आज मैं अपने इस पोस्ट में दूसरे तरह के खतरनाक लोगों के विषय में कुछ कहना चाहती हूं ।ये बात बहुत ही साधारण है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम उतने ही असाधारण होते हैं ।कहते हैं महाभारत में युधिष्ठिर ने अपनी माता कुंती के बात छिपाए जाने के कारण समूची नारी जाति को कोई भी बात को न छिपा सकने का श्राप दिया था जिसका परिणाम हम अक्सर अपने मित्रों और संबंधियों में पाते हैं । यूं तो इसे
Friday, 25 September 2020
कुछ साल पहले मैंने एक छोटी सी कहानी पढ़ी थी ।ये कहानी एक महंत और उनके शिष्यों के विषय में है । जिसमें गुरु जी शिष्यों को तीन खोपड़ियों की मदद से जीवन का एक पाठ पढ़ाते हैं ।पहली खोपड़ी के कान में गुरुजी एक पतली लकड़ी को डालते हैं जो कि उसके दूसरे कान से निकल जाता हैं उसकी तुलना गुरु जी ऐसे मनुष्य से करते हैं जो किसी भी बात को सुनकर तुरंत भूल जाता हैं उनके अनुसार इस तरह के लोग बेकार हैं ।दूसरी खोपड़ी के कान में गुरुदेव लकड़ी डालते हैं जो उसके मुंह से निकल जाता हैं उनके अनुसार इस प्रकार के लोग किसी के कहे गए बात को सुनकर तुरंत उसे दूसरों पर प्रकट कर देते हैं ,गुरू जी के अनुसार ऐसे लोग बेहद खतरनाक होते हैं तीसरी खोपड़ी में लकड़ी डालने पर वो उसके गर्दन से निकल जाता है अर्थात वैसे मनुष्य किसी भी बात को सुनकर अपने पेट मे रख लेते हैं जो उन गुरुदेव के अनुसार लाख टके का आदमी होता है ।
Wednesday, 26 August 2020
आज सासुमां को गए 32 दिन हो गए ।27 साल और कुछ महीने मैं उनके साथ रही ।पहले पति की नौकरी और बाद में व्यवसाय के कारण ,अगर सासुमां और अपने घूमने फिरने और कुछेक महीनों के कटिहार प्रवास को भी मिला दिया जाए तो भी हम अधिक से अधिक कुल मिला कर एकाध साल ही अलग रहे होंगे।मेरे हिसाब से जब इतने दिन लगातार सास बहू एक साथ रहती हैं तो वो संबंध सास बहू का न होकर वो दो औरतों के बीच का संबंध बन जाता है। उनमें ऐसी बहुत सी बातें थी जिन्होंने मुझे बहुत प्रभावित किया और आज मैं अपने बच्चों के साथ साथ अपने सभी मित्रों को जीवन में उन मूलमंत्रों को अपनाने की सलाह दूँगी ।क्षमाशीलता या घर परिवार में होने वाली छोटी या बड़ी बातों को नजरअंदाज करने की आदत ने उन्हें दूसरों से बिल्कुल अलग कर दिया था ।शायद अपने इसी गुण के कारण अपने विवाह के प्रारंभ से ही सास ससुर के साथ साथ देवर ननद के परिवारों के साथ रहने में वो सामंजस्य बना पाती थी । अपने विवाह के शुरू के वर्षों में मैं इस बात से आश्चर्य में पड़ जाती थी कि घर में होने वाली किसी भी बहस का अंत एक चाय के प्याले के साथ हो जाता था ।रात की बात रात में ही खत्म करना और चाहे कोई कितना भी गुस्से में क्यों न हो हमारे घर में किसी को अपना गुस्सा खाने पर निकाल कर भूखे रहने की इजाज़त नहीं थी और न ही उस विवादित बात को वो फिर दुहराती थीं । चाय पीना उन्हें अत्यंत प्रिय था ।अक्सर मुझे हँसकर कहा करती थीं कि मेरे श्राद्ध में ब्राह्मणों को भोजन से पहले चाय पिला देना ,मधुशाला की तर्ज़ पर चाय वाली इच्छा को मैंने श्राद्ध में पालन करने की कोशिश की। खाने और खिलाने की बेहद शौकीन सासुमां एक बेहतरीन कुक थी छोटी उम्र में शादी होने के कारण आज भी मेरी रसोई पर माँ से अधिक सास की ही स्पष्ट छाप प्रतीत होती है। इन बातों के साथ जीवन के प्रति सकारात्मक सोच से मैं बहुत प्रभावित थी ।जितना है उसी में बेहद खुश और संतुष्ट हो कर जीना , घर में होने वाले किसी भी पर्व त्योहार के लिए बेहद उत्साहित रहना घर में अनायास ही स्वस्थ वातावरण को जन्म देता है।किसी भी त्योहार के लगभग एक सफ्ताह पहले से उनकी बातों में उसी पर्व या व्रत का जिक्र रहता था ।आज महिलाओं को एक मेहमान एक शाम के लिए परेशान होते देखती हूं जबकि मायके ससुराल रिश्ते के कितने ही लोग अपने काम के सिलसिले में पटना आते और कई बार कई दिनों तक बने रहते लेकिन इसके लिए मैंने कभी माँ के चेहरे पर शिकन आते हुए नहीं देखा वो मेरे भाई बहन के लिए भी उतनी ही ममतामयी थी जितनी अपने किसी खास के लिए ।माँ की ऐसी बात का मैं जिक्र करना चाहूंगी जिसे कितने ही आधुनिक परिवारों में सीखने की जरूरत है ।मेरे पति अकेले भाई है और मेरी दो बेटियां हैं ।आज भी मैंने कई आधुनिक और पढ़ी लिखी महिलाओं को पोते के लिए बिसूरते देखा है लेकिन आज मैं गर्व से कह सकती हूं कि माँ के मन में कभी भी मैंने इस बात का मलाल नहीं देखा मेरे बच्चों के लिए वो मुझसे अधिक फिक्रमंद रहा करती थीं ।शायद इसी कारण नौकरी और पढ़ाई के बाद भी कोरोना हमारे लिए एक हिसाब से फायदेमंद साबित हुआ कि दोनों ही बच्चे दो महीने से दादी के पास थे । पिछले लगभग चार पाँच साल से वे अपनी पैर की तकलीफ से बहुत व्यथित थी ।भगवान पर अगाध आस्था रखने वाली माँ से शायद ही कोई व्रत अछूता था । जब किसी के बारे में हम कुछ लिखते हैं तो इस बात का संदेह बना ही रहता है कि कोई ऐसी बात मेरी लेखनी से अछूता न रह जाए लेकिन मेरी इस माँ के हृदय में क्षमा का विशाल भंडार था तो निश्चय ही मेरी इस उच्श्रृंखलता को वो दूर से भी माफ करेंगी।
Wednesday, 19 August 2020
29 july शाम को 6 बजे सासु माँ की इहलीला खत्म हो गई ।17 की रात को उन्हें पैरालिसिस अटैक हुआ था । शादी के लगभग 27 साल तक मैं उनके साथ रही ।पहले पति की उसी शहर में नौकरी और बाद में व्यवसाय के कारण अगर कुछ दिनों के कटिहार प्रवास अथवा घूमने आदि को जोड़ दिया जाए तो कुल मिला कर बीच के एकाध साल ही शायद हम अलग रहे होंगे ।मेरे हिसाब से जब इतने दिन लगातार सास बहू एक साथ रहती हैं तो वो संबंध सास बहू का न होकर वो दो औरतों के बीच का संबंध हो जाता है । मनुष्य होने के नाते नहीं कह सकती कि उनमें कोई खामी नहीं थी या मैं ही गुणों की खान थी पर शायद किसी नए संबंध के प्रति उनकी प्रारंभिक सूझ बूझ थीं कि इतने वर्ष साथ रहने के बाद हम दोनों में बहस न के बराबर हुई ।
वे याद आती है मेरी शादी से 5 साल पहले हुई दीदी की शादी के समय की बात ।दीदी की सास का देहांत जीजाजी के विद्यार्थी जीवन में ही हो गया था तो जब दीदी की शादी की बात चली तो पहले पहल माँ ने कहा कि यहां कैसे शादी होगी लड़के की तो माँ ही नहीं है ! बाद में वर की योग्यता को ध्यान में रखते हुए दीदी की शादी वही हुई लेकिन ये बात बिल्कुल सच है कि समय समय पर उनकी कमी सभी को खली। सास के रूप में पहली छवि मैंने अपनी दादी की देखी जो अत्यंत निरीह और भोली थी । बाद में मेरी शादी इस परिवार में हुई जो छोटा होते हुए भी संयुक्त होने के कारण काफी वृहत था ।आज मन फिर से वर्षों पहले की याद दिलाता है जब मैंने ससुराल में पहला कदम रखा था । ये कहना शायद मेरी अतिश्योक्ति होगी कि किसी भी नवब्याहता के मन में सास के लिए अत्यंत
Friday, 17 July 2020
आज पापा की दूसरी बरखी है ।कोरोना ने कुछ ऐसा कहर ढाया कि घर पर किसी भी ब्राह्मण को बुला कर खिलाने की बात सोची तक नहीं जा सकती है ।हम दोनों बहनों के लिए तो हमारे मिथिला के अनुसार दामाद ही 11 के बराबर की तर्ज पर कोई दिक्कत नहीं पर कोरोना के हॉटस्पॉट बना मुंबई में रहने वाले भाई के लिए किसी बाहरी को बुलाना असंभव है तो मन को शांत करने के लिए उसने दान धर्म का सहारा लिया। वैसे भी हम मनुष्यों को ही इस तरह की बातें परेशान करती हैं बाकी देवता या पितर हमारी सभी समस्याओं को समझते हैं । किसी भी अनुष्ठान को अपनी शारीरिक और आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार ही करना पापा के सिद्धांत में था फिर चाहे वो धार्मिक हो या श्राद्ध कर्म ।याद आता है तीन चार साल पहले जबकि भयंकर गर्मी में रांची के घर में नए बोरिंग के साथ सुम्मेरसैबले पंप लगाने की जरूरत पड़ी ।पापा जब तक अचानक आए हुए बड़े खर्च का हिसाब लगाते भइया ने नए बोरिंग के साथ नया मोटर लगवा दिया बात बहुत छोटी सी है पर पापा हमेशा हमसे कहा करते थे कि कहते हैं कि बेटा बाप को मरने के बाद पानी देकर तृप्त करता है लेकिन आलोक ने मुझे मेरी जिंदगी में ही पर्याप्त पानी दे देकर तृप्त कर दिया। पापा अपनी जिंदगी के अंतिम एक साल में पटना के हृदय रोग विशेषज्ञ के इलाज में थे मुझे बहुत से लोगों ने कहा कि तुमने पापा को डॉक्टर से दिखा कर आलोक का काम कर दिया ।आज मैं उन सभी लोग जिन्हें बेटे और बेटी दोनों हैं ,उनसे एक प्रश्न पूछती हूँ कि माता पिता की जिम्मेदारी क्या सिर्फ बेटे की हैं अथवा अगर बेटी अपने माता पिता की कोई सेवा करें तो क्या वो अपने भाई के ऊपर कोई उपकार कर रही है ?
Saturday, 11 July 2020
मार्च के अंतिम सफ्ताह से हमारे देश में लोकडौन की अधिकारिक घोषणा की गई । नतीजतन सभी काम बंद हो गए और एक तरह से छुट्टियों की स्थिति आ गई । अब जबकि चारों ओर से सिर्फ नकारात्मक खबर ही आ रही थी तो इसे कुछ सकारात्मक रूप देते हुए अपने आप से मैंने लोकडौन के समय कुछ ऐसे कामों को करने का वादा किया जो मैं रोज़ की दिनचर्या में नहीं कर पाती थी ।सबसे पहले नज़र उन किताबों की ओर गई ,अकसर मैं पुस्तक मेले या अन्य किताब की दुकान पर किताब खरीदते वक़्त एक साथ चार पाँच खरीद लेती हूं और बाद में पढ़ते समय एकाध को भूल जाती हूँ ,मैंने इस अवधि में उन किताबों को खोज कर पढ़ने की सोची ।उसके बाद घर के कई ऐसे काम जो मैं भाग दौड़ में नहीं कर पाती हूँ उन्हें पति और बच्चों की मदद से करना मेरे दूसरे नम्बर पर था ।मेरी कई दोस्त या रिश्तेदार जिनके कामकाजी होने के कारण प्राय महीनों बात नहीं हो पाती है उन्हें फोन कर फिर से यादें ताज़ी करने की सोची पर आज की तारीख में एक नहीं दो दो लोकडौन खत्म हो गए बीच में दिनचर्या सामान्य होने के बाद फिर से लोकडौन लगा दिया गया और मेरी स्पेशल लिस्ट ज्यों की त्यों रही ,हालांकि मैंने उनमें से कई किताबों को पढ़ा पर सबों को नहीं । उनमें से कई काम हुए पर सब के सब नहीं मेरे हिसाब से इन सबका का कारण समय की कमी या काम की अधिकता नहीं बल्कि मेरी टालने की प्रवृत्ति है । आप में से कई लोगों को शायद मेरे जैसी एकाध प्रवृत्ति हो और अक्सर काम को कल पर टालते हो ।जब तक ये आदत घरेलू कामों तक रहता है तब तक हमें एक झुंझलाहट भर होती है लेकिन जब ये आदत ऑफिस या कार्यालय के जरूरी काम पर पहुंच जाता है तो समस्या गंभीर हो जाती है । हम किसी भी काम के अंतिम तारीख का इंतजार क्यों करे चाहे वो बिजली बिल या insurance की प्रीमियम भरने की तारीख हो या बैंक के एकाउंट सबंधित कार्य । कभी कभी इन कागजों संबंधी छोटी सी लापरवाही हमें बड़ा नुकसान दे देती है और हम इस आदत के कारण परेशानी में पड़ जाते हैं और एक के बदले दो के चक्कर में पड़ जाते हैं फिर चाहे वो नकद के रूप में हो या मेहनत के रूप में हो । कोई भी बड़ी समस्या तभी बड़ी हो जाती है जब उसे छोटे रहने तक ध्यान नहीं दिया जाता है । तो " काल करे सो आज कर आज करे सो अब ,पल में प्रलय आएगा बहुरि करेगा कब "को बदल कर "आज करे सो कल कर ,कल करें सो परसों इतनी क्या है जल्दी पड़ी अभी पड़े है बरसों " न करें उसे उसके मूल रूप में ही रहने दें ।
Wednesday, 8 July 2020
19जुलाई को पापा की दूसरी बरखी है इस कोरोना के कहर को देखते हुए घर में किसी भी बाहरी व्यक्ति को बुलाने की बात सोचना भी मना है ।हम दोनों बहन तो निश्चिंत है क्योंकि हमारे घर में ही जीमने के लिए ब्राह्मण मौजूद हैं ।समस्या तो भाई के लिए है क्योंकि अब वहां पूर्ण रूप से अब भी lockddown है और स्थिति बेहद खराब है खैर उसके लिए कोई न कोई रास्ता निकल ही जाएगा क्योंकि परिस्थिति हम आप जैसे लोग नहीं समझते हैं देवता और पितर हर परेशानी में हमारे साथ है ऐसा मेरा विश्वास है ।पापा की बरखी के साथ मुझे पापा के एक साल पहले बीमार होने की बात याद आई ।पापा की तबीयत ठीक नहीं ।ये सुन के मैं उन्हें देखने रांची गई ।संजोग की बात थी उसी समय मुंबई में जीजाजी की एक कठिन सर्जरी होनी थी इसलिए दोनों भाई बहन का वहां से आना मुश्किल था ।मैंने जब पापा की स्थिति को देखते मैं अपने साथ पटना ले आई । कुशल डॉक्टर के चिकित्सा में पापा महीने भर में ही ठीक हो गए लेकिन साथ ही डॉक्टर ने जल्दी ही इनके महाप्रस्थान की भविष्यवाणी भी कर दी जिंदगी देना किसी के हाथ में नहीं पर उसके बाद की एक साल की जिंदगी कुछ हिदायतों के साथ उनके लिए आसान हो गई । अब यहां बात आती है लोगों की ।हर दूसरा व्यक्ति मुझसे ये कह रहा था कि तुमने आलोक (मेरा भाई ) का काम कर दिया । अरे ऐसा क्यों क्या माता पिता के प्रति मेरा कोई
Sunday, 5 July 2020
इन बड़ी हस्तियों के साथ ही हमारे समाज में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने अपने जरिए कुछ अधिक तो नहीं पर दस पंद्रह लोगों को रोजगार दिया है यहां मैं जिक्र करना चाहूंगी कि अपने पति श्री अशोक झा का । लगभग17 साल kitply और Greenply जैसी प्रतिष्टित कंपनियों में काम करने के बाद इन्होंने छोटी सी राशि सेअपना काम शुरू किया । कंपनियों में काम करने के दरम्यान इन्होंने कई नए लोगों को सफल व्यापार करवाया था शायद इसी कारण उन्हें इस तरह के काम की हिम्मत मिली । पिछले 10वर्षों से असम से ply के ट्रक मंगा कर पूरे बिहार में थोक विक्रेता के रूप में काम कर रहे हैं ।समय के साथ इसमें sunmica ,fevicol जुड़ते गए आदि के ।इसी दिशा में धीरे धीरे आगे कदम बढ़ाते हुए शौकिया तौर पर लोगों के इंटीरियर का काम तो विगत कई वर्षों से कर ही रहे थे उसे पिछले एक साल पहले दुकान का रूप दिया ।इनके द्वारा रोज़गार पाने वालों में ट्रांसपोर्ट वाले ,ठेला वाले ,बढ़ई औरअपने दुकान में काम करने वाले लोग हैं ।हालांकि हमारे ग्राहकों की संख्या चुनिंदा ही है शायद इसका कारण इनका quality product की वजह से पड़ने वाला अधिक मूल्य है लेकिन हमारे यहां ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जिन्होंने ने 5 से 7 साल पहले भी कभी चीज़ खरीदी हो ।
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