच्चों के माता पिता वाले मेरे भाई बहन भी इस घटना को जरूर याद करेंगे । । नहीं जानती आने वाली फिल्म मणिकर्णिका कैसी है या व्यवसायिक दृष्टिकोण से ये कैसा बिज़नेस करेंगी लेकिन अगर इस पिक्चर से हमारी भावी पीढ़ी के कुछ बच्चे भी अपने देश के स्वर्णिम अतीत को जान सकें तो मेरी नज़र में इस निर्माता निर्देशक ने एक सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वाह किया और गणतंत्र दिवस के सत्तरवे साल होने पर उससे भी बहुत पहले की वीरांगना को लोगों के समक्ष लाने की कोशिश की ।
Monday, 24 September 2018
जहिया हम अपन छोट बेटी मीठी(विधि नित्या) क रांची कSt.mary's nursery school म एडमिशन लेल ला गेलियन त ओतुका प्रिंसिपल हमरा स इ आग्रह केलैंन जे सेलेक्शन भेला क बाद हम अपन बच्चा स घर म सेहो इंग्लिश करि ।हम तत्काल हुनकर गप काटि क कहलियेन जे हमरा स इ बात सम्भव नहि अछि किया त हमर घर क बातचीत क माध्यम मैथिली अछि आ अखन त हमर बेटी क त हिंदी सेहो ठीक स नै अबैत छै ।हम हुनका कहलियन्हि जे अपन मातृभाषा क ज्ञान कोनो बच्चा क मायेटा दअ सकैए छै ।घर जा क हम दुनु प्राणी एक बेर फेर स बिचार केलौ जे कि नीक स्कूल म प्रवेश क नज़रिये स घर पर बच्चा स हिंदी बा अंग्रेजी म गप करि या अपन सैकड़ों बरख पुरान मैथिली सिखाबि ।अंत म कोनो भाषा क अतिरिक्त ज्ञान बेटी क हित म हेतइ से सोचि क अपन पुरान ढर्रा चालू रखलौ ।हमर स्पष्टवादिता कहि हमर बेटी क addimission म बाधक नै भअ जै अई बात स हम दुनु गोटा सशंकित छेलौ परंच हमर गप बुझ्याए ओइ प्रिंसिपल क नीक लगलैन आ बेटी क एडमिशन भेट गेलै ।आइ हमर दुनु बेटी हिंदी आ अंग्रेजी क संगे संगे मैथिली सेहो खूब नीक स बजेए आ कएक बेर ओहेन धिया पूता क देख क आनंदित होइत रहिये जे मात्र अपन माय क गलती स एकटा भाषा क ज्ञान स वंचित रहि गेल ।सब बेर जेका हमरा लिखैत काल म अपन बचपन याद आबि जाइये जखन हम तीनू भाइ बहीन लंबा छुट्टी क बाद गाम स रांची जाइ आ हिंदी बिसरि क कोनो हिंदीभाषी क देख क लजा जाए ।एहेन नै छै जे मैथिली हमर सब क बपौती अछि हमर सासुर आ नैहर क परिवार म अनेकों आन जाति क कनिया सब एली आ कोशिश कअ क मैथिली सीख लेलैथ आ हम सब शहरीकरण क चपेट म आबि क बच्चा क एकटा भाषा क ज्ञान स वंचित करै छियै ।कोनो अन्जान जगह पर अंचिह्हार लोक क भाषा केना एक सूत्र म बान्हि लई छै एकर उदाहरण विदेशों म कएक बेर भेट जाइ छै आ ओतय अनजान लोक मात्र भाषा दुआरे सहायता सेहो करै छै ।आइ हम सब दशमी छोरि क नवरात्र मनबई छी बच्चा सब माछ नै खाय चाहेये जखन कि दरभंगा महाराज अपन लोगो माछ क बनेने रहैत ।कएटा एहेन पाबइन आ विध अपना सब छोरने जाए छी लेकिन कहियो अहि विध क बारे म बरियाती म बिना नोन क तरकारी क चर्चा स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन अपन आत्मकथा म सेहो केने रहैथ ।
हमर पूरा लेख क नकारात्मक विचार क बाद हम चर्चा करअ चाहब अपन सासुर दुर्गागंज क जतय मैथिली क आइयो एकटा सम्मानित स्थान छै एतुका लेखिका क साहित्य अकादमी क सर्वोच्च पुरस्कार स पुरस्कृत कएल गेल छैन ।इ एहेन गामछी जतय मैथिल क संगे बंगाली , मुस्लिम आ आन जाति क लोक मैथिली बजेए ।
Monday, 17 September 2018
कभी किसी के मुंह से सुना था जिंदगी में माँ बाप के अलावा हर एक चीज़ दुबारा हासिल की जा सकती है इस बात को पापा के जाने के बाद ही महसूस किया । लगभग एक महीने से अधिक समय बीतने के बाद भी पता नहीं हर वक़्त एक ख़ालीपन ।पता नहीं क्यूँ अपने हर रिश्तेदार,दोस्त और मिलने वालों से नज़र मिलते ही एक उम्मीद ,शायद पापा के बारे में जानना चाहे और अगर उसने उस बारे कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई तो एक निराशा । तभी याद आती है एक कहानी जिसमें एक महात्मा ने एक माँ जो जवान बेटे के चल बसने पर दुःख से पागल हो रही थी उसे अपनी शक्ति से बेटे के दुबारा जीवित करने का विश्वास दिलाया लेकिन शर्त यह थी कि वो उन पाँच घरों से एक मुट्ठी चावल ले आए जिस घर में कोई मौत नहीं हुई हो ।नतीजा निशब्द । ऐसे में अपने आप से किया गया एक वादा कि यथा संभव हर एक के दुःख को बांटने की कोशिश करूँ क्योंकि तकलीफ तो तब समझ में आती है जब खुद पर बीतती है।
Sunday, 26 August 2018
जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं ।इसी फलसफे पर थी मेरे पापा की जिंदगी ।बिल्कुल अपने स्वभाव के अनुसार बिना किसी को कोई तकलीफ दिए 10 अगस्त को उनका निधन हो गया औऱ इसी के साथ अंत हो गया एक ऐसे कर्मठ व्यक्ति का जिसने जिंदगी की हर चुनौती को हंसते हंसते स्वीकार किया फिर चाहे वो पारिवारिक परेशानी हो,आर्थिक समस्या हो या शारीरिक तकलीफ हो । वैसे तो रोग की तकलीफ 22 सालों से उनके साथ था लेकिन उनकी जिंदगी की उल्टी गिनती अर्थात काउंट डाउन पिछले अगस्त से शुरू हो गई थी जब पटना में हृदय रोग विशेषज्ञ ने उनकी हृदय की स्थिति देख कर उनके इतने सालों के जीवन पर आश्चर्य किया । औऱ किसी भी क्षण उनके प्राणान्त होने की भविष्यवाणी कर दी ।उस डॉक्टर के दिए गए परहेजों के साथ पापा अपनी दिनचर्या में खुश थे ।पापा के उसूल अंत तक उनके साथ बने रहे छात्र जीवन से ही वो RSS के विचारों से प्रभावित थे तो जब उनकी मौत के चंद दिनों बाद बाजपेयी जी का निधन हुआ तो वहाँ मौजूद लोगों के लिए यह एक चर्चा का विषय था ।मेरे पास जितना ही है मैं इसी में निर्वाह करूंगा औऱ इसके लिए न कभी उन्होंने अपने अतिसमृद्ध ससुराल से कुछ लेना चाहा औऱ न ही अपने संतानों से । पेंशन नहीं होने की स्थिति में अपनी जरूरतों को उन्होंने मितव्ययता के चाबुक से साधा था ।दो भाइयों और एक छोटी बहन के असमय निधन से वो विचलित तो हुए पर कर्तव्यच्युत नहीं ।भाइयों की विधवाओं को पुत्रीवत मानकर समाज की वर्जनाओं की अवहेलना की । आज जब पापा के निधन के बाद पापा के बारे में कुछ लिखना चाहती हूं मेरे सामने एक ऐसी छवि आ जाती है जिसके आंखों में बेहद कम रोशनी थी जो शारीरिक रूप से दुर्बल होते हुए भी सिध्दान्त का बिल्कुल पक्का था ।कभी किसी को मैंने श्मशान को बारात कहते हुए सुना था तो हमने एक ऐसे बारात को देखा जिसमें उनके शुरुवाती मित्र से लेकर वार्धक्य के परिचित शामिल थे ।जिस रांची के कारण वो कहीं रहना नहीं चाहते थे उसी रांची के लोगों नेअंतिम विदाई की घड़ी में हाथोंहाथ लिया ।ये उन्हीं के बनाए मानवीय रिश्ते थे कि हमारे शोकसंतप्त परिवार को लोग हर प्रकार की सहायता देने को तैयार थे ।ये कैसी आश्चर्य की बात है लोग उस व्यक्ति के लिए अपना बहुमूल्य वक़्त दे रहे थे उनसे संबंध नहीं अनुबंध से बंधा था ।अब भी जब बिल्कुल सुबह मोबाइल की घंटी बजती है तो अनायास ही लगता है , पापा का फोन होगा 😢😢