Wednesday, 9 August 2017

शायद तीन चार दिन पहले पेपर में मुंबई के पॉश इलाके अंधेरी में रहने वालीआशा सहनी की लोमहर्षक मौत के बारे में पढ़ा ।उस दिन से आज तक ये घटना  सभी सोशल मीडिया पर छाई हुई है । कुल मिला कर देखा जाए तो दोषी कौन ? आशा सहनी का नालायक बेटा ।बेटों की नालायकता तो हम औरंगजेब और अजातशत्रु से लेकर कई घटनाओं में देखते आए हैं ।लेकिन क्या इस घटना के पीछे और कोई वजह नहीं ? ये जहां महानगर के खोखले चमक दमक के पीछे छुपी एक अंधकार की ओर इंगित करती है वहीं परिवार के अति संकुचित होने को भी दिखाता है ।ये बात तो सर्वविदित है कि हमारे समाज में सयुंक्त परिवार लगभग खत्म होने की कगार पर है और इसके ह्रास होने का सबसे अधिक खामियाजा बच्चे और बुजुर्ग ही भुगत रहे हैं ।परिवार का निजीकरण होना कोई गलत बात नहीं क्योंकि जब हम विकास की राह में पश्चिम को अपनाएंगे तो हमें अच्छा औऱ बुरा दोनों ही अपनाना होगा ।इसके साथ साथ परिवार के निजीकरण के और भी बहुत से कारण है ।बच्चों की कम संख्या ,शिक्षा का प्रसार और बहुत कुछ ।मैं इसे गलत भी नहीं मानती क्योंकि विकास और जन्म स्थान से बच्चों की दूर बस जाना कोई गलत नहीं ,गलत है लोगों के द्वारा समाज से बनाई गई दूरी ।हम में बहुत से लोग बच्चों की पढ़ाई , कैरियर और अपनी प्राइवेसी के कारण आत्मीय और समाज से एक अलिखित दूरी बना लेते हैं ।जब तक हम शारीरिक रूप से समर्थ हैं या पति पत्नी दोनों जीवित हैं हमें किसी तीसरे की उपस्थिति नागावर लगती है लेकिन दोनों में से किसी एक को पहले जाना है तो उसके बाद उस दूसरे की स्थिति दयनीय हो जाती है ऐसे में बेटा या बेटी अपने कैरियर में  सेट हो जाता है और जिसने बचपन से अपने माता पिता को मात्र अपने को अपने बच्चे तक ही सिमटा हुआ पाया था ,उसकी दुनिया भी अपने बच्चों तक ही रह जाती है और माता या पिता भी उसके लिए एक अवांछित सदस्य बन जाते हैं ।आप बस एक बार  सोच कर देखें कि क्या उक्त महिला का उस बेटा के अलावा मायके और ससुराल का  कोई आत्मीय नहीं था स्पष्टत उसकी दुनिया बस उसके बेटे तक ही सीमित थी हो सकता है कि शारीरिक और मानसिक  अस्वस्थता के कारण के वो अपने लोगों से दूर थी ।मैं नहीं जानती कि उस परिवार का  समाजिक दायरा कैसा था लेकिन आर्थिक रूप से  मजबूत होने के बाद भी बेटा भी अपनों से बहुत अलग था ।इस संदर्भ में मुझे कुछ साल पहले की एक घटना याद आती है जब मैं अपने पति के गॉलब्लेडर के स्टोन के ऑपरेशन के लिए एक निजी नर्सिंग होम गई थी ।वहां एक पेशेंट के ऑपरेशन की जमा की गई रकम इसलिए वापस कर दी गई क्योंकि उसके साथ कोई अटेंडेंट नहीं था जहां वो डॉक्टर और दूसरे स्टाफ़ को अपनी ओर से पूरी सफाई देने में लगा था कि मुझे किसी की जरूरत नहीं मैं अकेला काफी हूँ ! लेकिन ये बात तो लाखों वर्ष पुरानी है ," मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज के बिना रहने वाले मनुष्य की तुलना देवता या दानव से की जाती है "।इस घटना से डरने की नहीं सीखने की जरूरत है कि अपनी व्यस्त दिनचर्या , अपने परिवार और बच्चों के अलावा की दुनिया से भी जुड़ने की कोशिश करें ।

No comments:

Post a Comment