Thursday, 2 August 2018

इस पोस्ट को लिखने से पहले मैं एक बात स्पष्ट करना चाहती हूं कि इसे लिखने के पीछे  मेरे मन में आत्मश्लाघा की भावना कदापि नहीं है बल्कि अपने एक छोटे से प्रयास से सबको अवगत कराना चाहती हूं ।पिछले दो महीनों से जिस अपार्टमेंट में हम रहते हैं उसके रंग रोगन का काम चल रहा था ।वैसे ये काम काफी पहले हो जाने की बात लगभग एक साल से चल रही थी ।खैर  मई जून की चिलचिलाती धूप में  करीब करीब 18 से 20 मजदूरों ने रस्सी पर लटकते हुए इसे पूरा किया मजे की बात यह थी कि सभी मजदूरों की उम्र अधिक से अधिक बीस की होगी ।जब छोटी थी तो माँ की इस बात से झल्ला जाती कि कोई भी मेरी उम्र की लड़की मेरी माँ को मुझ जैसी कैसे  लगने लगती है लेकिन अब शायद इसी प्रकार की भावना के कारण मैंने काम करने के दौरान  बच्चों(मजदूरों)को शरबत और ठंडे पानी पिलाने की छोटी सी मदद देनी चाही । रंग रोगन काम अच्छे से निबट गया । इस सारे प्रकरण के बाद हमने ( हम दोनों पति पत्नी) ने पेड़ लगाने की ठानी ।अब जब हम अपार्टमेंट के पिजड़े में रहते हैं तो इस प्रकार के शौक तो शायद हँसी उड़ाने वाली बात कही जाएगी ।लेकिन पटना में बारिश होने से पहले शायद ही कोई छुट्टी का दिन रहा हो जिसे हमने गाड़ी के द्वारा जगह जगह से मिट्टी लाने में न व्यतीत किया हो ।जब मिट्टी और खाद आ गए तब बारी आई उन्हें पेंट वाले ड्रमों में भरने की और अंतत फॉरेस्ट डिपार्टमेंट से लाए गए पेड़ो को रोपने की तो ये काम पूरा हुआ अपार्टमेंट के छोटे बच्चों के द्वारा ।मेरी समझ से छोटे बच्चों से पेड़ लगवाने के दो फायदे हैं पहला बच्चों में एक सामाजिक चेतना आती है और सबसे बड़ी बात कि उनके द्वारा लगाए पेड़ उनकी जिम्मेदारी बन जाती है और कम से कम ये पेड़ पानी की कमी से कभी नहीं मरेंगे क्योंकि मैंने बच्चों को अपने वाटर बोतल से भी पेड़ों को पानी देते देखा है ।मजे की बात है कि अब अपार्टमेंट में  पेड़ों के नाम आँवला ,नीम या गुलमोहर की जगह पूर्वी,साक्षी ,श्रुति और निवि ही नहीं हर्ष और क्रिशू भी हैं !☺☺☺

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