कुछ दिन पहले सुबह कामवाली बाई अपने निर्धारित समय पर आई ,काम शुरू ही किया कि उसकी बेटी घबराई हुई सी आई ,"मम्मी चलो फिर से घर तोड़ने आया है ।तुरंत हाथ का काम छोड़ कर बाई चली गई ।मैं खड़ी खड़ी उसके जाने और उसके आगामी 4-5दिनों तक काम से अनुपस्थित होने का पूर्वानुमान लगाने लगी ।मन ही मन हिसाब लगाने पर याद गया कि कुल 5 महीने पहले ही कोर्ट के आदेश से बाई का घर तोड़ा था ।कुल चार दिनों के छुट्टी करने के बाद बाई काम पर आई थी।आते ही मैंने अपनी मुफ्त सलाह दी ,एक छोटा सा घर किराया पर ले लो और आराम से रहो,मेरी बात को नज़र अंदाज़ करते हुए उसने कहा ,भाभी 2000 रुपए एडवांस देना ,घर बनाना है ।मैंने भविष्य को ध्यान में रखते हुए चुपचाप पैसे निकाल कर दे दिए ।दूसरे दिन काम पर आते ही उसने बताना शुरू कर दिया ,अबकी बार दो रूम बनवाया है,सामान रखने की भी काफी जगह है और न जाने क्या क्या !"लेकिन जमीन तो सरकारी है न" मेरी बात पर उसने कोई ध्यान नहीं दिया। अब फिर वही बात ,मैं दिन भर परेशान ,पता नहीं इस ठण्ड में क्या हाल होगा बाई और उसके बच्चों का ! शाम में बाज़ार जा रही थी ,उसकी बस्ती के बगल से जा रही थी देखा पूरा घर टूटा हुआ ,सारा सामान रोड पर ,वही मेरी बाई स्टोव पर शायद अंडा करी बना रही है ,मोबाइल पर पूरी तेजी से गाना बज रहा है ,पूरा परिवार हँसी मजाक में लगा हुआ और मैं सुबह से उसके लिए परेशान .....
Wednesday, 1 February 2017
Tuesday, 31 January 2017
आज बसंत पंचमी है ।कुछ वर्ष पूर्व होली के संबंध में मतभेद था कि किन्हीं दो दिनों में होली कब है ? तो ये जिज्ञासा नानाजी ( पंडित श्री गोविन्द झा ) के समक्ष रखी गयी कि होली कब है ? उनका सहज जवाब था कि होली तो हर रोज है ,वसंत पंचमी के दिन से होली हर रोज़ है ।यहाँ प्रश्न यह होना चाहिए कि होली का समापन कब है ? उस दिन हमने इस बात को जान लिया कि होली और वसंत पंचमी का संबंध क्या है ! एक बात और,मैं बचपन से देवी सरस्वती को मात्र विद्यादायिनी के रूप में जानती थी लेकिन जब सरस्वती स्त्रोत सुना तो ये बात समझ में आई कि हमारे यहाँ इस देवी की पूजा कला, विद्या ,बुद्धि और विवेक के लिए की जाती है ।हमारे पुराणों के अनुसार किसी व्यक्ति की बुद्धि और वाणी पर देवी सरस्वती का एकाधिकार होता है संभवत रावण वध के महान उद्देश्य के लिए श्रीराम को वनवास भेजने में देवी सरस्वती को मंथरा की जिह्वा पर बैठना पड़ा था । लेकिन इन गुणों के साथ हमारे हिन्दू धर्म के अन्य देवी देवताओं से इतर इन्ही देवीं को बच्चों का खिलवाड़ भी झेलना पड़ता है ।आज सुबह जब पूजा में शरीक होने चाचाजी के घर जा रही थी तो रास्ते में एक पंडाल को अधूरा देख हैरान हो गई वहाँ देवी की मूर्ति के अलावा कोई नहीं था न पूजा की कोई सामग्री और न कोई अन्य सजावट ।हमने अनुमान लगाया कि शायद नन्हे कार्यकर्ताओ के आपसी झगड़े ने देवी का ये हाल किया है ।समय के साथ बहुत सी चीज़ें बदल गयी है अब न वो तीन दिनों का कानफोड़ू लॉडिसपीकर बजता है जो हमे उस वर्ष के नए गानों को रटा देता था और न कतार बद्ध छोटी छोटी लड़किया साड़ी पहन कर घूमती नज़र आती है । मुझे आज तक लड़कियों के साड़ी पहनने और सरस्वती पूजा का कोई कनेक्शन समझ में नहीं आया !
Tuesday, 24 January 2017
आज मेरा जन्मदिन है ।जब मैं छोटी थी तो हमेशा मेरे मन में ये बात आती थी कि मैंने 25जनवरी के बजाए 26 जनवरी को क्यों नहीं जन्म लिया और अब तो ये सोचकर हँसी भी आती है कि उस समय मुझे इस बात के कारण माँ पर क्रोध भी आता था कि उसने मुझे 26 को जन्म क्यों नहीं दिया ।जन्म ,मृत्यु और विवाह ये तीनों ईश्वर की इच्छा के अधीन है इस बात को समझने की उम्र तो बाद में हुई ।जन्म दिवस को पूजा के रूप में मनाया जाए या किसी पार्टी के रूप में इसके बारे में अलग अलग सोच है ।मेरे बाबा कहते थे कि जन्मदिन के दिन तो भगवान् दिनकर की उपासना करनी चाहिए चूंकि वो मान्यताओं के अनुसार शरीर के मालिक है तो इस दिन नमक छोड़ कर सूर्य की आराधना की जाए ।जब मेरी शादी हुई और मैं ससुराल आई तो इस दिन दादाजी(ददिया ससुर)ने मुझे सामने बैठा कर विशेष पूजा की और मेरे हाथों से दान करवाया ।जब बाद में श्री हरिवंश राय बच्चन की आत्मकथा पढ़ी उसमें भी जन्म दिन के अवसर पर पूजा और दान की बातों का जिक्र पढ़ा ।किसी भी धर्म और जाति का असर हमारे ऊपर रोटी और बेटी के आदान प्रदान के रूप में होता है तो केक से लेकर बैलूनऔर पार्टी को जन्मदिन के अवसर पर अब सहज स्वीकृति मिल चुकी है ।केक के संबंध में एक बात याद आती है जिसे मैंने कही पढ़ा कि किसी वृद्धा ने अपने पोते को केक काट कर मोमबत्ती बुझाते देखा तो क्रोध से बिफर उठी कि ये कौन सा तरीका है ? हमारे यहाँ किसी भी ख़ुशी के अवसर को दीये जलाकर मानते है न की बुझाकर ।आज के समय में अपने जन्मदिवस पर अगर कोई पार्टी नहीं भी मनायी जाए और कही नहीं भी जाए तो भी टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस हो चुकी है कि फेसबुक ,व्हाट्सएप और मैसेंजर के कारण घर बैठे एक उत्सव का माहौल बन जाता है और न जाने कितने ही लोगों की शुभकामनाएं और आशीर्वाद हम तक पहुँच जाता है ।आज भी पुरानी चीज़ों को सहेजते वक़्त कई बर्थडे कार्ड हाथ में आ जाते हैंऔर आ जाती है बीते दिनों की यादें जब हम नए साल और बर्थडे कार्ड्स को पिन के सहारे दीवाल पर सजाया करते थे और शायद बड़े दिन की पूरी छुट्टियाँ आँगन में बैठ कर न्यू ईयर और जनवरी में होने वालों लोगों के बर्थडे कार्डों को बना कर बिताया करते थे।
Thursday, 5 January 2017
NH 31
अपने संक्षिप्त कटिहार यात्रा के बाद वापस लौट रही हूँ ।NH 31 के रास्ते हम जब बेगूसराय के पास पहुँचे तो पेड़ो की अंधाधुन कटाई से हैरान हो गए।पास के ढ़ाबे पर चायवाले ने बताया कि रोड चौड़ा किया जा रहा है लगभग सौ किलोमीटर तक अमूमन हजारों पेड़ो को काट दिया गया ।हम विकास तो चाहते है लेकिन क्या अपने विनाश की कीमत पर ! अभी पटना के बेली रोड के पेड़ो के कटाव को देखकर आगामी गरमी की भीषणता से डर ही रही थी तभी इतनी बड़ी मात्रा में जंगल के सफाया से रोंगटे खड़े हो गए ।पूरी यात्रा में कोई भी नदी (गंगा,कोशी,और गंडक )ऐसी नहीं जो अपनी पूर्ण अवस्था में हो । शायद सभी अपनी आखिरी चरण में है ।याद आ गया बचपन में पढ़ी GK की किताब की बातें ,हमारा सबसे बड़ा दोस्त कौन- जंगल,बिहार की प्रमुख नदी- गंगा,कोशी ,गंडक...... ।न जाने कब हमारा दोस्त इतना पराया हो गया कि हम उसे बचाने के बदले खत्म करने पर तूल गए और नदियों को तो हमने नालों में बदलने की ठानी है ।
Friday, 23 December 2016
कई लोगों को यह कहते सुना है कि आज कल की लगभग सभी पिक्चर्स की कहानी एक सी होती है कोई नयापन नहीं। बात तो सही है लेकिन जहाँ तक मेरी अल्पबुद्धि काम करती है तो अगर जरा गौर से सोचें तो सभी के जीवन में एक ही कहानी क्या बार बार दुहराई नहीं जा रही। अगर अपने स्कूली जीवन को याद करती हूँ तो कुछ पल के लिए ये बात जेहन से उतर जाती है किअगले साल तो बेटी के स्कूल का अंतिम साल होगा।
स्कूल मिशनरी होने के कारण हमारे लिए क्रिसमस हमेशा से उतनी ही ख़ुशी लेकर आता था जितना कोई अन्य पर्व।समय बीता, फिर वही कहानी, आज मेरी बच्चियां क्रिसमस के नाम से काफी खुश, बचपन से और सच्चाई जानने के बाद भी (प्रत्येक बच्चे के लिए उसके पिता ही सांता क्लाउस की भूमिका निभाते हैं) अपने मन चाहे उपहार के लिए सांता क्लाउस का काफी बेसब्री से प्रतीक्षा करती हैं, एक ऐसा काल्पनिक व्यक्ति जो उत्तरी ध्रुव में काफी सारे बौनों और अपनी बीवी के साथ रहता है और वहाँ एक खिलौनों की फैक्ट्री है। उन खिलौनों को सांता क्रिसमस की रात अपने रेनडिअर घोड़े पर सवार होकर पूरी दुनिया के बच्चों को उपहार स्वरूप देता है।
मेरी बड़ी बेटी क्रिसमस वाले दिन अपने सेमिस्टर ख़त्म होने पर घर आ रही है, छोटी बहन को जितनी ख़ुशी उसके आने से है उसकी दुगुनी जिज्ञासा अपने लिए आने वाले छोटे बड़े सामानों के लिए है जो मुम्बई से उसकी दीदी लाने वाली है ।कई जोड़ी चप्पले, पेंसिल बॉक्स ,हेयर बैंड और न जाने क्या क्या? इस साल क्रिसमस पर शायद उसकी बहन ही सांता क्लाउस की तरह उसके लिए उपहार लाने वाली है। जब मेरे जेहन में ये बात आई तो फिर लगा क़ि कभी ऐसे ही मैं अपने दिल्ली में पढ़ने वाले भइया के आने का और उसके लाए छोटे छोटे सामानों का बेसब्री से इंतज़ार करती थी। तो क्या फर्क है? है न वही कहानी !!!
Thursday, 24 November 2016
बहुत दिन पहले स्कूल के मोरल साइंस के किताब में पढ़ी एक कहानी की याद कल अचानक से हो आई ।कहानी कुछ ऐसी थी कि एक पेशेवर मुजरिम को जज ने फाँसी की सजा सुनाते हुए उसकी आखिरी ख्वाहिश पूछी ।अपनी जिंदगी के आखिरी दिन उसने अपनी माँ से मिलने की इच्छा जताई ।जब जेल में माँ ने मिलकर उसे गले लगाया तो बेटे नेे पता नहीं कब से छुपाकर रखी छोटे से चाकू से अपनी माँ की जीभ काट ली ।माँ तो पीड़ा से बेहोश हो गईं और उपस्थित जनसमूह ने धिक्कारते हुए बेटे से उसका कारण पूछा ,उस मुजरिम बेटे का जवाब सुनकर सभी की आँखे नम हो गई ।उसने कहा कि जब मैं बहुत छोटा था तो मैं एक दिन अपने पड़ोसी के बगीचे से एक कद्दू चूरा लाया ,इस चोरी पर मेरी माँ खूब हँसी और पूरे घर को उसने सब्जी बनकर खिलाई ।इसके बाद मैंने जब जब किसी चोरी को अंजाम दिया ,अप्रत्यक्ष रूप से मेरी माँ ने मेरी पीठ थपथपाई जिसका नतीजा आज सबके सामने है ।
ये कहानी तो छोटी सी है लेकिन कल शाम बाजार में एक बाइकर और एक बूढ़े रिकशा चालक की हुई नोक झोंक ने मुझे इस कहानी की याद दिला दी ।कल बाजार में शायद उन दोनों में मामूली सी टक्कर हो गईं और गर्म होकर उस बाइकर ने रिक्शा चालक के बाप को गाली देते हुए उसकी गरीबी का जिम्मेदार बताया ।बात चूँकि बाप तक चली गयी थी इसलिए छोटी सी बात ने बड़ा रूप ले लिया। मैंने बात को शुरू होते हुए देखा था इसलिए यकीनन मैंने उस बाइकर की बदजुबानी को महसूस किया ।हर मनुष्य इज़्ज़त चाहता है । हम इज़्ज़त किसकी करते है ,मनुष्य की ,पैसों की या पद की ।अगर पद की,तो एक उम्र के बाद वो स्वतः ही समाप्त हो जाता है ।अगर पैसों की तो हाल के दिनों में हमने पैसों को मात्र एक रात में बेकार होते हुए देखा है ।
इस सृष्टि में माँ का पद बहुत महान है ।लेकिन हर माँ अपने बच्चे के जीवन की पहली शिक्षिका होने के साथ साथ उसकी आदर्श भी होती है ।आप कितने संस्कारी है ये आपके बच्चे को देखकर जाहिर हो जाता है क्या हर माँ बाप की यह जिम्मेदारी नहीं की पहले दिन से अपने बच्चों को मनुष्य मात्र की इज़्ज़त करना सिखाए।कोई भी अपराधी एक दिन में नहीं बनता ।आज भी हमारे समाज में बच्चे केअच्छे काम के लिए पिता को धन्यवाद देते हैं वही ससुराल गई बेटी के गलत काम के लिए माँ को ही दोष देते हैं ।तो हर एक माँ बाप का सतत प्रयास क्या अच्छे समाज का निर्माण करने में सहयोग नहीं कर सकता !
Saturday, 12 November 2016
अभी जबकि पूरा देश नोटों के अदल बदल में लगा हुआ है मैं 14 नवम्बर का इंतज़ार कर रही हूँ जब देश भर के प्रायः सभी स्कूलो में बाल दिवस मनाया जाएगा।बाल दिवस मनाने से पहले हम जरा बच्चों से समन्धित कानून के बारे में ग़ौर करें। हमारे देश में बाल मजदूरी से संबंधित पहला कानून 1952 में पारित हुआ जिसे 1986 और 2008 पुनः कुछ संशोधनों के साथ फिर से पारित किया गया। इस नियम के अंतर्गत 14 वर्ष से कम उम्र के किसी भी बाल मजदूर से काम करवाना कानूनन अपराध है लेकिन इसके बावजूद हमारे देश में बाल मजदूरी की क्या स्थिति है ये सर्वविदित है। कानून बनाना एक बात और उसका सामाजिक स्तर पर लागू होना अलग बात ।इस सिलसिले में मुझे अपने एक परिचित की बात याद आती है। मेरे उन परिचित ने कसम खाई क़ि मैं कभी उन होटलों या किसी ढाबा में खाना नहीं खाऊँगा जिनमें बाल मजदूरी को प्रश्रय दिया जाता हो। इस तरह की खाई जाने वाली कसमें जितनी आसान होता है उसे निभाना उतना ही कठिन। उन सज्जन ने अपनी कठिनाई बताते हुए कहा कि मुझे अपने दफ्तर के आंचलिक दौरों में मुझे एक भी ऐसा ढाबा नहीं मिला जिसमे नाबालिंग बच्चे काम न करते हो परिणामस्वरूप दो दिन के फलाहार के बाद ये कसम वही टूट गईं। हम और आप सभी अगर नज़र दौड़ा कर अपने चारों ओर देखे तो घर से लेकर बाजार, दुकाने, फैक्ट्रीज और सभी जगहों पर अपने नन्हे नन्हे हाथों से काम करने वाले कई बाल मजूदर अनायास ही दिख जाएंगे बावजूद इसके की यह कानूनन जुर्म है।अगर जबरदस्ती कभी किसी बच्चे को किसी समाजसुधारक जैसे जीव ने स्कूल में नाम लिखा भी दिया तो वो क्षणिक होती है और हमारी ओर तो उसका उद्देश्य मिड डे मील, साइकिल और तमाम सरकारी सुविधाएं। सरकारी योजनाएं और सरकारी स्कूलों की हालात किसी से छिपी नहीं। ये योजनाएं मात्र अपने टारगेट पूरा करने की तरफ से चिंतित रहती है। मेरी एक सहेली जो घर पर बच्चों की ट्यूशन लिया करती है उसके विद्यार्थियों में आर्थिक तौर कमजोर बच्चों की संख्या हमेशा ही अधिक होती है। फिर चाहे वो धोबी का पोता हो या गार्ड का बेटा। प्रशंसनीय बात तो ये है कि मेरी सहेली का बेटा उन बच्चों को अपने साथ बैठाना और खिलाना भी चाहता है। लेकिन किसी एक के ऐसा करने पर तो समाज नहीं बदलता।जब मेरी सहेली पढाई बंद होने पर वैसे ही किसी बच्चे की माँ से उसकी पढाई बंद करा कर नौकरी न करवाने की अपील की तो उस बच्चे की माँ का जवाब था कि "तोहनी के लइकन पढ़ लिख कर नौकरी करत हई अउर हमनी के बिना खरचे कएने,त अंतर कोंनची हई? ("आप लोगों के बच्चे पढ़ लिखकर नौकरी करते हैं और हमारे बच्चे बिना खर्च के ,तो अंतर क्या है?")
फिर भी मैं सुबह स्कूल जाते हुई बच्चों की कतार को देखकर विकास की एक छोटी सी उम्मीद अपने मन में महसूस करती हूँ आशान्वित हूँ क़ि आज भले ही ये बच्चे किसी लालच में स्कूल की ओर आकर्षित हो रहे है लेकिन कल शायद स्कूल की शिक्षा उन्हें अपनी ओर खींच ले ......