कुल दो दिन बचे हैं होली के ।लेकिन बीते चार दिनों से अखबार और सभी प्राइम चैनल के साथ साथ सोशल मीडिया की कवरेज श्रीदेवी ने ले ली ।पहली खबर जब हृदयाघात से मरने की मिली तो मन द्रवित हो उठा बाद में नशे की हालत में बाथटब में गिरने की वजह ने दया की जगह विरक्ति ने ले ली ।कल से आज तक टीवी के सभी न्यूजों पर श्रीदेवी की चर्चा और अब अंतिम यात्रा का सीधा प्रसारण ।उस पर हद तो तब हो गई जब उन्हें पूरे राजकीय सम्मान दिया गया और त्रिरंगे में लपेटा गया ! मेरा यह प्रश्न है कि किसी को मरणोपरांत त्रिरंगे में लपेटने का मापदंड क्या है ? ऐसा करने से श्रीदेवी किसी शहीद की समकक्ष नहीं हो गई ?एक अभिनेत्री के अलावा भारत की तरक्की में उनका कौन सा राजनीतिक या सामाजिक योगदान रहा है जो उनकी तुलना किसी शहीद से हो ।जहां तक मेरी जानकारी है भारतीय संस्कार को लात मारकर उन्होंने अपनी गर्भावस्था के सातवें महीने में पहले से विवाहित और दो बच्चों के बाप से शादी रचाई ।करोड़ों की फीस वसूल कर फिल्मों की सुपरस्टार बनकर अकूत संपत्ति बनाई ।फिर भी ,हे भारतीय जनता और मीडिया आप धन्य हो । ठीक ही कहा गया है "हर मरने वाला स्वर्गवासी ही होता है 😢😢"
Wednesday, 28 February 2018
Saturday, 24 February 2018
दुनिया में सबसे आसान है दूसरों की गलतियों पर हँसना या उसकी आलोचना करना और उन्हें भाषण (उपदेश) देना और सबसे कठिन कार्य है स्वयं को साबित करना ।अच्छी जीवन शैलीे की बहुत सी बातें शास्त्रों में लिखी गई है ,बहुत सी बातें हमारे श्रेष्ठ महात्मा कह गए हैं जो जन साधारण को सहज रूप से मालूम है ।यथासंभव सभी उनका पालन करना चाहते हैं लेकिन कई बार हम कई प्रयासों के बाद भी अनेक गलती कर बैठते हैं औऱ लोगों की आलोचना का हिस्सा बन जाते हैं पता नहीं इस बात को कितने लोगों ने महसूस किया है हमारी इन गलतियों पर हमारे सबसे बड़े निंदक वे लोग ही होते हैं जिन्होंने खुद ऐसी ही गलतियों को कई बार किया है वैसे भी ये बात तो सर्वथा सच है कि अगर हमारी पूरे हाथ की एक तर्जनी दूसरों की ओर उठती है तो शेष चार उंगली का रूख हमारी ओर ही होती है लेकिन अब संत कबीर तो हमें " निन्दक नियारे राखिये" जैसी सलाह देते हैं चलो ठीक है positive thinking , उपाय भी क्या है 😢😢
Tuesday, 20 February 2018
आत्मा में ही परमात्मा का निवास है ।ये बात तो हम बचपन से ही सुनते आए हैं लेकिन बात की गूढ़ता तो बहुत बाद में समझ मे आई । फिर चाहे वो किसी को बातों की चोट पहुँचाने की हो या कोई दूसरा मसला ।कई बार आवेश में आकर हम किसी को हज़ार बातें सुना देते हैं और बाद में घंटो तक पछताते रह जाते हैं ।लेकिन जब ऐसी भावना खत्म हो जाती है तो सामान्यतया ऐसा कहा जाता है कि उसकी आत्मा मर गई है कोई भी व्यक्ति तब तक गलत काम नहीं करता है जब तक उसकी आत्मा जिंदा हो ।उसी प्रकार जब हम किसी की मन की बात को पूरा करते हैं तो एक अलग प्रकार की तृप्ति उसके चेहरे पर आ जाती है फिर चाहे वो किसी बच्चे को मनचाही खिलौने या चॉकलेट दिलाने की बात हो ,किसी गरीब को की गई मदद से हो या किसी बुजुर्ग के अकेलेपन के बाँटने की हो और इसी मन तृप्त करने के नाम पर हमारे यहाँ सत्तुवाइन के दिन चूल्हे को बड़ी पूरी से लेकर पेड़ पौधे तक को पानी की नर्म फुहार के द्वारा तृप्ति काअहसास दिया जाता है ।तो क्या कहा जाए यहां तो हर कदम और हर पर्व भी इसी भावना से जुड़े हैं !
Monday, 19 February 2018
पिछले सफ्ताह एक शादी की रिसेप्शन में गई थी।आधुनिक विवाह चमक धमक से भरपूर । दुल्हन बहुत खूबसूरत ,लड़के लड़की की जोड़ी बहुत अच्छी।सभी उस पार्टी का मज़ा ले रहे थे ।उस पार्टी में मुझे एक लड़की बहुत पसंद आई वो है लड़के की बहन ।लड़के की बहन को भारतीय मानक के हिसाब से बहुत सुंदर नहीं कह सकते हैं उसने अपनी पसंद का बहुत ही लंबा फ्रॉक या आज कल की भाषा में कहे तो लहराता हुआ ड्रेस पहना हुआ था उस बच्ची की रंग की बात करें तो साँवला बल्कि काला ही कहेंगे लेकिन उसकी सबसे खास बात यह थी कि उसके चेहरे पर सदाबहार हँसी और आत्मविश्वास से लबरेज वो चेहरा आसानी से कई सुंदरियों को मात दे रहा था ।वो लड़की मेरी बेटी की घनिष्ठ सहेलियों में एक है इस लिए अकसर मेरे घर आती है और हर बार उसकी आत्मविश्वास से भरी बातें मुझे लुभा देती है ।एक तरफ वो प्यारी सी बच्ची अपनी रंग रूप की कमी को अपने आत्मविश्वास से झुठला रही थी और दूसरी ओर हमारे बीच के कई लोग अपनी एक छोटी सी कमी के कारण अपने तमाम गुणों को खो कर हीन भावना से ग्रसित हो जातेे हैं।इस बात से मेरा ध्यान अपने समाज के अधिकांश लोगों पर गया जो हर जगह सीरत से अधिक सूरत को महत्व देते हैं । आज भी क्यूँ गोरा रंग देखते ही हम मंत्र मुग्ध हो जाते हैं और विवाह के प्रस्ताव में सुंदरता को प्राथमिकता दी जाती है । अब सवाल है सुंदर किसे कहते हैं और उसका पैमाना क्या है ? कहने को तो ये बात कही जाती है कि भगवान की बनाई हर रचना अनुपम
लेकिन क्या सचमुच ऐसा होता है ? हम ये समझते हैं कि आदमी के गुण ही सर्वोपरि है और समय आने पर सुंदरता की ओर झुक जाते हैं ।इस बारे में मेरी एक परिचिता जो अपनी निजी जिंदगी में बहुत से सुंदर लोगों के दुर्व्यवहार को झेल चुकी है ,का कहना है कि मुझे सुंदर लोगों से नफरत है और जब अपने व्यवहार से कोई भी व्यक्ति किसी को दुखी कर दे तो उसका सुंदर रूप भी उस व्यक्ति विशेष के लिए कुरूप ही तो बन जाता है ।
Tuesday, 30 January 2018
आधुनिकता और पाश्चात्य संस्कृति के प्रसार के कारण हमने बहुत सी चीज़ों को पाया है शिक्षा और प्रगति ने अपने साथ पारिवारिक जीवन में बदलाव को जन्म दिया है । पहले बल्कि बहुत पहले सभी बच्चे बूढ़े साथ में रहते थे उस समय सभी लोगों का जीवन गाँव के इर्दगिर्द घूमता था ।उनमें से जो भी नौकरी के कारण शहर में रहता उनका परिवार गाँव में बाकी के परिवारवालों के साथ रहता था और नौकरी करने वाला छुट्टियों में घर आता और बाकी के दिन किसी तरह गुजारता । धीरे धीरे छुट्टियों की कमी या बच्चों की पढ़ाई के कारण उस नौकरी करने वाले के साथ उसका परिवार भी रहने लगा और इस प्रकार अगर किसी दंपति में चार या पाँच बच्चे भी थे तो कोई न कोई माँ बाप के साथ जरूर ही रहते थे ।समय ने फिर करवट ली परिवार का आकार घटकर एक या दो बच्चों तक ही सिमट गया और इस बार वो लोग बूढ़े में गिने जाने लगे जो कभी गाँव को छोड़ कर छोटे बड़े शहर में आ बसे थे और अपना लंबा जीवन उन्हीं शहरों में काटा था अमूमन इस दौरान उन्होंने उन शहरों में अपनी औकात के अनुसार घर भी बना लिया था ।प्रायः इस प्रकार के लोगों के बच्चे पढ़ाई लिखाई कर महानगरों में या कभी कभी विदेशों में बस चुके हैं । आज लगभग हर दूसरे घर के बच्चे अपने माता पिता से बहुत दूर रह रहे हैं ।इस प्रकार की स्थिति में एक गंभीर समस्या यह है कि बच्चे जिन्होंने अपनी जीविका के कारण महानगरों या बड़े शहरों को चुना है वो चाहते हुए भी माता पिता के पास उनकी हर जरूरत पर नहीं रह सकते हैं और वे बुजुर्ग जिन्होंने अपनी जिंदगी किसी छोटे शहर में बिताई उन्हें महानगरों को मशीनी जीवन रास नहीं आती ।इस परिस्थिति में हम न बच्चों को दोष दे सकते हैं न ही माता पिता को ।ऐसा नहीं है कि बच्चे माता पिता को अपने साथ रखना नहीं चाहते या उनकी फिक्र नहीं करते लेकिन जिंदगी की भागमभाग में वो खुद लाचार हैं और उन जगहों पर बुजुर्गों के लिए समय बिताना बहुत मुश्किल होता है । मेरे माता पिता खुद बीमार और परेशानियों के बावजूद मेरे भाई के पास मुंबई नहीं जाना चाहते ,क्या मेरे भाई को उनकी कोई चिंता नहीं ?क्या मेरी भाभी उनकी इज्जत नहीं करती या मेरे भतीजों को अपने दादा दादी का संग नहीं भाता ? ऐसा कुछ भी नहीं मेरा भाई अपनी व्यस्त दिनचर्या के बाद भी उनके साथ समय बिताता है ,मेरी भाभी यथासंभव उनका मन लगाने का प्रयास करती है बच्चों को दादा दादी के साथ सोना और लूडो खेलना बहुत भाता है ।माँ पापा केहमेशा साथ नहीं रहने पर भी घर के तीसरे बेडरूम को माँ पापा के लिए रखा जाता है लेकिन इनके बावजूद पापा वहां नहीं रहना चाहते वजह अकेलापन ।जिन लोगों की जिंदगी अपने अगल बगल और पड़ोसियों के साथ की बातचीत से गुजरी वो उतना अकेलापन बर्दाश्त नहीं कर पाते हद तो तब होती है जबकि मेरी दीदी भी वहीं मुंबई में ही रहती है ये दूसरी बात है कि दोनों के घर की दूरी लगभग 3घंटे की है ।और चाहने पर भी वो हर वीकेंड नहीं आ पाती है ।इस बारे में ऐसा बिल्कुल नहीं है कि मात्र बुजुर्ग महानगर में ही अकेलापन महसूस करते हैं सभी लोगों को अपनी जगह बड़ी प्यारी होती हैं और कोई भी अपनी जड़ों से अलग नहीं होना चाहता ।एक बार इसी बात पर मैं अपने पापा के लिए चिंतित होकर मुंबई न जाने पर भुनभुना रही थी तभी मुझे ऐसा लगा कि अगर ऐसी परिस्थिति मेरे साथ हो तो क्या मैं आसानी से एक नए जगह को उस उम्र में हमेशा के लिए स्वीकार सकूँगी ? शायद नहीं ....
Saturday, 13 January 2018
आज का दिन मकर संक्रांति अर्थात सूर्य के दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाने का दिन ।बचपन से सुनती थी कि आज से दिन रोज एक एक तिल के हिसाब से बढ़ता जाता है और इस दिन को ठंड खत्म होने की अधिकारिक घोषणा के रूप में भी ली जाती है । औऱ अगर बात अंग्रेजी हिसाब से लगाई जाए तो इसके लिए संभवत 25 दिसम्बर की तारीख है जो बड़ा दिन कहलाता है उस दिन से प्रकृति में गर्मी की मात्रा शनै: शनै: बढ़ती जाती है ।लेकिन विगत कुछ वर्षों से मौसम के बदलाव ने हमें असमंजस में डाल दिया है ।हमने इस वर्ष भी 25 -26 दिसंबर तक गुलाबी ठंड को ही महसूस किया है और ठंड़ खत्म होने के समय से ही भयंकर ठंड को महसूस करना शुरू किया है । क्या कहें इसे प्रकृति की ठिठोली ? कुछ भी हो इसकी शुरुवात तो हमारी ओर से हुई है !
Sunday, 24 December 2017
कल गुरुद्वारा गई पूरे दिन श्रद्धा औऱ भक्ति से
सरोबार सिर्फ मैं ही नहीं गुरुद्वारा में सभी सिख और गैर सिख दोनों ।अगर गुरुद्वारा में सर ढकने की परंपरा है तो सभी भक्ति की भावना से अक्षरशः पालन करते हुए ।आज नहीं बल्कि कल अर्धरात्रि से ही Merry Christmas से सभी सोशल मीडिया भरे पड़े ।जिस जिस घरों में छोटे बच्चे हैं बच्चों के साथ मम्मी पापा क्रिसमस ट्री और सांता के कपड़े को सजाने में तत्पर ।ये बात मुझे काफी प्रभावित करती है क्योंकि चंद वर्ष पहले ऐसा मेरी बच्चियों ने भी किया है और हर वर्ष एक अटूट विश्वास के साथ अपनी मनपसंद वस्तु की फरमाइश सांता से की है और प्रति वर्ष यथा संभव शायद उनके सांता ने भी उन्हें निराश नहीं किया ।अब तो बेटियां बड़ी हो गई कल गुरुद्वारा और आज के क्रिसमस के हर धर्म के लोगों की भावना देखकर मेरी बेटी का सवाल यह है कि अगर हम हर धर्म के नियमों का पालन इतनी इज्जत से करते हैं तो वैसी ही भावना हमारे अंदर देशभक्ति और सामाजिक नियमों के प्रति क्यों नहीं? क्यों हम अपनों के बीच बिहारी, बंगाली या मराठी जैसी भावना के कारण वैमनस्यता को पालते हैं ? क्या हम मात्र धर्म के इशू पर ही राज्य और देश की सीमा को लांघ सकते हैं गैरतलब है कि वहाँ कई सिख परिवार सभी राज्य और पूरी दुनिया से आए थे ।