Tuesday, 9 July 2024

पुस्तक समीक्षा ##16##
पुस्तक का नाम ## एक टीचर 
की डायरी 
लेखिका ##श्रीमती भावना शेखर #
पब्लिकेशन  #प्रभात पेपरबैक्स ##
नए लेखकों को पढ़ने का मेरा अब तक का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा है। मैंने अधिकांश नए लेखकों में स्थापित लेखकों के नकल करने की प्रवृति देखी है।
          इसके विपरित कल जब मैंने श्रीमती भावना शेखर जी की किताब "एक टीचर की डायरी" को पढ़ना शुरू किया तो यकीन मानिए ऐसा लगा कि मैं फिर से अपनी बेटियों के स्कूली समय में पहुंच गई हूं ।
ये एक सुखद संयोग है कि श्रीमती भावना शेखर ने राजधानी पटना के उसी नोट्रेडम स्कूल में छब्बीस सालों तक अध्यापन का कार्य किया है जिसमें मेरी दोनों बेटियां पढ़ती थी और बड़ी बेटी ने छठी और सातवीं कक्षा में उनसे शिक्षा भी पाई है। 
पुस्तक की पहले ही पन्ने पर लेखिका ने ईमानदारी से स्वीकारा है कि इस स्कूल की नौकरी उन्होंने बेटी के एडमिशन के जद्दोजहद के क्रम में शुरू किया लेकिन बाद के अध्यापन के लंबे समय में इस कार्य को इतनी शिद्दत से किया कि अपनी छात्राओं के लिए प्रेरणा स्रोत भी  बनी रही ।
इस पतली सी किताब में लिखी हुई बातें आपको आपके बच्चों के जीवन उस हिस्से में पहुंचा देंगी जिसमें न जाने वे कितने ही समस्याओं से जूझते रहते हैं। घरों में होने वाले यौन शोषण से लेकर, माता पिता के बीच होने वाले ऐसे झगड़े, जिसमें पिता का ही अन्यत्र अफेयर हो जैसी कई अन्य परेशानियां जो  किशोरवय बच्चे किसी से साझा नहीं कर पाते ऐसे समय में एक मां की तरह टीचर का होना उनके लिए वरदान के समान है ।वैसे भी अपनी बेटियों के स्कूली जीवनकाल में छात्राओं और शिक्षिकाओं के बीच की  आत्मीयता को मैंने महसूस किया है।
         पुस्तक में लिखी गई कुछ बातें यथा कभी कभी बच्चे तनाव में आकर परीक्षा में नकल करने लगते हैं उनकी इस गलती को माफ कर उन्हें मौका देना , बच्चे के आर्थिक रूप से कमजोर होने पर उनकी मदद के लिए सोचना , बुजुर्गों का भावना में बह कर बच्चियों का विचित्र नामकरण करने पर उनका  सामूहिक 
मजाक का शिकार होने से बचाना ,अभिभावकों के द्वारा किया गया दुर्व्यवहार जैसी घटनाएं आपको वास्तविकता से रूबरू कराती है।
पुस्तक के दूसरे हिस्से में लेखिका ने अपने विद्यार्थी जीवन के संस्मरण लिखे हैं जो काफी रोचक हैं।
   एक ऐसा स्कूल जहां बहुधा महानगरों और विदेशों तक से बच्चियां पिता के ट्रांसफर के बाद पढ़ने को आती हैं, जहां राजधानी के उच्च पदासीन कर्मचारियों और टॉप बिजनेस फैमिली की बेटियां पढ़ती हैं , वहां आपकी बच्चियों के गलत दिशा में बढ़ने की संभावना कई गुना बढ़ जाती हैं और फिर यह भी जरूरी नहीं कि हर बच्ची को नोट्रेडम जैसा स्कूल या  श्रीमती शेखर जैसी टीचर का संरक्षण मिल जाए ।
     कुल मिला कर मैं उन माताओं से इस पुस्तक को पढ़ने का आग्रह करती हूं जो अपने बच्चों को किसी प्रतिष्ठित स्कूल में डाल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझती हैं और कभी कभी छोटी सी गलती माता पिता की  नासमझी के कारण घातक साबित होती है।




Monday, 3 June 2024

कभी 80 के दशक में किसी प्रसिद्ध गीतकार ने एक इंटरव्यू में बताया कि हमारे कुछ सीनियर्स ने 60 से लेकर 70 तक के गीतों को हिंदी फिल्मों का स्वर्णिम युग कहा ।फिर जब हम 90 के दशक में पहुंचे तो 80 के गीतों को कर्णप्रिय और फिल्मों को बेमिसाल माना गया और फिर उस दौर के बीतने के बाद उसे अच्छा कहा गया ।ये  सिलसिला अब तक चलता जा रहा है अर्थात हम हमेशा अपने बीते हुए समय के फिल्मों और गीतों  को ही अच्छा मान रहे हैं। 
यहां बात सिर्फ फिल्मों तक ही सीमित नहीं है जीवन के हर क्षेत्र में ही लोग ऐसा करते और कहते आए हैं।कहने का अर्थ  हमेशा बीते हुए दिनों को याद अफसोस करना एक आदत सी बनती जा रही है। अगर थोड़ी देर के लिए हिंदी  फिल्मों या गीतों की ही बात हो तो क्या पहले की सारी की सारी  फिल्में अच्छी थी ? क्या आज भी कई गीत कर्णप्रिय नहीं होते ! निश्चय ही उस समय भी कुछ घटिया फिल्में बना करती थी और आज भी अच्छी फिल्में आती है।
यहां अगर अपनी बात करूं तो मैं भी इस भावना से अछूती नहीं हूं जब मेरे बच्चे छोटे थे तो मैं सोचती थी कि जब ये बड़ी हो जाएंगी तो सब ठीक हो जाएगा, धीरे धीरे बेटियां पहले पढ़ाई और बाद में नौकरी के लिए कई सालों से बाहर है तो हर वक्त उनकी चिंता रहती है तो अब लगता है कि पहले ही सही था, बच्चे कम से कम पास तो थे।
अक्सर fb या सोशल मीडिया पर पहले के घरों , गांवों और पारिवारिक एकता जैसी बातों की दुहाई दी जाती हैं।पहले के मुकाबले स्कूल कॉलेजों आदि में शिक्षा के गिरते स्तर पर विवेचना की जाती है लेकिन यहां मेरा कहना है कि क्या हमने हर क्षेत्र में उन्नति नहीं किया है ! क्या दूसरे सामाजिक आडंबरों पर खर्च करने की जगह आज माता पिता अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना सही नहीं समझते !  चाहे वो लड़की क्यों न हो ! आज पहले की तुलना में औरतों की स्थिति में जो सुधार आया है कुछ साल पहले इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। कितनी ही बीमारियों पर आज  नियन्त्रण पा लिया गया है। यहां संयुक्त परिवार का टूटना समय की मांग है जिसे हम नकार नहीं सकते।  हमारी पिछली पीढ़ियों की  कई गलतियों को हम भी झेल रहे हैं ।मसलन हमारी विशाल जनसंख्या हमसे दो ऊपर  पीढ़ी की देन है ।
    तो जहां तक मैं सोचती हूं कि जो वर्तमान है वही सबसे अच्छा है ।
"हर घड़ी  बदल रही है रूप जिंदगी,
छांव है कभी ,कभी है 
धूप जिंदगी ,
हर पल यहां जी भर जियो 
जो है समां कल हो ना हो।"

Friday, 24 May 2024

कल वसु ने उपहार के तौर पर एक किताब भेजी । काफी समय  के बाद ये किताब किसी प्राइवेट कोरियर से न आकर  भारतीय डाक के speed post के जरिए मेरे पास आई थी .इस घटना ने लगभग पैंतीस चालीस साल पुरानी "हिन्द पैकेट बुक" के बेहतरीन उपन्यास और उसकी "घरेलू लाइब्रेरी योजना "की याद दिला दी।
          आज भले ही मेरी मां किताब के दो चार  पन्ने पढ़ने में ही  थक जाती है लेकिन किसी जमाने में इन्हीं किताबों और मैग्जीनस में मां की जान बसती थी।  घर में धर्मयुग , सारिका और साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिकाएं  मासिक तौर पर ली जाती थी। साथ ही  बहुत से उपन्यास पापा अपने कॉलेज की लाइब्रेरी से मां के पढ़ने के लिए लाते थे और कई उपन्यास धारावाहिक श्रृंखला के रूप में धर्मयुग आदि में छपते थे और किस्त पूरी  होने पर सूई धागे से सिलकर किताब का रूप दिया जाता । 
 इन्हीं दिनों मां ने शायद अपने जैसी ही किसी पुस्तक प्रेमी की सलाह पर घरेलू लाइब्रेरी योजना से किताब वी पी के द्वारा मांगना शुरू किया।ये एक ऐसी मासिक योजना थी जिसके तहत चुनिंदा लेखकों की किताबें अच्छे डिस्काउंट के साथ लोगों को घर पर मुहैया कराई जाती थी।भले ही फ्लिपकार्ट या अमेजन जैसे सहायकों से किताबों का खरीदना बहुत ही आसान है लेकिन उस समय इस योजना से किताब मांगना इतना भी आसान नहीं था।पहले कंपनी के द्वारा एक पोस्टकार्ड या टिकट लगा लिफाफा दिया जाता था,साथ ही किताबों की बाकायदा लिस्ट भेजी जाती थी जिसका चयन कर किताबें खरीदने वाला  पोस्टकार्ड भेज देता  था और फिर पंद्रह बीस दिनों का लंबा  इंतजार किया जाता था । फिर पोस्टमैन किताबों की वी पी लाता जिसेआज की  C O D की तर्ज पर पैसे देकर छुड़ा लिया जाता था।  घर बंद होने की स्थिति में डाकिया मात्र कार्ड डाल कर अपनी उपस्थिति दर्ज कर जाता था । पुस्तकों को सात दिनों के अंदर निकट के पोस्ट ऑफिस में सुरक्षित रखा जाता था जिसे वहां से पैसे देकर लाया जा सकता था। किताबों के पोस्ट ऑफिस से नहीं लेने पर कंपनी को दोहरा डाक खर्च वहन करना पड़ता था जिसके बाद आपको  कंपनी के द्वारा उपालंभ से भरी चिट्ठी भेजी जाती थी और आपको इस योजना के लिए "ब्लैक लिस्टेड"कर दिया जाता था,ठीक उसी तरह अगर आप किसी नए ग्राहक को अपने द्वारा जोड़ते हैं तो आपको इनाम में अपनी पसंद की किताबें भी दी जाई जाती थी। ये सिलसिला काफी वर्षों तक चला । बाद के वर्षो में किताबों की डिलीवरी में कुछ शिकायतें आने लगी और लोगों के द्वारा चुने गए किताबों की जगह नए लेखकों की  किताबें आने लगी जो पाठकों को नागवार लगने लगी।
      यहां एक  राज़ की बात ये है इसी घरेलू लाइब्रेरी योजना के कारण घर में अच्छी किताबें आती रही और पहले चोरी छिपे और बाद में मुझे भी मां के साथ साथ उपन्यास पढ़ने की आदत लग गई जो आज मेरे अच्छे बुरे समय में मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं है।


Sunday, 3 March 2024

गत 20Feb को मशहूर रेडियो उद्घोषक अमीन सयानी जी का देहांत हो गया। संभवत उस जमाने का शायद ही कोई उनकी जादुई आवाज से अपरिचित होगा । उनके संबंध में   "The Times of India" ने बड़ी दिलचस्प बात लिखी कि भारतीय होने और अपने सगे भाई के AIR में पहले से कार्यरत होने के बाद भी इतनी जादुई और मखमली आवाज के बाद भी क्या कारण था कि उन्होंने अपना कैरियर AIR के बजाय लंका (रेडियो सिलोन) से शुरू किया तो इसका कारण यह था कि उस समय ऑल इण्डिया रेडियो की नीति थी कि इसमें मात्र परंपरागत कलाकारों और वाद्य यंत्रों को प्रमोट करने के नाम पर उन्हें ही प्रवेश दिया जाता था और तो और इस कसौटी पर हारमोनियम भी विदेशी होने के कारण खरा नहीं उतरता था तो हिंदी फिल्मी गाने तो दूर की बात थी । ऐसे में अमीन सयानीजी ने अपने कैरियर की शुरुवात रेडियो सिलोन से की जो कि हिंदी फिल्म के गानों से जुड़ा कार्यक्रम था और चंद ही वर्षों में काफी प्रसिद्ध हो गया. बाद के वर्षो में AIR ने भी अपनी नीतियों में बदलाव के साथ 1957 में विविध भारती की स्थापना हुई जिससे हिंदी फिल्मी गानों की ऑल इण्डिया रेडियो पर प्रवेश मिला । बाद में भारतीय जनता की नब्ज को पकड़ते हुए इस कार्यक्रम को फौजी भाइयों के लिए समर्पित किया गया। इन सभी बातों का सार यह है कि आम जीवन हो या टेक्नोलॉजी में परिवर्तन की गुंजाइश हमेशा ही बनी रहती है बशर्ते उसका दुरुपयोग न किया जाए। कंप्यूटर के आने से पहले एक भ्रांति यह थी इससे बेरोजगारी बढ़ जाएंगी लेकिन आज इसके बिना जिंदगी नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर मालूम होती है। विवाह हो या अंतिम संस्कार उनमें होने वाले कई रिवाज मात्र इसलिए निभाया जा रहा हैं क्योंकि ये पुरानी हैं और हमेशा से होती आई हैं। गाहे बिगाहे हम या हमसे ऊपर की आज की पीढ़ी से अपनी तुलना करते हैं लेकिन होने वाले परिवर्तन को स्वीकारना हमारे लिए कई मायनों में जरूरी है।
 अपनी पुस्तक पथ का दावा में  शरद चंद कहते हैं कि कोई भी पुरानी चीज  सिर्फ इसलिए सही नहीं हो सकती क्योंकि वो पुरानी हैं जिस तरह सत्तर साल का बूढ़ा कभी भी दस साल के बच्चे से पवित्र नहीं हो सकता है। 
तो किसी भी नई चीज या विचार को नकारने से पहले उसके गुण  दोषों पर विचार करना श्रेयस्कर है क्योंकि यूं भी पुरानी शराब अच्छी होने के बाद भी उसके बॉटल और कलेवर को नया रूप दिया जाता है।
श्री तेजकर झा द्वारा लिखित पुस्तक "Darbhanga Chronicles" पिछले कुछ दिनों से मैं पढ़ रही थी। किताबों की श्रृंखला में कुछ पुस्तकें ऐसी होती हैं जिन्हें आप अच्छी तरह से समझ ही पढ़ते हैं और इस तरह की पुस्तकें आपके लिए यादगार साबित होती हैं , श्री झा की इस किताब को मैं इसी श्रेणी में रखना चाहूंगी।
यह पुस्तक दरभंगा राज के संबंध में लिखी गई है । श्री झा ने इसे छह भागों में बांटते हुए इसके सभी पहलुओं पर फोकस किया है।
पहले भाग  इतिहास में राज दरभंगा के शासकों के उत्पति और  राज विस्तार के बारे  विस्तृत रूप से बताया गया है। खड़वा,जबलपुर और मंडला से संबंधित  इसके आदिपुरुष महामहोपाध्याय गंगाधर झा से संकर्षण ठाकुर से होते हुए महेश ठाकुर ने दरभंगी खान को परास्त कर इस राज की स्थापना हुई। जिस पर कुल अठारह राजाओं ने शासन किया ।
दूसरे भाग में गेराल्ड डेनबी जिनका नाम , मिथिलावासी डेनबी रोड के रूप में बचपन से सुनते आए हैं, के बारे में जानना काफी रोचक है ।एक ऐसा ब्रिटिश जो हमेशा के लिए अपने पूरे परिवार के साथ लंदन जाने को जहाज पर चढ़ चुका था महाराज के एक आग्रह पर लंदन यात्रा को अंतिम क्षणों में स्थागित कर दी और पूरी शिद्दत से महाराज की मित्रता और राज की ओर से मिले पद को  ईमानदारी से निभाया ।यह उसी की दूरदर्शिता का परिणाम था कि राज के हर क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति हुई ।लेकिन जब राज के खर्च को कम करने के लिए कर्मचारियों की छंटनी की बारी आई तो महाराज के विरोध के बावजूद  उसने अपने पद का त्याग किया। कम शब्दों में उसने अपनी वेदना पत्र में महाराज को लिख भेजा कि यहां के लोगों ने मेरे ब्रिटिश होने के कारण कभी मुझे वफादार नहीं माना और ब्रिटेन के लोगों ने एक देशी राजा की नौकरी के कारण मेरी इज्जत नहीं की लेकिन मैंने हमेशा ही आपसे( महाराज) से अपनी मित्रता ही निभाई।
तीसरे भाग पॉलिटिक्स में लेखक ने तत्कालीन कांग्रेस और दरभंगा राज के संबंधों के बारे में प्रकाश डाला है । इस विषय में स्वतंत्रता से पूर्व और उसके बाद की राजनीति काफी रोचक है।
गांधी जी की south Africa की यात्रा और उसके संबंध में महाराज से किया गया पत्राचार इस किताब में तारीख के साथ दर्ज किया गया है। 1934 के विनाशकारी भूकंप के बाद गांधीजी ने उस समय रामबाग के कैंप में रह रही बड़ी महारानी से सवाल किया कि वे संभवत महारानी होने के कारण आराम ही करती होगी ? महारानी ने विनम्रता से जवाब दिया कि मिथिला की स्त्रियां बचपन से ही चरखा चलाने में सिद्धहस्त होती हैं।
Democracy वाले भाग को पढ़ने से उस समय जमींदारी उन्मूलन अभियान के साथ ही उस वक्त की कई बिंदुओं पर ध्यान दिया गया है।
इस पुस्तक का अंतिम और सबसे दिलचस्प भाग है दरबार डायरी  जो कि महाराज की दो डायरियों पर आधारित है। इसमें महाराज की व्यक्तिगत बातों के साथ दिन प्रति दिन घट रही समस्याओं का बहुत ही अच्छा वर्णन है। इसे पढ़ते हुए आप किसी शीर्षस्थ व्यक्ति की तनावपूर्ण जीवन को भलीभांति अनुभव कर सकते हैं।         इस किताब को पढ़ने की सिफारिश मैं सिर्फ इसलिए नहीं करती हूं कि ये अमुक व्यक्ति या अमुक स्थान विशेष पर लिखी गई है बल्कि हमारे लिए यह एक लज्जास्पद बात है कि हम अपने ही राज्य के किसी भी राजवंश के इतिहास से बिल्कुल अनभिज्ञ हैं।इसी पुस्तक के अनुसार स्वतंत्रता के समय बिहार में लगभग पचास हजार छोटी बड़ी रियासतें थी जिनमें छह प्रमुख थी लेकिन हम सभी के लिए अफसोस की बात है कि किसी भी राजवंश के बारे में सुनी सुनाई और अधकचरे ज्ञान के अलावा हम कुछ भी नहीं जानते हैं।

Saturday, 14 October 2023

 श्री तेजाकर झा द्वारा लिखित पुस्तक The Crisis of succession को पढ़ा ।आज  तक महाराजा,महारानी और साम्राज्य संबंधी बातें हमने इतिहास में ही पढ़ा है। लेकिन इस किताब के माध्यम से जाने पहचाने क्षेत्रों और उनके शासकों को  पढ़ना काफी रोचक है। जैसा कि इस किताब के नाम से ही स्पष्ट है एक भरे पूरे और प्रभुत्व संपन्न साम्राज्य में उत्तराधिकार के अंधी दौड़ में किस तरह की साजिशें रची जा सकती है और  इसका परिणाम संबंधों को किस हद तक ले जा सकता है,ये किताब इसे पेश करने में पूरी तरह सक्षम है।
 वैसे तो अपने को देवी कंकाली का सेवक मात्र मानने वाले तिरहुत /मिथिला/दरभंगा खंडावला वंशीय महाराजाओं का इस रियासत का आरंभ सन् 1573 से माना जाता है जिसे पहले मुगल बादशाह शाह आलम 2nd और बाद में बंगाल के नवाबों द्वारा घोषित किया गया। कुल अठारह राजाओं ने इस पर राज किया जिन्होंने अपनी अच्छी शिक्षा  और सुचारू रूप से चलने वाले शासन प्रबंध के द्वारा साम्राज्य की अच्छी पहचान बनाई लेकिन इस किताब में लेखक श्री झा ने महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह ,महाराज रामेश्वर सिंह और विशेष रूप से महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह जी का चरित्र चित्रण और उनकी महारानियो की जीवनी  लिखी है। साथ ही साथ  महाराजा के निकटस्थ संबंधी भी पुस्तक का  महत्वपूर्ण हिस्सा है।
 महाराज रामेश्वर सिंह जी की एक बेटी लक्ष्मी दाईजी और  दो पुत्र कामेश्वर सिंह एवम   विशेश्वर सिंह थे। लक्ष्मी दाईजी उम्र में अपने भाई कामेश्वर सिंह से पांच वर्ष बड़ी थी। भाइयों से बड़ी होने के कारण वो स्वभाव से ही काफी दबंग थी ।अपने गुणों और बड़े भाई होने के कारण कामेश्वर सिंह जी दरभंगा के महाराज बने और कालांतर में विशेश्वर सिंह को राजाबहादुर की उपाधि के साथ राजनगर सौंपा गया। 
 तत्कालीन समय के अनुरूप  सोलह वर्षीय कामेश्वर सिंह जी का ब्याह नौ वर्ष की कुलीन परिवार की छोटी सी कन्या से हुआ जो विवाह के बाद राजलक्ष्मी कहलाई ।राजलक्ष्मी बचपन से ही काफी धार्मिक प्रवृति और स्वभाव से सरल थी । शायद उनकी इसी  प्रवृति के कारण उनकी सास ,ननद और यहां तक की उनके मायके से साथ आई नौकरानी तक उनपर हावी रही जो महाराज से उनके अलगाव का कारण बनी । यहां महाराज और महारानी के बीच दूरी बढ़ाने का काम संभवत उत्तराधिकार से सबंधित एक सोची समझी रणनीति थी जिसके अनुसार महाराज के अपनी संतान नहीं होने की स्थिति में में यह अधिकार संभवत लक्ष्मी दाईजी के पुत्र कन्हैयाजी को मिलता ।लक्ष्मी दाईजी,उनकी मां और उनके पति ने अपने बेटे को इस गद्दी का अघोषित वारिस मान लिया था।
महाराज कामेश्वर सिंह और महारानी राजलक्ष्मी जी के वैमनस्य के कारण महाराज ने दूसरा विवाह किया जो विवाह के बाद कामेश्वरी प्रिया कहलाई । शिक्षित,संस्कारी और बुद्धिमती रानी अपने पहले ही  प्रसव के दौरान लक्ष्मी दाईजी की षडयंत्र का शिकार बन कर मृत्यु को प्राप्त हुई और  जिसका आरोप  बड़ी महारानी पर आया जिसके कारण क्रोधित होकर महाराज ने जिंदगी भर उनका मुंह न देखने की शपथ खा ली । इस बीच राजाबहादुर को तीन पुत्र हुए और महाराज ने उनके बड़े बेटे जीवेश्वर सिंह को बाकायदा उतराधिकारी बनाने के बारे में सोचना शुरू किया ।लेकिन  राजमाता ने महाराज को तीसरे विवाह के लिए विवश किया ।तीसरी रानी एक बड़े पंडित परिवार से आई और कामसुंदरी कहलाई । लेकिन वो भी महाराज को वारिस नहीं दे पाई। जीवेश्वर सिंह को हर तरह से एक शासक बनाने की कोशिश की गई लेकिन अंतत वो कई बुरी आदतों का शिकार होने की वजह से इससे वंचित रह गए ।उत्तराधिकार की लड़ाई अब संपत्ति की लड़ाई में बदल गई और पारिवारिक षड्यत्रो और साजिशों से तंग आकर महाराज ने लंदन में बसने का इरादा किया लेकिन उससे पहले ही संदेहास्पद मृत्यु को प्राप्त हुए ।
  दरभंगा राज, एक ऐसा राज्य जो इस क्षेत्र में अपने समय का सबसे विशाल और समृद्ध राज था । जिसकी सांस्कृतिक विरासत और प्रसिद्धि पूरे देश में दूर दूर तक फैली हुई थी। हर लिहाज से एक ऐसी  आदर्श रियासत , जो अपने आखिरी शासक की संदेहास्पद मृत्यु के मात्र 60 साल के भीतर ही क्यों छिन्न भिन्न हो गई !
इस तरह बातें संभवत किसी भी रियासत के लिए साधारण हो ।लेकिन यह किताब मात्र सुनी सुनाई बातों पर न होकर  महाराज ,महारानियो और कुमार जीवेश्वर सिंह जी के डायरियों पर आधारित है।इसके साथ साथ राज में कार्यरत कर्मचारियों के रिपोर्ट भी इसके साथ संलग्न है।
एक ऐसा राजवंश जिसके शासकों ने रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए क्षेत्र में कई उद्योगों और मिल्स की स्थापना करवाई । शिक्षा और आधुनिकीकरण को बढ़ावा देने वाले ये शासक  अपने भाई भतीजे के साथ महारानियो की शिक्षा के लिए काफी प्रयासरत थे लेकिन उस समय की परंपरागत सोच और रूढ़िवादिता उन्हें पीछे धकेलने के लिए पर्याप्त थी । नारी अशिक्षा ,बाल और बेमेल विवाह के कारण अधिकांश राजाओं के दांपत्य जीवन में सामंजस्य  का अभाव रहता था जिसके कारण विवाहोत्तर संबंध और व्यभिचार आम बाते थी । 
अगर अधिक विस्तार में इस पुस्तक की बातों को लिखा जाए तो शायद ये चर्चा काफी लंबी हो जाएगी और  नए पाठकों के लिए जिज्ञासा खत्म  हो जाएगी । महाराज की मृत्यु के बाद की स्थिति का वर्णन भी किताब में बखूबी किया गया है।लेखक श्री झा का  महारानी कामसुंदरी के नजदीकी रिश्तेदार रहते हुए भी सभी महारानियो के प्रति तटस्थता का भाव रखना उनकी लेखनी की गहराई का परिचय देता है।
इस रियासत के संबंध में गालिब का  ये शेर कहना वाजिब है
हमें तो अपनों ने लूटा , गैरों में कहां दम था।
अपनी कश्ती वहां डूबी जहां पानी कम था ।।

Thursday, 21 September 2023

पिछले दो हफ्तों से श्री विकास कुमार झा द्वारा लिखित पुस्तक "राजा मोमो और पीली बुलबुल "को पढ़ने में लगी हुई थी।देश के सबसे छोटे राज्य गोवा के विषय में इसे एक उत्कृष्ट पुस्तक के रूप में जाना जा सकता है। बचपन से लेकर इस किताब को पढ़ने तक गोवा के विषय में मेरी धारणा कुछ अलग किस्म की थी ।ज्यादातर लोग इसे नशाखोरी और हिप्पियों के अड्डे के रूप में ही जानते हैं लेकिन जब हम गोवा को किसी गोअन की दृष्टि से देखते हैं तो उसके एक अलग रूप से परिचित होते हैं।
    "मारियो मिरांडा "  गोवा के लौटोलिम गांव में रहते थे वो Times of India prakashn से बतौर कार्टूनिस्ट जुड़े हुए थे ।अपने बेटे के मनिपाल ले जाने के क्रम में लेखक का गोवा जाना हुआ और गोवा में वो  विश्व प्रसिद्ध  कार्टूनिस्ट मारिया मिरांडा के आवास पर जाकर मिले । हालंकि मिरांडा उन दिनों अपने दो दोस्तों के गुजर जाने से काफी दुखी थे लेकिन फिर भी उन्होंने श्री झा को अपना समय दिया।जब श्री मिरांडा ने जाना कि श्री झा ने कई उपन्यास लिखे हैं तो उन्होंने उनसे गोवा के विषय में लिखने को कहा उनका कहना था कि हर लिहाज से खुशगवार गोवा आज एक अलग तरह की समस्या से जूझ रहा है और वो है मोटापा । इस मोटापा के कारण उनका जीना मुश्किल है क्योंकि वे अपने दैनिक काम करने से भी लाचार हैं। महिलाओं में ये बीमारी अधिक देखी जा रही हैं लेकिन पुरुष और बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं। गौर करने वाली बात ये है कि श्री झा के मिलने के कुछ दिनों के बाद ही श्री मिरांडा का निधन हो गया।इस दौरान श्री झा का अनेकों बार गोवा जाना हुआ और श्री मिरांडा से किया गया वायदा उन्हें बार बार याद आता रहा।इसी दौरान उनकी मुलाकात एक बेकरी चलाने वाली मां बेटी से हुई । दोनों ही अत्याधिक मोटापे से ग्रस्त थी लेकिन मां कई सालों से 24घंटे  बिस्तर पर ही रहने को लाचार थी ।श्री झा को श्री मिरांडा से किया गया वायदा याद आ गया और उन्होंने उनसे उनपर लिखने की अनुमति मांगी।कुछ झिझक के बाद उन्होंने नाम बदलने की शर्त पर इसकी अनुमति मांगी। 
सैंड्रा और उनकी मम्मी मिनि पर आधारित कहानी काफी रोचक है ।इस क्रम में आप कई बार उनके दर्द से भावुक हो जाते हैं। घटनाक्रम कुछ ऐसी होती हैं कि घर के ठीक बगल में "सैंड्रा फिटनेस सेंटर" के नाम से एक जिम खुल जाता है। पूर्वाग्रह से ग्रसित सैंड्रा इसे अपना मजाक बनाना समझती है जबकि यथार्थ कुछ और ही होता है। गोवा में चार दिनों तक चलने वाला कार्निवाल फेस्टिवल में किंग मोमो जो सैंड्रा का बचपन का साथी है वो उसे एक मनचाहा प्रिंस के पाने की दुआ देता है लेकिन अपने उम्र के चालीसवे साल में पहुंची अविवाहित सैंड्रा जिंदगी के प्रति  बिल्कुल हताश है लेकिन किंग मोमो की दुआ के अनुसार उसकी बुआ के द्वारा भेजा गया एक मेहमान विटामियो उसके सपनों का राजकुमार होता है जो उसकी जिंदगी की हर परेशानी का समाधान करता है ।
इस कहानी के साथ साथ चेरिल ,नेहरू पिमेटा , विश्वसुंदरी रीता फारिया और कई और किरदारों की कहानी से भी आप रूबरू होते है। लेखक श्री झा गोवा के साथ साथ पुर्तगाल के इतिहास के अच्छे जानकार हैं ये  बात इस किताब को पढ़कर आप अच्छी तरह से समझ सकते हैं। जनसाधारण गोवा के क्रिसमस और नए साल के जश्न को ही जानता है लेकिन इसे पढ़ने के बाद ही आप गोवा के ऐसे वसंत ऋतु से वाकिफ होते हैं जिसमें कार्निवाल फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है जिसमें किंग मोमो के रूप में एक प्रतिनिधि का चुनाव किया जाता है जिसे देखने के लिए पूरी दुनिया के लोग आते हैं।छोटी सी पीली बुलबुल गोवा की राजकीय पक्षी है। विगत दो हफ्तों से मैं इस किताब को पढ़ते हुए वहां की सामाजिक और भौगोलिक क्षेत्र को जानते हुए गोवा के काफी करीब पहुंच गई । पुर्तगालियों ने मिट्टी और नदी के भविष्य को सोच कर ब्राजील की तरह गोवा में भी काजू की खेती शुरू करवाई वे जानना  भी काफी दिलचस्प है।काजू ,बादाम और धान के फसलों से भरपूर गोवा मेहनती किसानों से भी भरा हुआ है जो कई गांवो में हिंदु बहुसंख्यक के रुप में हैं ।जब आप इस तरह की किताब को पढ़ते हैं तो इसे एक झटके में किसी सामान्य उपन्यास की तरह नहीं पढ़ सकते हैं बल्कि इसे कोर्स की किताब की तरह समझकर पढ़ना श्रेयस्कर होता है।